नोट- यह लेख 27 दिसंबर 2016 को मीडिया विजिल में प्रकाशित हुआ था। उस दिन हिंदी को पहले थिसारस देने वाले अरविंद कुमार ने इस महत्वपूर्ण कोश की रचना के संबंध में कुछ अहम बातें लिखी थीं। अरविंद कुमार जी का आज (27.4.2021) निधन हो गया। वे 92 वर्ष के थे और पूरी तरह सक्रिय थे। हिंदी को समृद्ध बनाने के लिए जैसा निस्वार्थ अभियान उन्होंने चलाया, उसकी दूसरी मिसाल नहीं मिलती।
मुक्तिबोध पूछते हैं–अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया..? …..इस सवाल का सामना करना आसान नहीं। 1930 में जन्मे अरविंद कुमार तब लगभग 43 साल के थे जब एक सुबह की सैर के दौरान उनके ज़ेहन में यह सवाल कौंधा । तब वह फ़िल्म जगत से हिंदी पाठकों को परिचित कराने वाली, टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप की सुरुचिपूर्ण पत्रिका माधुरी के संपादक थे। फ़िल्मों की चकमक रंगीन दुनिया को बेहद क़रीब से देख रहे अरविंद कुमार को इस सवाल पर जिस निस्सारता का अनुभव हुआ वह हिंदी जगत के लिए एक ऐतिहासिक घटना बन गई। यूँ तो हिंदी के नाम पर रोने वालों की एक बड़ी दुनिया है, लेकिन बिना वेतन और वज़ीफ़े के हिंदी संसार को समृद्ध करने का जुनून दिखाने वाले गिनती के हैं। अरविंद कुमार ने तय किया कि वे हिंदी का थिसारस (संपूर्ण शब्द भंडार या कोश) बनाकर जीवन सार्थक करेंगे, जिसका अभाव एक बड़ा सवाल था। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और तमाम तक़लीफ़ों और अड़चनों के बावजूद अपनी पत्नी कुसुम कुमार के अनन्य सहयोग से थिसारस बनाने का संकल्प पूरा करने में क़ामयाब हुए। … उस घटना के आज 43 साल बीत चुके हैं और इस जोड़ी की वजह से हिंदी के पास अपना थिसारस (समांतर कोश) ही नहीं, हिंदी-अँग्रेज़ी का द्विभाषी थिसारस भी है। मीडिया विजल इस दम्पति का आभार जताते हुए उनके सुखी और स्वस्थ जीवन की कामना करता है। उन्होंने प्रश्नाकुलता से भरी उस सुबह की वर्षगाँठ पर आज अपनी फ़ेसबुक वॉल पर जो लिखा है, वह साभार यहाँ प्रस्तुत है—संपादक
आज से तैँतालीस पहले सन 1973 के दिसंबर की 27 तारीख़ की जीवन बदल डालने वाली वह सुहानी सुबह हम कभी नहीँ भूल सकते. हम लोग बदस्तूर सुबह की सैर के लिए बंबई के (आजकल इसे मुंबई कहते हैँ, काफ़ी स्थानीय लोग तब भी मुंबई ही कहते थे. लेकिन उन दिनोँ उस महानगर का नाम बंबई था, तो) बंबई के हैंगिंग गार्डन छः बजते बजते पहुँच गए थे. हैंगिंग गार्डन का एक फेरा नपे नपाए 600 मीटर का होता था. हम लोग नियम से 5 फेरे लगाते थे – यानी तीन किलोमीटर…
मुझे बंबई मेँ दस साल हो चुके थे. माधुरी का संपादन करते दस साल हो गए थे. अजीब सी ऊब होने लगी थी. मैँ सोचता अकसर अठारह घंटे प्रति दिन व्यस्त रहने के बाद मेरी अपनी उपलब्धि क्या है? मात्र यही कि मैँ ने यह पार्टी अटैंड की, वह प्रीमियर देखा.
क्योँ? किस लिए? कब तक?
क्योँ? किस लिए? कब तक?
क्योँ? किस लिए? कब तक?
किसी ने वह किताब नहीँ बनाई, तो मतलब है – मैँ ही वह किताब बनाने को पैदा हुआ हूँ. सपना मेरा है. कोई ग़ैर क्योँ पूरा करेगा मेरा सपना! सफ़र मेरा है, मुझे ही तय करना होगा!
तो उस सुबह पहले फेरे मेँ मैँ ने कुसुम से मन की बात कही. मैँ ने यह भी साफ़ कर दिया कि हो सकता है इस काम के लिए मुझे नौकरी छोड़नी पड़े. आर्थिक तंगियोँ का सामना करना पड़ सकता है. अकसर वह तुरंत ‘हाँ’ नहीँ करतीँ. उस सुबह मेरी बात सुनते ही उन्होँ ने ‘हाँ’ कर दी. निश्चय ही उस दिन कुसुम की ज़बान पर सरस्वती विराजी थीँ. हम दोनोँ इस अहसास से ओतप्रोत हो गए कि हम कोई बड़ा काम करने जा रहे हैँ. चारोँ ओर हमेँ ऐडवैंचर पर निकलने का रोमांच और रोमांस दिखाई दिया.पर मेरी उम्र, मानसिकता और परिस्थिति स्पेनी उपन्यास के पात्र डौन किहोटे जैसे ऐडवैंचरिज़्म की नहीँ थी.
तीसरे फेरे मेँ हम ने माइनस पाइंट गिने. हमारे दो बच्चे थे, जो पढ़ रहे थे. जानबूझ कर हम उन के जीवन को दाँव पर नहीँ लगाना चाहते थे. न ऐसा करने का हमेँ अधिकार था. हम पर कुछ कर्ज़ था. सन 1971 मेँ मैँ ने ऐंबैसेडर कार ख़रीदी थी. इंश्योरेंस आदि सब मिला कर बाईस हज़ार पड़े थे. सोलह हज़ार का ऐडवांस कंपनी से लिया था. बाक़ी छह हज़ार तत्कालीन जनरल मैनेजर डाक्टर तरनेजा की सिफ़ारिश से बंबई मेँ टाइम्स के वितरक से कर्ज़ लिया था. वह सब बोझ पूरी तरह उतरने का समय था अप्रैल 1978. तब बच्चे भी पढ़ाई की ऐसी स्टेज पर पहुँचने वाले थे कि हम शहर बदल सकेँ. सुमीत बारहवीँ पास कर लेगा. मीता आठवीँ. बचत के नाम पर पास मेँ कुछ नहीँ था. कुछ कंपनियोँ मेँ हम ने पैसा सूद पर लगा रखा था. वह न के बराबर था. आत्मनिर्भर होने के लिए हमेँ कुछ करना होगा – यह अप्रैल 1978 तक करना होगा.
पाँचवाँ फेरा. इस मेँ हम ने यह सोच विचार किया कि किताब के लिए क्या तैयारियाँ करनी होँगी, और कैसे अप्रैल 78 तक हम अपने आप को आवश्यक उपकरणोँ से लैस कर लेँगे. संदर्भ ग्रंथ ख़रीदने होँगे. अभी तो बँधी आय है, इसी मद मेँ ख़र्च करेँगे. काम कार्डों पर किया जाएगा. जैसे कार्ड चाहिएँ, वैसे मैँ डिज़ाइन कर के छपवा लूँगा. नौकरी छोड़ने से पहले सुबह शाम किताब पर काम कर के देखेँगे. जब पूरा अनुभव हो जाए, हाथ सध जाए, तभी दिल्ली जाएँगे. निश्चित तारीख़ तक यह सब हो जाएगा, और सारा काम हमारी योजना के अनुसार होगा, दो साल मेँ किताब तैयार होगी – हम ने पूर्णतः अपने को आश्वस्त कर लिया.
उगता मायावी चालाक सूरज पेड़ोँ की फुनगियोँ को और हमारे दृष्टिकोण को सुनहरी किरणोँ से रंग रहा था. राह के गड्ढोँ और काँटोँ को हमारी नज़रोँ से ओझल कर रहा था. कभी कभी आदमी को ऐसे ही छलिया सूरजोँ की ज़रूरत होती है. ऐसे सूरज न उगेँ, तो नए प्रयास शायद कभी न होँ. हमेँ सारा भविष्य सुनहरा लगने लगा. ख़ुशी ख़ुशी हम लोग माउंट प्लैज़ेंट रोड के ढलान से उतर कर नेपियन सी रोड पर प्रेम मिलन नाम की इमारत मेँ सातवीँ मंज़िल पर 76वेँ फ़्लैट पर लौट आए. मैँ दफ़्तर जाते ही प्राविडैंट फ़ंड की राशि बढ़वाने वाले आवेदन का मज़मून बनाने लगा….