मुसलमानों को बसपा की राजनीति का दोबारा मूल्यांकन करने की ज़रूरत क्यों है?

राज्यसभा में नागरिकता संशाेधन विधेयक को 20 वोटों के अंतर से पारित कराने में दो वोटों के रूप में बहुजन समाज पार्टी का भी हाथ रहा है, जिसके दो सांसद राजाराम और अशाेक सिद्धार्थ मौके पर नामौजूद रहे। इसके अलावा शिवसेना ने तो वाकआउट किया ही, लेकिन उसकी दक्षिणपंथी राजनीतिक विचारधारा के कारण उसका यह कदम चौंकाता नहीं हे। मुसलमानों को लेकर बसपा के रुख़ पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। इस मौके पर कांग्रेस के नेता शाहनवाज़ आलम ने एक मौजूं टिप्पणी अपने फेसबुक पर लिखी है जिसे पढ़ा जाना चाहिए। (संपादक)


पिछले दिनों डॉ. अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर मऊ के एक गांव में उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कार्यक्रम में जाना हुआ। वहां किसी ने अगरबत्ती लाने की बात की। मैंने मना किया कि ऐसा करना अम्बेड कर के विचारों के ख़िलाफ़ है। लोग मान गए। लेकिन इससे ये अंदाज़ा लग सकता है कि अम्बेडकर का पर्याप्त मनुवादीकरण हो चुका है और ऐसा ख़ुद बसपा समर्थकों ने किया है। वहां उपस्थित लोगों से बातचीत के दौरान जब मैंने उनसे पूछा कि पुण्यतिथि और महापरिनिर्वाण में क्या फ़र्क़ होता है तो वो नहीं बता पाए। आश्चर्य कि उन्हें अम्बेडकर की 22 प्रतिज्ञाओं के बारे में भी कुछ पता नहीं था। तय किया गया कि उनकी 22 प्रतिज्ञाओं को बोल कर पढ़ा जाए और इन प्रतिज्ञाओं के आलोक में अपने आचरण को परखा जाए। अंत में सर्वसम्मति से निष्कर्ष निकाला गया कि वहां मौजूद अधिकतर लोग इन प्रतिज्ञाओं के ख़िलाफ़ ही आचरण करते हैं।

दरअसल, उत्तर प्रदेश की बसपा छाप दलित राजनीति ने दलितों के एक हिस्से को सिर्फ़ डॉ अम्बेडकर की तस्वीर ही पहचनवाई, उनके विचारों को उन तक नहीं पहुँचने दिया। जिससे अम्बेडकर किसी सामाजिक परिवर्तन के बजाए सिर्फ़ सत्ता में भागीदारी के प्रतीक बना दिए गए, वो भी सिर्फ़ एक वर्ग-जाति के लिए। इस प्रतीक के इर्दगिर्द ऐसी गोलबंदी हुई जिसके लिए अम्बेडकर का मतलब आरक्षण हो गया। हर जगह किसी भी तरह समायोजित हो जाना ही बाबा साहेब के सपने को पूरा करना हो गया। बाहर से गतिशील दिखने वाला यह वर्ग (जिसकी गति की मूल में एक तरह का ‘गोल्ड रश’ था) अंदर से उतना ही वैचारिक खोखलेपन का शिकार था। इसने सबसे पहले ‘अवसरवाद’ को एक राजनैतिक सिद्धांत के बतौर स्थापित किया। उसने हर तरह के वैचारिक पतन को अतीत में अवसर न दिए जाने के तर्क की आड़ में जायज़ ठहराने की कोशिश की।

इस अम्बेडकर विरोधी ‘दलितवाद’ का सबसे ज़्यादा नुकसान मुसलमानों को उठाना पड़ा क्योंकि इस वैचारिकी पर खड़े दलित धर्मनिरपेक्ष और साम्प्रदायिक होने का चुनाव अपने हितों के अनुरूप करने लगे। उन्हें जहां ‘सेट’ हो जाने का अवसर मिला वो चले गए। इस वर्ग ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंदुत्व के एजेंडे को बहुजनवाद के नाम पर चलाया। मसलन, क्या वजह थी कि दलित मुसलमानों के आरक्षण के सवाल (341) पर मायावती खामोश रहती हैं। या आख़िर क्या वजह थी कि मुस्लिम नाम वाले जिलों और शहरों का ही नाम मायावती ने बदल कर दलित महापुरुषों के नाम पर किया।

आज जब NRC की बात हो रही है तब मुसलमानों को यह याद रखने की ज़रूरत है कि क़ानूनी तौर पर भले मुसलमानों को देश की नागरिकता से ख़ारिज करने की कोशिश आज भाजपा सरकार में हो रही है लेकिन उनकी पहचान को खारिज़ करने की कोशिश बहुत पहले से बसपा छाप दलित राजनीति करती रही है और वो भी मुसलमानों से वोट लेकर। आज जब मुसलमानों को नागरिक मानने से ही इनकार करने के लिए क़ानून बन रहा है तब मुसलमानों को याद रखना होगा कि कैसे 2014 के चुनाव में पूर्वांचल के कुछ हिस्सों में दलितों के बीच यह बात फैलाई गई कि मोदी के सत्ता में आने के बाद मुसलमानों के घरों और संपत्तियों पर उनका अधिकार हो जाएगा और उनका एक बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ चला गया। यह दरअसल ‘हिस्सेदारी’ के तर्क का ही विस्तार था।

उन्हें आज यह भी याद रखने की ज़रूरत है कि कैसे बलिया, देवरिया, मऊ जैसे इलाक़ों में जहां गोंड़ बिरादरी के लोग ‘शाह’ टाइटल लगाते हैं, के एक बड़े हिस्से ने भाजपा को इसलिए वोट कर दिया कि उन्हें बताया गया कि अमित शाह गोंड़ हैं।

मुसलमानों को इस पर सोचना होगा कि गुजरात के दलितों के कई नेता, मसलन भारतीय बौद्ध संघ के अध्यक्ष संघ प्रिय राहुल भाजपा के ख़िलाफ़ अपने साथ सौतेला व्यवहार करने का आरोप लगाते हुए कहते हैं कि उन्होंने उनके लिए मुसलमानों को 2002 में निपटाया लेकिन बदले में भाजपा ने उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया। ये मुस्लिम विरोधी दलित पहचान और सम्मान के फ़लक का ही विस्तार था। जिसमें उन्हें हर हाल में जगह चाहिए थी। उन्हें उचित उपहार मिलना चाहिए था।

मुसलमानों के लिए हरी घास में छुपे हरे सांप साबित होने वाले बसपाई ऐसे सवालों पर कहते हैं कि संघी दलितों को बरगलाते हैं और वो उनके झांसे में आ जाते हैं। लेकिन यह झांसे में आने का मामला नहीं है। यह दरअसल अंबेडकर विरोधी दलित चेतना की तार्किक परिणति है। यह अम्बेडकर के मतलब को आरक्षण या हिस्सेदारी तक सीमित कर देने का स्वाभाविक परिणाम है।

आज मुसलमानों को बसपा की राजनीति का मूल्यांकन करना होगा। जब ईमानदारी से ये मूल्यांकन होगा तब उन्हें समझ में आएगा कि 370 पर बसपा का स्टैंड हिंदुत्वादी से ज़्यादा अम्बेडकर विरोधी दलितवादी स्टैंड है। क्योंकि मायावती जी को जो चाहिए वो भाजपा उन्हें दे रही है। वादी कश्मीर के कुछ सीटों को सुरक्षित किया जा रहा है।

आज मुसलमानों को तमाम साम्प्रदायिक हमलों में अग्रिम पंक्ति में खड़े लोगों के नामों को फ़िर से देखने की ज़रूरत है ताकि वो अपनी मूर्खताओं पर पुनर्विचार कर सकें।

आज जब अपनी नागरिकता बचाने के इस संघर्ष में मुसलमान अकेले पड़ गए हैं तब उन्हें सोचना चाहिए कि आख़िर पिछले 3 दशकों में उन्होंने जिन्हें अपने वोट और नोट से पाला पोसा वो आज दुश्मन के ख़ेमे में क्यों खड़े हैं। उसे बहुत गौर से देखना होगा कि कौन सी पार्टी चट्टी चैराहों पर इस देशविरोधी बिल की प्रतियां फूंक रही है और कौन सिर्फ़ बयानबाज़ी तक सीमित है।

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