अपोलो का ‘प्लेग-कोप’, पंखों वाला मृत्युदूत और चोंच वाला डॉक्टर!

1656 में बने एक चित्र, 'रोम का चोंच वाला डॉक्टर' (डॉक्टर स्नेबेल ऑफ़ रोम ) में ऐसे चिकित्सकों की वेश भूषा का सटीक विवरण मिलता है। ऐसे डॉक्टरों का मुखौटा किसी पक्षी के चोंच के आकार का होता था। घुटनों के नीचे तक का इनका लम्बा कोट, मोमिया (मोम लगे) कपड़े का बना होता था और हाथ दास्तानों से  ढँके रहते थे। संक्रमण से बचने के लिए वे अपने हाथ में छड़ी रखा करते थे ताकि रोगियों से दूरी बनाई रखी जा सके।  आधुनिक काल की महामारियों के दौर में चिकित्सकों और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों के 'पर्सनल प्रोटेक्शन इक्विपमेंट '(पी.पी.इ) का आरंभिक रूप सत्रहवीं शताब्दी के इस वस्त्र की कल्पना में खोजा जा सकता है। चिकित्सकों के लिए इस वस्त्र को डॉक्टर चार्ल्स डी लोरमे ने 1630 में बनाया था।

‘समय और चित्रकला ‘ शीर्षक से प्रख्यात चित्रकार अशोक भौमिक की लेख शृंखला की यह  छठीं कड़ी पहली बार 24 मई 2020 को मीडिया विजिल में प्रकाशित हुई थी।  कोरोना की पहली लहर के दौरान चित्रकला पर महामारियों के प्रभाव की ऐतिहासिक पड़ताल करते हुए अशोक दा ने दस कड़ियों की  यह साप्ताहिक शृंखला लिखी थी। साल भर बाद भारत दूसरी लहर से मुक़ाबिल है तो हम इसे पुनर्प्रकाशित कर रहे हैं। इस बार यह शृंखला लगातार दस दिन तक प्रकाशित होगी- संपादक।

 

एथेंस ( ग्रीस की राजधानी) का शुमार विश्व के प्राचीनतम शहरों में होता है। पुरातत्त्वविदों का मानना है कि यह शहर ग्यारहवीं और बारहवीं शताब्दी ईसा पूर्व से आज तक न केवल आबाद रहा है बल्कि अनेक सामाजिक उत्थान-पतन, युद्धों, महामारियों और सांस्कृतिक आन्दोलनों का गवाह रहा है।

पहली शताब्दी (70 से 100 ईस्वी) के आसपास लिखी गयी धार्मिक पुस्तक ‘न्यू टेस्टामेंट’ में प्लेग का उल्लेख ईश्वर के अभिशाप के रूप में किया गया था (देखें निकोलस पूसाँ द्वारा 1628 में न्यू टेस्टामेंट पर बनाया गया चित्र अशदोद का प्लेग: चित्र 1)। एक व्यक्ति या समाज जब कोई गलत काम करता है तो ईश्वर उसे सज़ा देने के लिए ‘प्लेग’ भेजता है। यूँ तो प्लेग शब्द द्वारा आज एक विशिष्ट लक्षण वाले रोग को ही चिन्हित किया जाता है किन्तु प्राचीन धार्मिक पुस्तकों में इसे मनुष्यों और उसके द्वारा पाले गए मवेशियों को सज़ा देने के उद्देश्य से क्रोधित ईश्वर द्वारा भेजे गए अनेक मारक रोगों के साथ साथ अन्य दुखों को समझाने के लिए किया जाता रहा है। इसीलिये धार्मिक पुस्तकों में इसका प्रयोग कई बार ‘प्लेगों’ (प्लेग्स) के रूप में भी हुआ है। किन्तु ऐसा भी नहीं है कि ‘न्यू टेस्टामेंट’ जैसे धार्मिक ग्रंथों में ही हमें प्लेग का उल्लेख मिलता है बल्कि साहित्य में भी महामारियों का जिक्र समान रूप से दिखाई देता है, जहाँ रोगों की ईश्वर के एक हथियार के रूप में भी कल्पना की जाती रही है।

चित्र-1

ग्रीक पौराणिक कथाओं में बारहवीं और तेरहवीं सदी के दौरान दस वर्षों तक चले ट्रोजन युद्ध की कथा का सर्वाधिक महत्व रहा है। आठवीं सदी में ग्रीक कवि होमर ने इसी युद्ध की पृष्ठभूमि में ‘इलिआड’ महाकाव्य की रचना की थी। साहित्य में इसका सबसे आरंभिक उदाहरण संभवतः ईसा पूर्व आठवीं सदी में होमर द्वारा रचित ‘इलियाड’ में मिलता है। ‘इलियाड’ प्राचीन ग्रीक साहित्य की एक कालजयी कृति के रूप में चर्चित है ( देखें चित्रकार पीटर पॉल रुबेंस का बनाया हुआ ‘इलियाड’ पर चित्र : चित्र 2 ) । इस महाकाव्य में देवता अपोलो के एक भक्त की बेटी का अपहरण यूनान के सम्राट आयगामेम्नॉन द्वारा कर लिया जाता है। बेटी को वापस पाने के लिए असहाय पिता सम्राट से बारम्बार विनती करता है जिसे सम्राट अनसुनी कर देता है।  ऐसे में यह व्यक्ति अपने आराध्य देवता अपोलो से अपनी बेटी की मुक्ति के लिए प्रार्थना करता है। इस पर अपोलो बेहद क्रुद्ध हो उठते हैं और सम्राट आयगामेम्नॉन को सबक सिखाने और यूनानी सैनिकों के विनाश के लिए ‘प्लेग’ भेजते हैं। अपोलो द्वारा भेजे गए प्लेग के प्रकोप से बड़ी संख्या में सैनिकों की मृत्यु होती है और और अंत में , यूनानी जनता और अपहरण की गयी लड़की के पिता, अपोलो की वंदना  प्रार्थना करते हैं जिससे अपोलो खुश होकर ‘प्लेग’ को वापस बुला लेते हैं।

चित्र-2

इसी प्रकार सोफोक्लीज़ द्वारा 429 ईसापूर्व में रचित नाटक  ‘राजा इडिपस’ भी थीबिज़ राज में प्लेग महामारी को एक दैवी प्रकोप के रूप में दर्शाता है।  इस महामारी का प्रसंग नाटक को एक महत्त्वपूर्ण मोड़ देता है और जो राजा इडिपस के लिए अपना राज त्यागने का कारण  बनता है।

सोफोक्लीज़ ने ‘राजा इडिपस’ नाटक को जिस काल खंड की पृष्ठभूमि में रचा था वह वास्तव में एथेंस का प्लेग दौर था। ग्रीक इतिहास के इस दौर का सबसे विश्वसनीय चित्रण हमें  थिउसीडिडीज़ द्वारा युद्ध के विवरणों में मिलता है। थिउसीडिडीज़ द्वारा लिखा गया ‘पेलोपेनेशिअन यद्ध का इतिहास’ , 404 – 431 ईसापूर्व में हुए एथेंस और स्पार्टा के बीच घमासान युद्ध का ब्यौरा है ( देखें चित्र 3)।  इस युद्ध के तुरंत बाद ही एथेंस के आसपास के विशाल इलाके में प्लेग फैला था। थिउसीडिडीज़ का विवरण अपने आप में एक साहित्यिक रचना और तत्कालीन समय का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ भी है।

चित्र-3

थिउसीडिडीज़ के इस दस्तावेज़ में युद्ध एवं महामारी का विस्तार से वर्णन है और यहाँ युद्ध और महामारी से सम्बंधित देवी देवताओं की किसी काल्पनिक कथा का उल्लेख नहीं है। इस विशष्ट कृति के कारण आज भी वैज्ञानिकों को एथेंस के उस दौर की महामारी के लक्षणों और व्यापकता को समझने में मदद मिलती है। इस महामारी का एक महत्त्वपूर्ण चित्र हमें  ‘एथेंस का प्लेग’ शीर्षक से मिलता है। माइकेल स्वीर्ट्स द्वारा 1652 से 1654 के बीच बनाये गए इस चित्र का आधार हालाँकि थिउसीडिडीज़ द्वारा लिखा ‘पेलोपेनेशिअन यद्ध का इतिहास’ है लेकिन चित्र में चित्रकार ने अपने समय के महामारी के अनुभवों का भी सहारा लिया था जो उनके चित्र में स्पष्ट दिखता है (देखें चित्र 4)।

चित्र-4

लम्बे समय तक यूरोप की महामारियों में चिकित्सकीय हस्तक्षेप के स्थान पर पुरोहितों, जादूगरों और ज्योतिषियों का ही बोलबाला दिखता है। 165 से 180 ईस्वी के दौरान रोम में हमें एक चिकित्सक द्वारा रोग निर्धारण के प्रयासों का प्रमाण मिलता हैं। इस दौर में रोम में ग्रीक मूल के चिकित्सक, गेलेन सक्रिय थे। ‘विएना डीओसकोरीजीस’ नामक चिकित्सा शास्त्र की हस्तलिखित पोथी के एक पृष्ठ पर बने चित्र (देखें चित्र 5) में सात चिकित्सकों के समूह के केंद्र में गेलेन उपस्थित दिखते हैं। माना जाता है कि रोम में साँप काटने पर जरूरी उपचार के बारे में इन चिकित्सकों ने काफी सफलता पाई थी।

चित्र-5

रोम के इस महामारी को इतिहास में गेलेन प्लेग (प्लेग ऑफ़ गेलेन) भी कहा जाता है। किन्तु चिकित्सकों की ऐसी ढेरों कोशिशों के बावजूद प्लेग के बारे में लोगों की अवधारणा में तमाम विविधताएँ नज़र आईं। गेलेन के प्लेग पर बने एक चित्र में प्लेग से आक्रांत किसी शहर की सड़कों पर मरे हुए लोगों का दृश्य अंकित है जहाँ पंख लगा एक ‘मृत्यु दूत’ लोगों के बंद दरवाज़ों पर दस्तक दे रहा है (देखें चित्र 6 )। महामारी के साथ मृत्यु दूत का ऐसा चित्रण दुर्लभ है, क्योंकि डैनों वाले दूतों की प्रायः देव दूतों के रूप में ही कल्पना की जाती रही है।

चित्र-6

यूरोप में कई सदियों तक , आम चीजों के सड़ने से उत्पन्न दुर्गन्ध या ‘सड़ांध’ को ही महामारियों का कारण माना जाता रहा। चिकित्सकों ने नकाब या मास्क का आरंभिक उपयोग इसी दुर्गन्ध से बचने के लिए किया।  यूरोप में प्लेग के चिकित्सक के नाम पर ‘चोंच वाले डॉक्टरों’ (डॉक्टर  स्नेबेल ) का उल्लेख मिलता है। ये डॉक्टर बहुत ज्यादा प्रशिक्षित नहीं थे और मूलतः प्लेग से पीड़ित लोगों के सर्वेक्षण का काम ही ज्यादा करते थे। 1656 में बने एक चित्र (देखें चित्र 7 ) ‘रोम का चोंच वाला डॉक्टर’ (डॉक्टर स्नेबेल ऑफ़ रोम ) में ऐसे चिकित्सकों की वेश भूषा का सटीक विवरण मिलता है। ऐसे डॉक्टरों का मुखौटा किसी पक्षी के चोंच के आकार का होता था। घुटनों के नीचे तक का इनका लम्बा कोट, मोमिया (मोम लगे) कपड़े का बना होता था और हाथ दास्तानों से  ढँके रहते थे। संक्रमण से बचने के लिए वे अपने हाथ में छड़ी रखा करते थे ताकि रोगियों से दूरी बनाई रखी जा सके।  आधुनिक काल की महामारियों के दौर में चिकित्सकों और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों के ‘पर्सनल प्रोटेक्शन इक्विपमेंट ‘(पी.पी.इ) का आरंभिक रूप सत्रहवीं शताब्दी के इस वस्त्र की कल्पना में खोजा जा सकता है। चिकित्सकों के लिए इस वस्त्र को डॉक्टर चार्ल्स डी लोरमे ने 1630 में बनाया था।

चित्र-7

यूरोप में महामारियों का इतिहास हज़ारों साल पुराना है। इस दौरान धार्मिक पुरोहितों, जादूगरों , ज्योतिषियों और नीम हकीमों ने मनुष्य के मन में जीवन की अनिश्चतता और असहायता का लाभ उठा कर उनके सामने मृत्यु के डरावने रूपकों को जन्म दिया। यह सच है कि चित्रकला को इन शक्तियों ने अपने स्वार्थ में इस्तेमाल किया और इसीलिये चित्रकला के इतिहास में तमाम चित्र हैं जो मनुष्य को गुमराह करने की ऐसी कोशिशों का दस्तावेज़ नज़र आते हैं किन्तु इसी के समानांतर चिकित्सा विज्ञान ने निरंतर प्रगति की है। कहना ग़लत न होगा कि इस विकास क्रम में उसे बीमारी के साथ साथ समाज में धर्म द्वारा फैलाये जा रहे कर्मकांडों,अंध विश्वासों और व्यापक तर्कहीनता के साथ भी लड़ना पड़ा है।

 



अशोक भौमिक हमारे दौर के विशिष्ट चित्रकार हैं। अपने समय की विडंबना को अपने ख़ास अंदाज़ के चित्रों के ज़रिये अभिव्यक्त करने के लिए देश-विदेश में पहचाने जाते हैं।
जनांदोलनों से गहरे जुड़े और चित्रकला के ऐतिहासिक और राजनैतिक परिप्रेक्ष्य पर लगातार लेखन करने वाले अशोक दा ने इतिहास के तमाम कालखंडों में आई महामारियों के चित्रकला पर पड़े प्रभावों पर मीडिया विजिल के लिए एक शृंखला लिखना स्वीकार किया है। उनका स्तम्भ ‘समय और चित्रकला’, हर रविवार को प्रकाशित हो रहा है। यह छठीं कड़ी है। पिछली कड़ियाँ आप नीचे के लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

पहली कड़ी- धर्म, महामारी और चित्रकला !

दूसरी कड़ी- महामारियाँ और धार्मिक चित्रों में मौत का ख़ौफ़ !

तीसरी कड़ी- महामारी के दौर मे धर्मों और शासकों का हथियार बनी चित्रकला !

चौथी कड़ी- धर्म, मृत्युभय और चित्रकला : पीटर ब्रॉयगल का एक कालजयी चित्र

पाँचवीं कड़ी- महामारी में यहूदियों के दाह का दस्तावेज़ बनी चित्रकला !



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