संथाल हूल: अंग्रेज़ों, ज़मींदारों और साहूकारों के ख़िलाफ़ पहला जनयुद्ध !

जब हम 'संथाल हूल' की बात करते हैं तो जाहिर है भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा भी इसके केंद्र में आ जाती है। तब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले स्वतंत्रता सेनानी के नाम की चर्चा भी होनी शुरू हो जाती है, जहां राष्ट्रीय पटल पर मंगल पांडे का जिक्र होता है, जबकि सच यह है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम  स्वतंत्रता सेनानी तिलका मांझी थे।

 

कहना न होगा कि 30 जून 1855 को प्रारंभ हुआ ‘संथाल हूल’ भारत में प्रथम सशस्त्र जनसंघर्ष था। मार्क्सवादी दर्शन के प्रणेता कार्ल मार्क्स ने भी अपनी पुस्तक ‘नोट्स ऑफ इण्डियन हिस्ट्री’ में इस ‘संथाल हूल’ को सशस्त्र जनक्रान्ति की संज्ञा दी है। जब हम सशस्त्र जनसंघर्ष की बात करते हैं तो निश्चित रूप से हम युद्ध की बात करते हैं, जो एक सत्ता के साथ दूसरी सत्ता का होता है।

महाजनी सभ्यता के जुल्म से ऊबे हजारों लाखों संथाल-विद्रोहियों के ‘संथाल हूल’ को समझने के लिए जरुरी है की हम ‘हूल’ के अर्थ को समझे। ‘हूल’ संथाली आदिवासी शब्द है जिसका अर्थ होता है क्रांति/आंदोलन यानी शोषण, अत्याचार और अन्याय के खिलाफ उठी बुलंद आवाज।

30 जून, 1855 की इस ऐतिहासिक परिघटना ‘संथाल हुल’ को इतिहासकार ‘संथाल-विद्रोह’ मानते रहे हैं। जबकि सच तो यह है कि यह कोई विद्रोह या आंदोलन नहीं था, बल्कि यह ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ युद्ध था। इसे समझने के लिए युद्ध और विद्रोह के बीच फर्क को समझना होगा। विद्रोह किसी भी सत्ता से असंतुष्ट जनआंदोलन को कहा जा सकता है, जबकि युद्ध दो सत्ताओं के बीच अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए होता है, और ‘संथाल हूल’ संथालों द्वारा अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ युद्ध था।

स्वतंत्र पत्रकार रुपेश कुमार सिंह कहते हैं कि ”30 जून 1855 को प्रारंभ हुआ था भारत में प्रथम सशस्त्र जनसंघर्ष।  26 जुलाई 1855 को संथाल हूल के सृजनकर्ताओं में से प्रमुख व तत्कालीन संथाल राज के राजा सिद्धू और उनके सलाहकार और सहोदर भाई कान्हू को वर्तमान झारखंड के साहबगंज जिला के भोगनाडीह ग्राम में खुलेआम अंग्रेजों ने पेड़ पर लटकाकर यानी फांसी देकर भले ही ‘संथाल हूल’ को खत्म मान लिया था, लेकिन हर तरह के शोषण के खिलाफ जल-जंगल-जमीन की रक्षा व समानता पर आधारित समाज बनाने के लिए सिद्धू-कान्हू, चांद-भैरव, फूलो-झानो द्वारा शुरू किया गया हूल आज भी जारी है।”

वे कहते हैं कि ”आज से 165 वर्ष पहले जिन सपने के खाातिर संथाल हूल की घोषणा हुई थी, क्या वे सपने पूरे हो गये? यह सवाल तो उठना लाजमी ही है क्योंकि जिन जमींदार, महाजन, पुलिस व सरकारी कर्मचारी के नाश के लिए संथाल हूल हुआ था, आज वही ताकतें ‘हूल दिवस’ मना रही हैं और सिद्धू-कान्हू-चांद-भैरव-फूलो-झानो के सपनों का समाज बनाने की बात कह रही हैं। क्या वास्तव में ये इनके सपनों का समाज बनाना चाहते हैं? क्या जंगलों की अंधाधुंध कटाई, पहाड़ों को पूंजीपतियों के पास बेचकर, आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन को जबरन छीनकर, उन्हें लाखों की संख्या में विस्थापित कर अमर शहीद सिद्धू-कान्हू-चांद-भैरव-फूलो-झानो का सपना पूरा होगा?

रूपेश कहते हैं कि हूल दिवस की 165वीं वर्षगांठ पर जरूर ये सुनिश्चित करना होगा कि जल जंगल जमीन को पूंजिपतियों के पास बेचकर संथाल हूल के शहीदों का सपना पूरा होगा या फिर जल जंगल जमीन को बचाने के लिए लड़ाई लड़ने वाले आदिवासियों के पक्ष में खड़े होकर? जिस तरह से सिद्धू-कान्हू को उनके ही कुछ लोगों ने दुश्मनों के हाथों पकड़वा दिया था, ठीक उसी तरह अपनी जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए लड़ रहे आदिवाासियों को भी उनके ही कुछ तथाकथित अपने धोखा दे रहे हैं, लेकिन फिर भी झारखंड के जंगलों से लेकर पश्चिम बंगाल, ओडिसा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश आदि के जंगलों में उनका हूल जारी है और ये शोषणविहीन समाज की स्थापना तक जारी रहेगा।”

वहीं खोरठा साहित्यकार एवं खोरठा प्राध्यापक दिनेश दिनमणी कहते हैं कि ”1885 में झारखंड में जिन परिस्थितियों के खिलाफ हुलगुलान किया गया था, वही परिस्थितियां कुछ बदले रूप में आज भी दिख रही हैं। अकूत खनिज और वन संपदा पर आज भी पूंजीपतियों की गिद्ध दृष्टि है। कोल-माइन्स को निजी हाथों में सौंपने का फैसला उसी का नतीजा है। झारखंड बने 20 साल होने को है फिर भी आज तक विस्थापन नीति नहीं बनाई गई। इसके बिना यहां के रैयतों की जमीन औने-पौने दाम में एक तरह से छीनी जाती रही है। जिन शर्तों पर जमीनों का अधिग्रहण किया गया था, उसके विपरीत पूंजीपतियों के हाथ बेची जा रही है।”

दिनमणी आते कहते हैं कि ”इसी प्रकार खान खनिजों, डैमों के विस्थापितों को आज तक न्याय नहीं मिला। प्राकृतिक संसाधन से इतने समृद्ध प्रदेश के नौ लाख युवाओं को रोजगार के लिए अन्यत्र पलायन करने को मजबूर होना राज्य के हालात को खुद बयां करता है। राज्य की नई सरकार उस पार्टी के नेतृत्व में बनी है जिसने अलग राज्य के लिए लंबा संघर्ष किया था। लेकिन इस सरकार ने अभी तक अपने घोषित एजेंडे के अनुरूप कोई ठोस निर्णय नहीं लिया है। पर राज्य में जेपीएससी की कथित धांधली के खिलाफ आंदोलन कर रहे युवाओं की शिकायतों पर संज्ञान नहीं लेना निराशाजनक है।

झारखंड एक राज्य नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक राष्ट्र है। अलग राज्य की मांग की पीछे आर्थिक शोषण दोहन से मुक्ति के अलावा राज्य की विशिष्ट भाषा सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा और संवर्धन भी निहित था।”

वे कहते हैं कि ”दुखद है कि झारखंडी भाषाओं को द्वितीय राजभाषा का दर्जा पाने के लिए अपने ही राज्य में ग्यारह वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा था। पर यह दर्जा मिले नौ सालों के बाद भी विकास के लिए सरकार की तरफ से कोई ठोस व्यवस्था नहीं की गई। न तो भाषा अकादमी का गठन किया गया और न इन भाषाओं के साहित्य के प्रकाशन का प्रबंध किया गया। सिर्फ लोक साहित्य की एक किताब  छपाई गई।”

जब हम ‘संथाल हूल’ की बात करते हैं तो जाहिर है भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा भी इसके केंद्र में आ जाती है। तब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले स्वतंत्रता सेनानी के नाम की चर्चा भी होनी शुरू हो जाती है, जहां राष्ट्रीय पटल पर मंगल पांडे का जिक्र होता है, जबकि सच यह है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम  स्वतंत्रता सेनानी तिलका मांझी थे।

बताना लाजिमी होगा कि 1771 से 1784 तक जंगल का बेटा तिलका मांझी ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया। उन्होंने कभी भी समर्पण नहीं किया, न कभी झुके और न ही डरे।

यहां बता देना जरूरी होगा कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 31 दिसम्बर 1600 ईस्वी में हुई थी। कम्पनी ने भारत के लगभग सभी क्षेत्रों पर अपना सैनिक तथा प्रशासनिक अधिपत्य जमा लिया था। ईस्ट इंडिया कंपनी एक बहुराष्ट्रीय कंपनी थी, इसके पास ताक़त थी, पैसा था, सेना थी, जासूसी विभाग था। इसने भारत समेत कई देशों में अंग्रेज़ों का राज स्थापित किया था।

ईस्ट इंडिया कंपनी अपना मुख्यालय बंगाल के कोलकाता में बनाया था। बंगाल सूबे का नवाब था सिराज़ुद्दौला, जिसकी राजधानी थी मुर्शिदाबाद। उस वक्त बंगाल में शामिल थे आज के झारखंड, बिहार, ओडिसा, पश्चिम बंगाल और बंगला देश। ईस्ट इंडिया कंपनी के रॉबर्ट क्लाइव ने नवाब सिराज़ुद्दौला पर 23 जून 1757 को अपनी सेना के साथ हमला कर दिया। यह युद्ध मुर्शिदाबाद के दक्षिण में 22 मील दूर नदिया जिले में गंगा नदी के किनारे ‘प्लासी’ नामक स्थान में हुआ था। इस लड़ाई में सिराज़ुद्दौला हार गया, क्योंकि युद्ध से पहले ही नवाब के तीन सेनानायकों, उसके दरबारी, तथा राज्य के अमीरचंद , जगत सेठ आदि को रॉबर्ट क्लाइव ने एक षडंयत्र के साथ अपने पक्ष में कर लिया था। अत: युद्ध के फ़ौरन बाद मीर जाफ़र के पुत्र ने नवाब की हत्या कर दी थी। युद्ध को भारत के लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण माना जाता है। इस युद्ध से ही भारत की दासता की कहानी शुरू होती है।

मगर हर चीज़ की एक हद होती है। 1857 तक ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह से पैदा हुए युद्ध की स्थिति के बाद कंपनी की लगातार होती हार से 1874 में अंग्रेज़ी सरकार ने कंपनी को पूरी तरह से बंद कर दिया।

11 फरवरी, 1750 को बिहार के सुल्तानगंज में तिलकपुर नामक गांव में एक संथाल परिवार में जन्मे तिलका मांझी के पिता का नाम सुंदरा मुर्मू था। वैसे तिलका मांझी का गोत्र मुर्मू था, जो उनके पिता के नाम में जुड़ा था, मगर तिलका का उपनाम मांझी इसलिए था कि वे संथाल समाज के अगुआ थे, जिसे मांझी हड़ाम कहा जाता है। इसी कारण उनका उपनाम मांझी था। कुछ इतिहासकार व लेखक तिलका मांझी का नाम जबरा पहाड़िया भी बताते हैं। इस बावत अवकाश प्राप्त प्रशासनिक अधिकारी संग्राम बेसरा जो खुद संथाल समाज से आते हैं, बताते हैं कि ”जबरा पहाड़िया और तिलका मांझी अलग अलग व्यक्ति थे।” वे कहते हैं कि ”पहाड़िया पहाड़ों में रहने वाली एक दूसरी जनजाति है, इसी जनजाति का था जबरा पहाड़िया।”

ईस्ट इंडिया कंपनी काे रॉबर्ट क्लाइव ने बंगाल सूबे पर कब्जे के बाद लोगों से लगान वसुलने के लिए जमींदारी प्रणाली तैयार की, जिसके बाद साहुकारों की भी एक बड़ी जामात तैयार हो गई, जो लगान देने के लिए लोगों को सूद पर कर्ज देते और बदले में उनकी जमीन जायदाद को अपने कब्जे में ले लेते। क्योंकि जमींदार के करिंदे लोगों से जबरन लगान वसूलते थे, नहीं देने की स्थिति में काफी शारीरिक प्रताड़ना दी जाती थी। यह सब किशोरावस्था से ही तिलका देखा करता था और लोगों को लगान न देने को प्रेरित करता था। जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही तिलका को मांझी की उपाधि दे दी गई।

तिलका मांझी ने क्षेत्र के संतालों को एकत्रित किया और अंग्रेजों, जमीन्दारों और साहूकारों के खिलाफ जंग छेड़ दी। यह लड़ाई 1771 से 1784 तक चली। 1784 में तिलका मांझी ने राजमहल के मजिस्ट्रेट क्लीवलैंड को मार डाला। इसके बाद आयरकुट के नेतृत्व में तिलका मांझी की गुरिल्ला सेना पर जबरदस्त हमला हुआ, जिसमें उनके कई लड़ाके मारे गए। बताया जाता है कि उसके बाद अंग्रेज ने तिलका को चार घोड़ों में एकसाथ बांधकर घसीटते हुए भागलपुर लाये। मीलों घसीटे जाने के बावजूद वह जिंदा रहा था। अंग्रेजों ने 13 जनवरी 1785 को भागलपुर के चौराहे पर स्थित एक विशाल वटवृक्ष में लटकाकर उनकी हत्या कर दी।

संग्राम बेसरा बताते हैं कि ”तत्कालीन बिहार के मोकामा से साहबगंज तक संथालों का कब्जा था। संथालों ने मुगलों को कभी भी टैक्स नहीं दिया था। अत: अंग्रेजी कंपनी के जमीन्दारों, साहूकारों और दलालों द्वारा इनसे टैक्स वसुलने और अपनी सत्ता इनपर स्थापित करने के कुप्रयास का ही नतीजा था यह युद्ध। जिसमें तिलका की हत्या कर दी गई।”

वे बताते हैं कि ”तिलका मांझी की हत्या के बाद अंग्रेजों सहित जमींदारों, साहुकारों और उनके दलालों का जहां मनोबल बढ़ता गया, वहीं संथाल जंगल की ओर पलायन करते गये। मगर अंग्रेजों, जमींदारों व साहूकारों के प्रति उनका आक्रोश भीतर ही भीतर बढ़ता गया। जो पुन: 71 साल बाद 1855 में सिद्धू-कान्हू, चांद-भैरव, फूलो-झानो के नेतृत्व में ‘संथाल हूल’ के रूप में उभरा।”

अंग्रेजी कंपनी की सत्ता और उसके समर्थक तत्वों, जैसे जमींदार, महाजन अमला, पुलिस आदि के द्वारा शोषण, उत्पीडन व जुल्म के खिलाफ इन सालों में अनेकों विद्रोह होते रहे। 1789 से 1831–32 के बीच अनेक आन्दोलन हुए, जिसमें 1831-32 में कोल विद्रोह मुख्य रहा। मानसून में भूमिजों का विद्रोह हुआ। इस विद्रोह के दौरान गांव लुटे गए, जलाये गए तथा पुलिस, सैनिकों सहित कई नागरिक मारे गये।

1855 के संथाल हूल यानी भारत का पहला जनयुद्ध को जानने के लिए उनके नायकों को जानना जरूरी है। उल्लेखनीय है कि संथाल परगना को अंग्रेजों द्वारा दामिन ए कोह कहा जाता था और इसकी घोषणा 1824 को हुई थी। इसी संथाल परगाना में संथाल परिवार में संथाल हूल के नायकों का जन्म हुआ जिसे हम सिद्धू-कान्हू के नाम से जानते हैं।

बता दें इसी संथाल परगना के साहबगंज के भोगनाडीह नामक गांव में चुन्नी मांझी के घर में सिद्धू मुर्मू का जन्म 1815 ई0 एवं कान्हू मुर्मू का जन्म 1820 ई0 में हुआ था। इस हूल में सक्रिय भूमिका निभाने वाले इनके दो भाई चाँद मुर्मू का जन्म 1825 ई0 में एवं भैरव मुर्मू का जन्म 1835 ई0 में हुआ था। इनकी दो बहनें फुलो मुर्मू एवं झानो मुर्मू भी इनसे कम नहीं थीं।

उल्लेखनीय है कि अंग्रेजी कंपनी और उसके समर्थकों, जमींदारों, महाजनों, साहुकारों और उनकी पुलिस आदि के द्वारा लूट-पाट, शोषण, बलात्कार जैसे उत्पीड़न व जुल्म से  त्रस्त संथाल भागते फिर रहे थे, लेकिन उनकी अधीनता स्वीकार करने को कतई तैयार नहीं थे। इन तमाम घटना क्रम को देखते हुए सिद्धू-कान्हू ने संथाल गांवों में डुगडुगी बजवा कर 400 गांवों को न्योता दिया। 30 जून, 1855 को 400 गांवों के करीब 50 हजार आदिवासी भगनाडीह गांव पहुंचे, एक विराट सभा हुई और इसी सभा में यह घोषणा कर दी गई कि वे अब मालगुजारी नहीं देंगे। यही से अंग्रेजी कंपनी और उसके समर्थकों के खिलाफ विद्रोह शुरू हुआ जो जनयुद्ध में बदल गया। इसके बाद अंग्रेजी कंपनी ने सिद्धू, कान्हू, चांद तथा भैरव- इन चारों भाइयों को गिरफ्तार करने का आदेश दिया। जिस दरोगा को चारों भाइयों को गिरफ्तार करने के लिए वहां भेजा गया था, संथालियों ने उसकी गर्दन काट कर हत्या कर दी। इस दौरान कंपनी के अधिकारियों में भी इस विद्रोह से भय पैदा हो गया था।

परिणामत: इसे दबाने के लिए अंग्रेजों ने इस इलाके में सेना भेज दी और जमकर आदिवासियों की गिरफ्तारियां की गईं और विद्रोहियों पर गोलियां बरसने लगीं। आंदोलनकारियों को नियंत्रित करने के लिए मार्शल लॉ लगा दिया गया। इनकी गिरफ्तारी के लिए कंपनी ने सिद्धू ,कान्हू को पकड़ने के लिए 10,000 हजार रुपए इनाम की घोषणा की।

इस विद्रोह के साथ संथालों सहित उस क्षेत्र में रहने वाले कई गैर-संथाली लोगों ने भी बड़ी हिस्सेदारी निभाई। जिनमें मंगरा पुजहर (पहाड़िया), गोरेया पुजहर (पहाड़िया), हरदास जमादार (ओबीसी), ठाकुर दास (दलित), बेचु अहीर (ओबीसी), गंदू लोहरा, चुकू डोम (दलित), मान सिंग (ओबीसी) और गुरुचरण दास (दलित) शामिल थे। जबकि इनमें से पहाड़िया आदिवासी समुदाय के मंगरा पुजहर और गोरेया पुजहर, ओबीसी वर्ग के हरदास जमादार व बेचु अहीर और दलित वर्ग के ठाकुर दास को हूल में अग्रणी भूमिका निभाने के कारण फांसी दी गई थी। वहीं गंदू लोहरा, दलित वर्ग से आने वाले चुकू डोम और ओबीसी के गुरुचरण दास को सश्रम आजीवन कारावास मिली थी। जबकि ओबीसी के ही मान सिंह को आजीवन देश निकाला दिया गया था। क्षेत्र के सवर्णो को छोड़कर पिछड़ी व दलित वर्ग के लोग इस हूल में शामिल थे।

इस जनयुद्ध ने अंग्रेजों को पानी पिला कर रख दिया था कि 10,000 हजार रुपए इनाम की लालच ने काम किया और अपनों में से ही किसी ने मुखबिरी करके सिद्धू-कान्हू को पकड़ा दिया। अत: 26 जुलाई 1855 को भोगनाडीह गांव में ही पेड़ से लटका कर उनकी हत्या कर दी गई। वहीं बहराइच में चाँद और भैरव को मार दिया गया।

कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह हुल एक संगठित युद्ध था, जो बगैर स्थानीय अन्य समुदायों के संचालित नहीं किया जा सकता था। इस जनयुद्ध में विशेष रूप से कारीगर और अन्य खेतीहर समुदायों का पूरा सहयोग था। क्योंकि यह सिद्धू-कान्हू की हत्या के बाद भी 1855 से 1865 यानी दस वर्षों तक यह रुक-रुककर चलता रहा। सिद्धू-कान्हू की हत्या के बाद कुछ महीनों तक यह शिथिल रहा। तो जाहिर है इतने लंबे समय तक चला यह युद्ध बिना व्यापक तैयारी व बगैर योजना के नहीं चलाया जा सकता था।

दूसरी तरफ अंग्रेज कंपनी के विरोध में चल रहे इस युद्ध के लिए जितने संसाधनों जरूरत थी, उसे अकेले संथालों द्वारा जुटा पाना संभव नहीं था। अगर पारंपरिक हथियारों तीर-धनुष, टांगा, बलुआ आदि की हम बात करें तो वह लुहारों के सहयोग के बिना जुटा पाना संभव नहीं था। वैसे भी ये जतियां भी संथालों की ही तरह ब्रिटिश कंपनी की नीतियों और सामंतों, महाजनों, साहूकारों व व्यापारियों से पीड़ित थीं। अत: 30 जून 1855 को जब सिद्धू ने खुद को ‘सूबा ठाकुर’ (क्षेत्र का सर्वोच्च शासक) घोषित किया और अंग्रेजों को इलाका छोड़ने का ‘फरमान’ जारी किया, तो उनके साथ उत्पीड़ित होने वाले गैर-आदिवासी समूह भी गोलबंद हो गए। वहीं यह भी सच है कि इन्हीं में से किसी ने मुखबिरी करके सिद्धू-कान्हू को पकड़वाया था, जिससे संथालों में आज भी दिकूओं यानी गैर-आदिवासियों पर भरोसा नहीं होता है।

झारखंड सरकार में प्रशासनिक अधिकरी रह चुके संग्राम बेसरा कहते हैं कि ”मैं किसी जाति विशेष का नाम नहीं लेना चाहता, लेकिन थोड़े से पैसों की लालच में दिकूओं ने एक बड़े बदलाव को उसके शुरू होते ही रोक दिया जो भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास का काला अध्याय कहा जा सकता है।”

वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में तत्कालीन हुल के महत्व पर वे कहते हैं कि ”आदिवासियों को आज किसी हूल की जरूरत नहीं पड़ेगी बशर्ते अनुसूचित क्षेत्रों में भारतीय संविधान का 244 (क) अनुच्छेद यानी स्वशासन की व्यवस्था और संविधान की पांचवीं अनुसूची पेसा एक्ट 1996 यानी ग्राम सभा का अधिकार है, लागू हो।”

वे कहते हैं कि ”अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज पूरी तरह गैर कानूनी है।”

बेसरा कहते हैं कि ”संथाल हूल के साथ इतिहासकारों ने बेइमानी की ही है, साथ-साथ सरकारें भी इसके महत्व पर केवल औपचारिकता भर पूरी करती रही हैं। जिसे बोलने की नहीं महसूसने की है।”

कवि लेखक व आदिवासी-भाषा, साहित्य, संस्कृति इतिहास के अध्ययनकर्ता एवं शोधकर्ता महादेव टोप्पो तत्कालीन हुल की प्रासंगिकता पर कहते हैं कि ”चूंकि आज आदिवासी समाज को गुलाम भारत की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, भाषिक व आध्यात्मिक स्थितियों से भी बुरी, बदतर व बदहाल हालत में जीवन जीने के लिए मजबूर किया जा रहा है, अतः आज भी एक और बड़े और एकजुट हूल की जरुरत महसूस की जा रही है।”

सामाजिक कार्यकर्ता दयामणि बारला कहती हैं कि ”इतिहास गवाह है कि इस राज्य की धरती को हमारे पूर्वजों ने सांप, भालू, सिंह, बिच्छु से लड़ कर आबाद किया है। इसलिए यहां के जल-जंगल-जमीन पर हमारा खूंटकटी अधिकार है। हम यहां के मालिक हैं। जब जब हमारे पूर्वजों द्वारा आबाद इस धरोहर को बाहरी लोगों ने छीनने का प्रयास किया तब-तब यहां विद्रोह उठ खड़ा हुआ है। इस राज्य के जलन-जंगल-जमीन को बचाने के लिए तिलका मांझी, सिद्धू-कान्हू, फूलो-झाणो, सिंदराय—बिंदराय, वीर बिरसा मुंडा, गया मुंडा, माकी मुंडा जैसे वीरों ने अपनी शहादत दी है। मतलब जब-जब हमारे जल-जंगल-जमीन पर बाहरी हमला होगा, तब-तब ‘हूल’ की प्रासंगिकता बनी रहेगी।”

सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स हेरेंज कहते हैं कि ”तत्कालीन भारत का यह पहला विद्रोह था। जिसमें अबुआ राज (अपना राज) की घोषणा हुई और सिद्धू मुर्मू ने यह ऐलान किया कि मुल्क पर अपना अधिकार है, हम अंग्रेजों को कोई कर नहीं देंगे।

आज जब सभी विकसित देशों की गिद्ध दृष्टि झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, मध्यप्रदेश जैसे प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध राज्यों पर टिकी हैं। कारपोरेट और पूंजीपति भारतीय संसद और शीर्ष संवैधानिक संस्थाओं में बैठकर संसाधनों पर अवैध कब्जे की साजिशें रच कर आदिवासी समुदाय को संसाधनों से बेदखल करने लगे हैं। 5वीं अनुसूचित क्षेत्र में संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत केन्द्रीय अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती बदस्तूर जारी है।” वे आगे कहते हैं कि ”विकास परियोजनाओं के नाम पर आदिवासियों को सामुदायिक संसाधनों से बेदखल करना यह साबित करता है कि झारखण्ड के रूप में अबुआ राज तो मिल गया है। लेकिन दिकू मानसिकता के शासकों और नीति निर्माताओं ने झारखण्डियों के झारखण्डी सपनों को कुचलने की हर संभव कोशिश में लगे हैं। जिसके परिणाम स्वरूप असंतोष की ज्वाला अन्दर ही अन्दर सुलग रही हैं। यह कभी भी विद्रोह का रूप ले सकती है।”

सराय केला खरसवां के सामाजिक कार्यकर्ता अनूप महतो कहते हैं कि ”उस वक्त शोषक थी ब्रिटिश कंपनी, देशी सूदखोर, महाजन, जमींदार, आज शोषक का चेहरा बदला है चरित्र वही है, इस चरित्र को भारतीय पूंजीवाद कहते हैं। उस वक्त सिद्धू-कान्हु ने सभी जाति व मजहब के गरीब मेहनतकश लोगों को संगठित कर देशी-विदेशी हुक्मरानों के खिलाफ हूल का नारा दिया था, आज भी यह जरूरी है कि सभी जाति, धर्म व भाषा गरीब मेहनतकश लोगों को संगठित कर भारतीय पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष कर उसे सत्ता से उखाड़ फेका जाय।

जब तक पूंजीवाद रहेगा तब तक गैर बराबरी और शोषण भी रहेगा। यह पूंजीवादी विकास ने आदिवासियों का अस्तित्व ही मिटा दिया है। पूंजीवाद का तो दर्शन ही है जिसे लूट सको तो लूट लो। और इस लूट की प्रक्रिया में सबसे सुलभ शिकार दलित-आदिवासी ही होते हैं। जब तक इस देश में पूंजीवाद है, आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन, संस्कृति, भाषा सब कुछ पर हमला जारी होता रहेगा। अत: आज भी हूल की वही प्रासंगिकता जो 1855 में थी। इस जनयुद्ध को आगे बढ़ाते हुए समाजवादी क्रांति के जरिए मेहनतकशों का राज कायम करना होगा।”

 

 विशद कुमार, झारखंड के स्वतंत्र पत्रकार हैं और लगातार जन-सरोकार के मुद्दों पर मुखरता से ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे हैं। यह लेख पिछले साल इसी दिन मीडिया विजिल पर छप चुका है।

 

 

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