सत्य का एन्काउंटर है हत्या की ख़बर देकर हत्यारे से पुरस्कृत होना !  

अनहद गरजे, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का एक पर्चा है जो समय-समय पर विभिन्न मुद्दों पर हिंदी में निकलता है। राज, समाज और विश्वविद्यालय से जुड़े तमाम मसलों पर बेबाक रखने वाले इस पर्चे के ताजा संस्करण में पत्रकारों और पत्रकारिता को लेकर कुछ गंभीर सवाल उठाये गये हैं…पढ़ें–

 

नरेन्द्र मोदी के हाथ इंडियन एक्सप्रेस का ‘एक्सीलेंसी’ पुरस्कार लेने वाले पत्रकारो की ‘उपलब्धि’ देखा आपने?

मोदी से पुरस्कार ग्रहण करने वाले किसानों की आत्महत्या और माओवाद के नाम पर आदिवासियों की हत्या की राजनीति नहीं समझ रहे हैं, यह तो नहीं है। उन्होने स्टोरी की है, उन्हें ख़ूब मालूम है कि एनकाउंटर क्यों किया जा रहा है, कैसे किया जा रहा है ? विनिवेश बढ़ाकर सूचकांक संवारने के उद्देश्य सबको पता हैं – फिर भी गुजरात 2002 के क्लीनचिट धारक माँ भारती के शेर के साथ मुस्करायमान फोटो खिंचवाने की ‘बेबसी’ को क्या कहिएगा !

यह किस पत्रकार को नहीं पता कि मोदी सरकार आतंकवाद का बिज़नेस कर रही है और देशभक्ति के रैपर में  नफ़रत लपेटने के बीच सरकारी संस्थानों को ठेकेदारों  के हाथ सौंपकर ‘राष्ट्रीय एकता’ को उन्नत कर रही है ! यह कौन नहीं देख रहा कि मोदी डेमोक्रेसी की, विश्वसनीयता की, शांति, सौहार्द की दो-मुँही बातें करके हत्या हिंसा और एनकाउंटर को देश का ‘विकास’ ठहरा रहा है।

इस आयोजन की न्यूज़ यह है कि हत्या की ख़बर देनेवाले को हत्यारा पुरस्कृत कर रहा है – गोया स्टोरी की सत्यता का हत्या की घटना से कोई संबंध न हो ! अपराधी बरी हो रहा है पुरस्कार ‘पाने’ की इस ‘घटना’ में, जबकि लोकतंत्र का पराजित प्रहरी दाँत चियारकर अपने जीवित होन का प्रमाण ले रहा है !

जिन्हें लड़ने के मेर्चे पर होना था, वे गड़ने में व्यस्त हैं और अपने किये का असहाय बचाव करके अपनी ही मनुष्यता को दग़ा दे रहे हैं।

बात पुरस्कार की नहीं है, बात पैसे की नहीं है, बात किसी व्यक्ति या दोस्त की नहीं है – बात राजनीति की है, न्याय और व्यवस्था के ध्वंस के  सेलिब्रेशन के विरोध की है, विपक्ष की है, भविष्य की है, समानता के संघर्ष  की है, समतामूलक समाज की है।

आप देखें कि ये पत्रकार लोग उस वर्ग के हित से बँधे हैं जो लोकतंत्र में हिंसा हत्या और भेदभाव को इन्ज्वाय करते रहना चाह रहा है। हीनता और दास्यभाव पर आधारित सामंती सामाजिक संबंधों को ढीला पड़ते देख ऐयाश-बेहूदा बाभन-बनिया गठजोड़ आरएसएस के नेतृत्व में नये सिरे से लामबंद हुआ चाहता है। पत्रकारिता के कलंक, हत्यारों के हमराह इन पतित पत्रकारों को कभी माफ नहीं किया जा सकता।

भरी सभा में द्रौपदी को  नंगा करने को उतारू कौरवों के अपरूप इन संघियों के साथ संगति साधने वाले किसी भी ‘ब्रेन डेड’ को इतिहास कभी माफ नहीं करेगा!

एनकाउंटर की स्टोरी करने वाले पत्रकार को अगर यह नहीं मालूम है कि यह कार्यवाही डेमोक्रेसी के ‘‘हक़’’ में की जा रही है तो पत्रकार नामधारी उस बौड़म के हाथ में पुरस्कार क्या कुछ भी पकड़ाया जा सकता है। इस तथ्य को कौन देखेगा कि एनकाउंटर की राजनीति क्या है और भाजपाई लोकतंत्र व कांग्रेसी इमरजेंसी की तुलना का दो-मुंहा राजनीतिक मंतव्य क्या है ? इमरजेंसी का ख़तरा याद करते हुए, एनकाउंटर्स के रास्ते ‘‘राष्ट्रीय एकता’’ के ‘विकास’ की राजनीति करने वाले शिक्षा, संस्कृति व सभ्यता के शत्रु इस स्वयंसेवक की लिफाफेबाज़ी को पत्रकार अगर नहीं सुन पा रहा है तो वह किस बात का पुरस्कार ले रहा है, किसलिए पत्रकारिता कर रहा है?

कश्मीर में ‘नेशनल सिक्योरिटी’ की आड़ मे रोज़-ब-रोज़ मारे कूटे जा रहे नौजवानों को जो लोग लगातार ‘‘आतंकवादी’’ लिख-बोल रहे हैं,वे लोकतंत्र, पत्रकारिता, सत्य व न्याय के किस उसूल के साथ खड़े हैं?

एनडीटीवी के प्रसारण पर एक दिन की रोक की कोशिश का मतलब यह है कि जितना बताया जाए, उतना ही सुनो, समझो और वही दिखलो। स्टोरी की घटना के चक्कर में मत पड़ो। क्योंकि घटना के चक्कर में पड़ोगे  सबसे पहले उसकी सत्यता का सवाल उठेगा। अहमदाबाद के अक्षरधाम मंदिर पर 2001 में जो ‘हमला’ हुआ था, जिसमें 25 लोग मारे गए थे, 77 लोग घायल हो गए थे, जिस ‘हमले’ के 6 ‘आतंकी’ 11 साल जेल में रहकर ठीक उस दिन ‘बाइज्जत बरी’ किए गए जिस दिन मोदी को प्रचण्ड बहुमत मिला – वह ‘हमला’ सिरे से फर्जी  था, ऐसा कुछ कभी हुआ ही नहीं था – इस बात में अब कोई संदेह नहीं बचा! जबकि नरेंन्द्र मोदी को ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ बनाने में इस ‘हमले’ की अहम भूमिका है। सवाल यह है कि इस फर्जी  हमले की फर्जी  रिपोर्टिंग करने वालों और उसे छापकर साम्प्रदायिक नफरत उगाने वालों की कोई जिम्मेदारी कोई जवाबदेही है कि नहीं? पत्रकारिता के सारे उसूलों को ताक पर रखकर किस ‘अखण्डता’, किस ‘देशभक्ति’ और किस ‘भारतमाता’ के लिए काम कर रहै हैं लोकतंत्र के ये प्रहरी ?

हत्यारा अगर भोंभा फाड़कर हत्या के दुर्गुण गाने लगेगा तो आप क्या समझेंगे ? बीए एमए की फर्जी  डिग्री धारक आरएसएस का यह ‘होनहार’, भारत की जड़ीभूत सामंती सामाजिक व्यवस्था का संचित पाप है जो भगवान राम समेत तैंतीस करोड़ देवियों देवताओं की असीम कृपा से अपनी भारतमाता की ‘महान’ गोद में अवतरित हुआ है! इस ‘दोखी’ को कौन देखेगा?

 

2 .  जेएनयू के संघी वाइस चांसलर का हौसला देखिाए ज़रा !

 

जेएनयू के छात्र नजीब अहमद के अपहरण / गुमशुदगी / हत्या (?) के मामले में जेएनयू का वाइस चांसलर जिस ‘महान’ संस्कार सिस्टम की निम्नता का नमूना पेश कर रहा है, वह गौरतलब है।

जिन लोगो ने नजीब पर जानलेवा हमला किया, जिनसे सबसे पहले पूछताछ की जानी चाहिए थी, उन्हें ‘कारण बताओ नोटिस’ देने में जेएनयू प्रशासन ने 24 दिन लगा दिये। बीयर पीने, ज्वाइंट के लिए या मामूली विवाद में सैकड़ों विद्यार्थियों से फाइन वसूल चुके जेएनयू प्रशासन की यह सांस्कृतिक ‘‘बेबसी’’ देखिए। पढ़े लिखे बजरंगियों का यह ‘‘साहस’’ देखिए ! इस ‘मेरिटोरियस’ वाइस चांसलर का ‘शाल’’ देखिए। इसकी पूरी टीम काम कर रही है बाकायदा – जिसमें कई प्रोफेसर-नुमा लोग शामिल हैं।

ये मोदी के लोग हैं। ये डेड कल्चर की दिशा में जा रहे लोग हैं। इन्हें न इतिहास पता है, न विज्ञान की ही तमीज़ है। ये अगर कुछ पढ़ लें तो भी नहीं बता सकते कि उसमें क्या लिखा है! इनका मध्यकालीन बोध भी विकृत किस्म का है। जिस हिंदू धर्म व संस्कृति की ‘रक्षा’ का दावा करते हैं ये लोग, उसकी एबीसीडी भी इन गधों को नहीं मालूम। इनकी बजरंगी चेतना को – इधर बहुत दिन तक दलितों, पिछड़ों की दावेदारी ‘सहने’ के बाद – अब जाकर अपनी औक़ात दिखाने का एक मौका हाथ लगा है। कपार पर चढ़े चले आ रहे हैं सब।

वामपंथियों की दी हुई शह का नतीजा है यह। इसलिए दलितों को मारो , मुसलमानों का मारो, वामपंथियों को मारो।

लंबे समय से चलते चले आ रहे जानलेवा संघर्षें के नतीजे में हासिल किए गए अधिकारों को, बलपूर्वक बनवाये गए श्रम के, न्याय के कानूनों को ध्वस्त किये दे रहे हैं मोदी के ‘देशभक्त’! आजाद भारत के इतिहास में जब किसी भी योजना को अपने उद्देश्यों तक नहीं पहुँचने दिया गया, जब आरक्षण के बावजूद इक्का दुक्का ही नौकरियाँ/ सुविधाएं ही वंचितों को मिल रही हैं – तब यह इतना भी बाभन-बनिया गठजोड़ की आँख में गड़ रहा है। इससे वर्चस्व में दखल पड़ रहा है। यह मार पिटाई उसी का नतीजा है।

सामाजिक न्याय की प्रक्रिया को ध्वस्त करने के लिए, वंचित समुदाय में विकसित होते जा रहे अधिकार बोध को कुचलने के लिए पुलिसिया कार्यवाही और कानूनी दाँवपेच तो चल ही रहे हैं। देशभर में लगातार कांग्रेस भी यह काम धड़ल्ले से कर रही थी – मोदी राज में नई बात यह है कि अब यहां न्याय व सत्य को कुचलने से बढ़कर, कुचलने वाले को पुरस्कृत करने और नियम कानून की बात करने वाले को अपमानित-दंडित करने का काम गर्व से किया जा रहा है। संघियों का यह ‘साहस’ गौरतलब है।

न्याय और लोकतंत्र की हर प्रक्रिया का उल्लंघन ही नहीं, बल्कि उसकी हत्या करने का लुत्फ़ उठा रहे हैं ये लोग ! कहने को ‘नेशनल सिक्योरिटी’ मजबूत कर रहे हैं, भारत का नाम ‘रौशन’ कर रहे हैं ये लोग! इस दोमुंहे को देखिए।

हिन्दू धर्म के नाम पर ये लोग जिस पुरोहिती व बाबू साहबी का पुनरुत्थान करना चाहते है , वह लाभार्थी की भी इंसानियत का नाश करती है – इसका इन पगलेटों को  कोई होश नहीं। नरेंद्र मोदी ‘असली गौ-रक्षकों’ के जिस भारत का सपना देखता है, उसके ब्रांड अंबेसडर हैं ये

मोदीभक्त रेक्टर, प्रॉक्टर, वाइस चांसलर! ये  लोग अन्याय के अंगरक्षक हैं। हीनता के लाभार्थी  हैं। ब्राह्मणवाद के ढहते वर्चस्व को फिर से मजबूत किया चाहते हैं ये लोग।

पीड़ित और न्यायाकांक्षी को ही नहीं, उसके साथियों को भी जलील करना, अपमानित करना चाहते हैं ये लोग। मानो  जांच की, न्याय की, सत्य की बात ही गलत हो ! जिन लागों ने नजीब को दमभर मारा, उन्हें संरक्षण देने, कारण बताओ नोटिस देने में 24 दिन लगाने का मतलब क्या है? प्रशासन की निष्क्रियता और पुलिस की चुप्पी का अर्थ  इसके सिवा और क्या समझा जाना चाहिए? नजीब की गुमशुदगी के 22 दिन बाद ‘सदैव तत्पर’ दिल्ली पुलिस ने नामजद आरोपितों मे से कुछ से पूछताछ की जहमत अता की। अपनी माँ का दूध पिये ‘स्वाभिमानी’ होममिनिस्टर की यह ‘महिमा’ देखिए। इसने ईश्वर को   साक्षी मानकर संविधान की षपथ ली है कि गण संघ के मंत्री के तौर वह भेदभाव के आधार पर कोई काम नही करेगा!

इस पैटर्न को कश्मीर से छत्तीसगढ़ तक सब कहीं देखा जा सकता है। दंतेवाड़ा में 2011 में आदिवासियों के 160 घर पुलिस ने जला दिये। जो लोग इसका विरोध कर रहे थे, उनको मारा गया और फिर उन पर निगाह रखने के लिए आदिवासियों में से ही कुछ लोगों को खड़ा किया गया। फिर दिल्ली की दो प्रोफेसरों  को नत्थी करने का अवसर आया तो उसे भी निपटाना पड़ा। यह काम पुलिस कर रही है, कांग्रेस भाजपा की देखरेख में किसिम किसिम की फौज कर रही है। आगजनी और हत्या का यह काम ‘लोकतंत्र’ के नाम पर, विकास के नाम हो

रहा है। इस केस का हॉरर यह है कि नंदिनी सुंदर और उनके साथियों  को ठीक उसी काम के लिए गुनाहगार बनाने की कोशिश की जा रही है, जिस काम के लिए उनकी प्रशस्ति की जानी चाहिए! यहाँ संविधान, कानून, थाना, पुलिस बीजेपी सरकार द्वारा इस प्रकार इस्तेमाल किये जा रहे है कि लोकतंत्र के नाम पर समूची सरकारी मशीनरी एक हाथ से न्याय-सत्य का संहार कर रही है, दूसरे हाथ से लूट-दमन का ‘विकास’कर रही है! यह गवर्नेंस का ‘गुजरात मॉडल’ है! क्या समझे? इस मॉडल के पक्ष में आप चुपचाप नहीं मानेंगे तो हत्या का केस तैयार करके आपको फंसा दिया जा सकता है, तरह तरह के आरोप लाद दिये जा सकते है कि बगैर किसी बात सबूत के आपको यानी ‘‘आतंकी’’ को कितने भी समय तक जेल में रखा जा सकता है, कभी भी मार डाला जा सकता है – यानी ऐसा कुछ भी किया जा सकता है जो गौरवषाली हिन्दू राष्टं की बहुसंख्यक हिन्दू चेतना को

शांत प्रदान करता हो! गवर्नेंस के इस मोदी मॉडल को मीडिया के सौजन्य से खुलेआम प्रचारित किया जा रहा है – न्यायमूर्तिगण भी सुन ही रहे होंगे कि ‘अखण्डता’ और ‘देशभक्ति’ के नाम पर देशभर में ‘‘देशद्रोहियों’ के साथ क्या सुलूक किया जा रहा है!

निर्दाषों की सांस्थानिक हत्या जिस जातिवादी सांप्रदायिक मंशा से की जा रही है, उसके पीछे भेदभाव के प्राइवेट इरादे काम कर रहे हैं ।

यहॉं क्लास की लड़ाई चल रही है। नफ़रत को, तनाव को हवा देकर, देशभक्ति की आड़ में, कारपोरेट के हक़ में ठेकेदारी का निर्णायक विकास कर रही है मोदी सरकार। इस ‘विकास’ पर सवाल खड़ा करना ‘देशद्रोह’ है! समानता बराबरी की बात करना सामाजिक समरसता को बिगाड़ने की कोशिश है।

हिंसा, हत्या व अन्याय को संरक्षण कांग्रेस ने भी दिया, लेकिन संघी लोग जिस गर्व के साथ लोकतंत्र का जाप करते हुए सत्य, न्याय की हर संस्था की हर गतिविधि का गला घोंटकर उत्सव मना रहे हैं, वह अभूतपूर्व है। यह उत्सव विशेष है। इतनी बेशर्मी  दुर्लभ है। यह पतन बेमिसाल है। यह दृष्टिहीनता इतिहास की वस्तु है। ‘‘आतंकवादी’’ बताकर मारे जा रहे कश्मीर के बेकसूर -जी हां, बेकसूर नौजवानों को आरएसएस की सरकार जिन उद्देश्यों के लिए मरवा रही है, उसे क्लास की तरफ से देखिए तभी यह बात साफ हो सकेगी कि मामला न हिन्दू मुसलमान का है, न भारत-पाकिस्तान का। असल मामला टेरर की पॉलिटिक्स का है, आतंकवाद के बिजनेस का है।

बीएचयू व हैदराबाद विश्वविद्यालय से लगाकर नार्थ  साउथ ब्लॉक तक न्याय-सत्य का वध करके लिहा लिहा कर रहे ज्ञान-बोध से तंगदस्त भारतमाता के संघियो का यह ‘‘हौसला’’ देखिए।

वे अच्छे नंबरों से पास हुए स्टूडेंट हो सकते हैं लेकिन अप्पा राव और गिरीष चंद्र त्रिपाठी जिस दर्ज़े की प्रशासकीय निम्नता पोंक रहे हैं, उससे सहमत होन के लिए आपका आधुनिक बोध के पिछवारे जाना पड़ेगा यानी एक स्तर तक जाहिल होना पड़ेगा! होश-हवास में रहते कोई मान नहीं सकता कि जगदीश कुमार जेएनयू का वाइस चांसलर होने की बुनियादी लियाक़त भी पूरी करता है! पर यही बोदा आरएसएस का ‘मेरिटोरियस’ है!

जिसे जेएनयू कल्चर कहते हैं, जिसे कुचल देना चाहती है आरएसएस की सरकार, वह आखि़र है क्या? जेएनयू ऐसा क्या सिखा देता है कि ‘अखण्डता’ की आत्मा में ‘दरार’ पड़ती है? साथियों! जेएनयू के दायरे में जो आया या जेएनयू ने जिससे छुआ-छुई कर ली वह व्यक्ति, क्षेत्र, जाति, धर्म से आगे बढ़कर सिस्टम की, संपत्ति की गति देखने लगता है। यही वह पेच है जिसे ढीला कर देता है जेएनयू। यह बड़ी तस्वीर दिखा देता है – फिर देवी देवता, हिन्दू मुसलमान, ऊंच-नीच व स्त्री पुरुष के विभाजन अपनी मिथ्याचारी वास्तविकता के साथ बेपर्दा  हो जाते हैं और अपना ही विरूपित रूप देख संकल्पधर्मा  चेतना विकल हो उठती है – यहां से अपनी ही क्षमता, ऊर्जा , कला, कृतित्व को उद्घाटित करते अपने ही अदेखे व्यक्तित्व का साक्षात्कार होता है। इसीलिए जेएनयू सच्चे अर्थ  में गुरु है।

इस कल्चर को वामपंथी राजनीति ने ईंट-दर-ईंट निर्मित किया है, क़दम-ब-क़दम संघर्ष करके संजोया है। इस कल्चर की कोख में सत्य व समानता का अंकुर पलता है, जिसे पल्लवित पुष्पित होना है भविष्य में विपक्ष की पार्टी  बनकर – पर वर्चस्व में पगी, सांप्रदायिकता की सगी, अंधकार की डसी, मध्यकाल में फंसी आरएसएस सरकार इसी ‘‘वर्गीय दृष्टि’’ को कुचल देना चाहती है। इस विश्वदृष्टि से ‘पांचजन्य’ की ‘एकता’ में ‘दरार’ पड़ती है। जेएनयू पर मोदी सरकार के चैतरफ़ा हमले का निशाना इसीलिए वामपंथ है। वे शोध-बोध की गौरवशाली ज्ञानात्मक परंपरा को, बेहतरी के स्वप्न को ध्वस्त करना चाहते हैं।

जेएनयू के सामने ‘अखण्ड भारत’ के ‘नेकर के नीचे का सारा नंगापन’ इसीलिए डरता है कि संघी ‘देशभक्त’ के सामंती दो-मुंहेपन को यहां का विद्यार्थी  भली प्रकार पहचानता है।

नेकर के नीचे का सारा नंगापन

कालर के ऊपर उग आया है:

चेहरे बड़े घिनौने लगते

पर इससे क्या फर्क पड़ गया

अगर बड़ी छायाओं वाले बौने लगते ;

धूमिल

 

3. इस ‘दोखी’ को कौन देखेगा ?

 

आरएसएस का प्रथम सेवक नरेन्द्र मोदी अपने प्रत्येक वक्तव्य में नफ़रत को हवा दे रहा है। वह अपनी प्रत्येक गतिविधि में संविधान, संसद, न्याय और जिम्मेदारी के बुनियादी उसूलों को ध्वस्त कर रहा है और सामाजिक भेदभाव को बढ़ाने की नीतियों का प्रचार कर रहा है। कश्मीर में, उड़ीसा में, मध्यप्रदेश में ‘फर्जिकल’ एनकाउंटर ‘आयोजित’ करके भारत की एकता-अखंडता ‘मजबूत’ कर रहे इस संघी के डबल-रोल को क्या मीडिया देख पा रहा है, क्या न्यायपालिका को कुछ सुझाई दे रहा है?

लोकतंत्र के बारे में मोदी के विचार सुनकर ऐसा लगता है जैसे हत्यारा, हिंसा की निरर्थकता के बारे में प्रवचन कर रहा है और मारे जा चुके निर्दोष की अहमियत बतलाकर बुल्ला चुआ रहा है – इस प्रकार पीड़ित और उसके परिजन समेत सभागार में सामने बैठे भक्तों से लेकर लोकतंत्र व इतिहास के श्रोता तक सबको ठग रहा है। यह उस कसाई का बर्ताव है जो हर अगले निर्दाष का गला रेतने से पहले ऊपर वाले का नाम लेते रहने को अपना ‘डेमोक्रेटिक’ आचरण बता रहा है और इन-इक्वलिटी के ग्राहकों को धंधे की क्रेडिबिलिटी सिखा रहा है।

एनएसजी में फजीहत होने से लेकर राफेल सौदे में ठगाने तक और उत्तराखंड से अरुणाचल प्रदेश तक नरेन्द्र मोदी की भाजपा सरकार ने बार बार साबित किया है कि संघियों के पास आधुनिक तमीज़ की भारी कमी है। यह आरएसएस से बढ़कर अवतारवाद की समस्या है।

गौ-रक्षकों और बजरंग दल के लम्पटों को छोड़ दीजिए, प्रोफेसर व वाइस चांसलर के पदों तक पहुँचे लोग जिस वैचारिक दिवालियेपन का खुलेआम मुज़ाहिरा कर रहे हैं, वह भेदभाव की सामंती संस्कृति के ‘महान’ संस्कारों का ‘हासिल’ है।

 

4. ‘अंधेरे में’ में अंधों का जुलूस

जन विरोधी मीडिया की मिलीभगत से ‘फर्जिकल स्ट्राइक’ के सहारे ‘राष्ट्रीय एकता’ का चुनावी गुब्बारा फुलाने की सांप्रदायिक कोशिशों को दिल्ली में एक सूबेदार ने अपनी जान देकर फुस्स कर दिया। इस शहादत को सैल्यूट नहीं कर सकता कोई स्वयंसेवक! पेंशन मामले में संघ सरकार की दगाबाजी का विरोध करते हुए अपने साथियों के हक़ के लिए ज़िबह हो गए इस सूबेदार के नाम पर दीपक जलाया जाएगा तो उस रोशनी में उन निर्दोषों का भी चेहरा दिखेगा जो तरह तरह के फर्जी  मामलों में बरसों से जेलों में बंद थे, और अब जब उनका फ़ैसला होनेवाला था तो मोदी के इस ‘लोकतंत्र’ मे भाजपा की सरकार ने उन्हें दिनदहाड़े मार डाला।

उनका फैसला आता तो ‘नेशनल सिक्योरिटी’ और आतंकवाद के नाम पर फुलाये जा रहे गुब्बारे की और भी दुर्गति होती, ‘सिमी’ के नाम पर किये जा रहे दुष्प्रचार की सच्चाई सामने आती इसलिए मध्य प्रदेष के श्रद्धालु मुख्यमंत्री ने सभी आठ ‘आतंकवादियों’ का निस्तारण कर दिया। वे ‘आतंकवादी’ थे, उन्हें देशहित में मारा जाना था ही ! लकड़बग्घे की तरह दूर से ही गंधाते प्रथम सेवक के मुख से इमरजेंसी का प्रवचन सुनने वाले किसी पुरस्कृत पत्रकार की निगाह शिवराज सिंह चैहान की इस लोकतांत्रिक ‘उपलब्धि’ तक जाती है कि नहीं – देखिएगा। जो लोग इस हत्याकांड का समर्थन कर रहे हैं वे देवी देवता के अंधकार मे उलझे सामंतवाद के केस हैं। इन पढे लिखे पगलेटों से ख़बरदार!

वे फर्जी  मामलों में बंद थे, उनका फर्जी  एनकाउंटर कर दिया गया। इससे माँ भारती की महिमा बढ़ी है, देश का नाम रौशन हुआ है, राष्ट्रीय एकता’ मजबूत हुई है, भारत का विकास हुआ है। इस घटना पर जिसको स्टोरी करना हो, रिपार्ट बना ले। जिसे पुरस्कार लेना हो, दांत चियार ले। जिसे लोकतंत्र की दुहाई गाना हो, बकवास कर ले। जिसे मुसलमान के नाम पर छाती पीटना हो, उसका भी मौक़ा है। मारे गए नौजवानों में कोई दलित भी हो तो बापसा के ‘अंबेडकरवादी’ धक्का-मुक्की प्रस्तुत करने के लिए जहां कहिये वहां पहुंचने को तैयार हैं। नजीब के मामले में पैरेलल जुलूस निकालने वाले लोग एबीवीपी से पहले जेएनयूएसयू की वामपंथी लीडरशिप को और खासतौर पर आइसा को जिस बहादुरी से ‘दुरुस्त’ करना चाहते थे, वह वंचित समुदाय के राजनैतिक बोध की निम्नता का आईना है।  ( इसी आत्मघात के गारे से मोदी का बहुमत बना है।)

वे नहीं जानते कि वे जो कुछ कर रहे हैं वह क्या है, किसके हक़ में है! वामपंथियों को दंडित अपमानित किये बगैर न मुद्दा समझ में आएगा, न एबीवीपी की गुंडागर्दी  का बचाव होगा, न जेएनयू का ध्वंस होगा! यही परिदृश्य है। जो लोग नये नये नेता भये हैं, उन्हें अभी अपनी सात पुस्त के दमन से उबरने में समय लगनेवाला है। तब तक ये लोग ‘स्वतंत्र’ रूप से  इन-इक्वलिटी का घर भरेंगे, अस्मिता के नाम पर जनविरोधी उछल-कूछ करेंग (अनजाने ही ) सत्य व न्याय की हत्या के उत्सव को अनदेखा करेंगे यानी वंचक का बचाव करेंगे! आपको जो करना हो, देख लीजिए।

इस तथ्य को साफ साफ समझ लेना होगा कि जेएनयू के छात्र आ आंदोलन से का कोई क्रांति नहीं खड़ी होने जा रही। वैचारिक दार्शनिक सतह पर प्रतिरोध का जो मोर्चा  है – यहीं विचार, साहित्य व संस्कृति कर्मी  को जुटना है। इससे आगे मध्यवर्गी य समाज का व्यक्ति तभी आगे बढ सकता है जब उसे यह ज्ञात हो जाए कि संस्कृतिकर्मियों को, खासतौर पर वामपंथियों को नत्थी किये बगैर नरेन्द्र मोदी की डेमोक्रेटिक इमरजेंसी साकार क्यों नहीं हो सकती ! इसलिए मध्यवर्ग के कैरियरिस्टों की हायतौबा को लेकर ज्यादा फूलने पचकने का काम नहीं है।

दूसरी बात यह है कि सत्य, न्याय और जिम्मेवारी, जवाबदेही के पक्ष में खड़े होने पर अखलाक़ व रोहित वेमुला के हत्यारों से, नजीब के अपहर्ताओँ से आपकी मुठभेड़ होकर रहेगी। इससे बचने की कोई सूरत फ़िलहाल दिखलाई नहीं पड़ रही है। आपको जो करना हो, कर लीजिए।

विकल्प कई हैं – होम मिनिस्टर के साथ जन्मदिन मना लीजिए, प्रथम सेवक के खुर कमलों से पुरस्कार ले लीजिए या संस्कृति मंत्रालय से लेन देन करके जन्मतिथि पुण्यतिथि मनाने की सेटिंग कीजिए। दिल्ली वासियों की तरह सनक भी सकते हैं- पटाखे फोड़कर खुशी का ज़हर फैलाइए और फिर उसको हवा पानी में सोखकर गर्व से मरिये।

‘अंधेरे में’ अंधों का जुलूस निकलेगा, यह तो ठीक है पर वे लोग करेंगे क्या – सवाल यह है!

हम फिर कहेंगे: भरी सभा में द्रौपदी को नंगा करने को उतारू कौरवों के अपरूप इन संघियों के साथ संगति साधने वाले किसी भी ‘ब्रेन डेड’ को इतिहास कभी माफ़ नही करेगा!

 

अनहद गरजै, जेएनयू, 12 नवंबर 2016

 

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