लेफ्ट लिबरल मीडिया मोदी-शाह का दिमाग क्‍यों नहीं पढ़ पाता है?

लोहा सिंह

उत्‍तर प्रदेश में अचानक कुछ हुआ है क्‍या? इतिहास का यह कैसा दिन है आज? क्‍या ईश्‍वर ने वाकई हमें भुला दिया है?

दो दिन पहले एग्जि़ट पोल में पहला झटका लगा था। गुरुवार की उस शाम यह कहने की सुविधा थी कि सारे एग्जि़ट पोल गलत हैं, तो उन्‍होंने कह दिया कि चुनावी भविष्‍यवाणियां तो बकवास होती हैं। शनिवार की शाम हालांकि वे अचानक उखड़ गए और ऐसे तनकर चल रहे थे गोया सीधे दुख के सागर में छलांग लगा देंगे।

अब वे कह रहे हैं कि लहर का अनुमान कोई नहीं लगा सकता। बेशक लगा सकता है। बशर्ते आंख-कान खुले हों। खुले हों मतलब वाकई खुले हों। सब के लिए।

इसके लिए आपको उन आवाज़ों को सुनना होगा जिन्‍हें सुनना आप पसंद नहीं करते। उन लोगों को देखना होगा जिन्‍हें देखना आपको नहीं भाता। उन्‍हें दिल से लगाने की ज़रूरत नहीं है। दिक्‍कत ये है कि हम उनके वजूद से ही इनकार किए बैठे रहते हैं।

सूचनाओं से लबरेज़ इस जगत में हम आत्‍मपुष्टि के दौर से गुज़र रहे हैं। जिस सूचना में हमारी आस्‍था नहीं, उस पर हम काम ही नहीं करना चाहते। हम तो बस इतना चाहते हैं कि जिस चीज़ में हमारी आस्‍था है, उसे कनफर्म कर लिया जाए। इसी चक्‍कर में हम मान बैठते हैं कि नोटबंदी जैसा कदम आत्‍मघाती था और अपने इस विश्‍वास को पुष्‍ट करने के लिए हमें पर्याप्‍त आवाज़ें भी मिल जाती हैं।

मसलन, यदि हम मानते हों कि एक एक्‍सप्रेसवे ने एक मुख्‍यमंत्री के प्रति कायम धारणा को बदल डाला है, तो ऐसा कहने वाले हम काफी लोग ढूंढ लेंगे। अगर गलती से कहीं हमें ढेर सारे लोग यह कहते हुए मिल गए कि नोटबंदी का कदम स्‍वागत योग्‍य था, तो उनके लिए हमारे पास पहले से एक ठप्‍पा मौजूद है। आजकल भक्‍त का ठप्‍पा सबसे ज्‍यादा चलन में है।

ठीक इसी तरह हम किसी व्‍यक्ति को सनकी वामपंथी कह देते हैं क्‍योंकि हम मानते हैं कि समाजवाद तो खत्‍म हो चुका।

ऐसे ही हम किसी को इस्‍लामोफोब का तमगा दे डालते हैं, भले उसका भय जायज़ हो। अगर कोई मुसलमानों के लिए समान अधिकारों की बात कर रहा है तो हम उसे इस्‍लामिस्‍ट बोल देते हैं।

हम लोग दरअसल उन्‍हीं लोगों से संवाद करते हैं जो हमें पसंद होते हैं। जो आवाज़ें हमें पसंद नहीं उन्‍हें हम बंद कर देते हैं।

हम अपने-अपने खोल में सिमट कर जीने वाले लोग हैं जहां अपनी ही आवाज़ की गूंज हम तक लौट कर आती है। सोशल मीडिया पर हमारी टाइमलाइनें एकदम स्‍वच्‍छ होती हैं। अनचाही टिप्‍पणियों के प्रदूषण से बिलकुल मुक्‍त। कोई अगर हमारी पसंद से उलट ट्वीट कर रहा हो, तो हम झट से उसे ब्‍लॉक कर देते हैं।

और हमने खुद को लिबरल यानी उदार घोषित कर रखा है। हम मुक्ति में विश्‍वास करते हैं। अपनी मुक्ति में। हमारा उदारवाद केवल अपने जैसे लोगों के प्रति उदार रहने तक सीमित है। हम परिभाषाओं के सिर पर सवारी करते हैं।

हम लोग लगातार लोकतंत्र के लिए कैम्‍पेन करते हैं और जब नतीजा अपनी पसंद का नहीं आता तो उसे खारिज कर देते हैं, दिमागी रूप से उसे मानने से इनकार कर देते हैं और इसे बात को जहां मर्जी वहां मुखर होकर बोलते भी हैं। हमें लगता है कि जनता ने किसी को चुनकर भयानक गलती कर दी है। फिर हम उनके बारे में सच्‍चाइयों का पता लगाते हैं, उनके बारे में झूठ की पड़ताल करते हैं और वह सब कुछ खोजखाज कर निकाल डालते हैं जिनके सहारे उन्‍हें हम कठघरे में खड़ा कर सकें।

हम अपनी जगह पर अड़े रहते हैं। वे अपनी जगह।

फिर लोग उसी को दोबारा चुन लेते हैं। तब हमें आश्‍चर्य होता है कि क्‍या सब लोग वाकई पागल हो चुके हैं। क्‍या जनता ने अच्‍छे और सच्‍चे लोगों से नफ़रत करना शुरू कर दिया है? चूंकि हम लोग तो पैदाइशी अच्‍छे हैं, सही हैं!

हम लोग अपनी पसंद के लोगों को ही फॉलो करते हैं। हम वही पढ़ते हैं जो हमारे लिखने के काम आए। हम असहमति के अधिकार के लिए लड़ते हैं, लेकिन हमारी संकुचित दुनिया में ही असहमति के लिए जगह नहीं है। हम लोकतंत्र के लिए संघर्ष करते हैं लेकिन उसके परिणाम को पसंद नहीं करते। हम लोग लोकतंत्र को अपनी बपौती मानते हैं और उसके नतीजों को नीची निगाह से देखते हैं। हम लोग समाज में गहराती खाइयों का रोना रोते हैं लेकिन इस बात में यकीन नहीं करते कि यह खाई कभी तो गायब होगी। हमारी यह मान्‍यता इतनी ताकतवर है कि जहां कहीं यह खाई नहीं होती, वहां भी हम इसे खोज निकालते हैं।

हम मानते हैं कि मतभेदों को संवाद-विवाद से नहीं बल्कि जोर-जबर से ही दुरुस्‍त किया जा सकता है लेकिन जिन लोगों पर हमने फासीवादी होने की मुहर लगा दी है उनके साथ संवाद में नहीं आना चाहते। हम प्रत्‍येक इंसानी जिंदगी को कीमती मानते हैं लेकिन अपने दिल के कोने में कहीं यह मनाते रहते हैं कि जिन्‍हें हम फासीवादी मानते हैं वे मरें नहीं, तो कम से कम कष्‍ट ज़रूर झेलें।

जिन समूहों को हम अपना मानकर संरक्षण देते हैं, वे यदि हमारी नफ़रत वाले समूहों के करीब जाते हैं तो यह बात हमें बिलकुल पसंद नहीं आती। हम ईमानदारी से इस बात में यकीन करते हैं कि प्रेम से ही नफ़रत को मिटाया जा सकता है लेकिन अपने दिल की गहराइयों में हम तमाम लोगों से खूब नफ़रत करते हैं, जैसे ट्रम्‍प।

हम समाज के एक बड़े तबके को सुनने से ही इनकार कर देते हैं क्‍योंकि उनकी समझदारी हमारे जितनी नहीं है। वे लोग फिर ऐसे किसी शख्‍स को खोज लेते हैं जो उन्‍हें सुनता हो। फिर हम उन्‍हें गाली देते हैं और ऐसे नए तथ्‍यों, विचारों, सूचनाओं की तलाश में निकल पड़ते हैं जो हमारी उपेक्षा को पुष्‍ट कर सके। हम ऐसे नए आख्‍यानों की खोज में रहते हैं जो हमारी अपनी खोल के भीतर हमें सुकून मुहैया करा सकें। हम दूसरों को दूसरा मानते हैं, संदिग्‍धों को छांट कर अलग कर देते हैं और हर रोज़ अपने खोल को, अपने दायरों को और सिकोड़ते चले जाते हैं।

इस तरह हम मुट्ठी भर रह जाते हैं। हमारी ताकत इतनी कम रह जाती है कि अपने खयालों में भी अपने ऊपर दमन की हम निंदा नहीं कर पाते। वास्‍तविक नाइंसाफियों के खिलाफ़ आवाज़ नहीं उठा पाते।


(यह लेख Dailyo.in से साभार प्रकाशित है। अनुवाद अभिषेक श्रीवास्‍तव ने किया है। यह 11 मार्च को Dailyo.in पर प्रकाशित हुआ था। मूल लेख यहां पढ़ सकते हैं)

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