घाटमपुर के संघर्षरत किसानों को कैसे अखिलेश सरकार ने बना दिया गुंडा, पढि़ए पीयूसीएल की रिपोर्ट

कानपुर से तकरीबन 55 किलोमीटर दूर घाटमपुर तहसील के लहुरीमऊ गाँव (थाना-सचेती) में नेवली पॉवर प्लांट के द्वारा अधिग्रहित की गयी ज़मीन के खिलाफ व उचित मुआवज़े के सवाल पर यहाँ के किसान पिछले 21 नवम्बर 2016 से लोकतांत्रित तरीके से धरना दे रहे थे. 15 दिसम्बर 2016 को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की एक सभा में उपद्रव करने के नाम पर यहाँ के किसानों पर मुकदमा दर्ज किया गया, फिर 18 दिसम्बर 2016 को पुलिस पर हमला करने के नाम पर विभिन्न धाराओं में किसानों पर मुक़दमे दर्ज किये गए. इन सबके बावजूद किसानों का धरना व प्रतिरोध ज़ारी रहा. मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक इसी 18 जनवरी को किसानों के आन्दोलन को ख़त्म करने के उद्देश्य से आन्दोलन के दो प्रमुख नेताओं को स्थानीय प्रशासन द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया.

उचित मुआवज़े को लेकर चल रहे इस आन्दोलन के प्रति अपनी एकजुटता जाहिर करने के लिए व किसानों व आदोलन के प्रति सरकार की भूमिका पर मामले की हकीकत जानने के लिए पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) का एक जांच दल 11 जनवरी 2017 को घाटमपुर तहसील के लहुरीमऊ गाँव में गया. जांच दल में पत्रकार व पीयूसीएल कानपुर इकाई के अध्यक्ष विजय चावला, पीयूसीएल कानपुर इकाई के उपाध्यक्ष राम शंकर, रिहाई मंच के महासचिव राजीव यादव व रिहाई मंच के नेता व स्वतंत्र पत्रकार शरद जायसवाल शामिल थे. जांच दल ने गाँव के किसानों से ज़मीन, मुआवज़े, पुलिस-प्रशासन की भूमिका, सरकार की भूमिका व आन्दोलन की स्थिति पर बात-चीत की. इसके साथ-साथ जांच दल ने नेवली पॉवर प्लांट के अधिकारियों से बात करने की कोशिश की लेकिन पॉवर प्लांट के सारे अधिकारी वहां से नदारद थे. एक अधिकारी वहां मौजूद भी थे पर उन्होंने जांच दल से बातचीत करना मुनासिब नहीं समझा. किसानों से हुई बातचीत के आधार पर तैयार की गयी संक्षिप्त रिपोर्ट इस प्रकार है.

यमुना के किनारे स्थित लहुरीमऊ गाँव के जानकी धर्मशाला में किसान पिछले साल के 21 नवम्बर से धरने में बैठे हैं. यहाँ के किसान जिस जानकी धर्मशाला में धरना दे रहे हैं, वहां से चंद मीटर के फासले पर निर्माणाधीन नेवली पॉवर प्लांट है जो किसानों से अधिग्रहित की गयी ज़मीन पर बनाया जा रहा है. नेवली पॉवर प्लांट के द्वारा अधिग्रहित भूमि को बिना मुआवजा दिए कब्ज़ा कर लेने के विरोध में यहाँ आठ गाँव के किसानों के द्वारा लगभग दो महीने से अनिश्चितकालीन धरना चल रहा है. उन आठ गाँव में सिंधौल, बगरिया, लहुरीमऊ, रामपुर, बाँध, धरछुआ, असवारमऊ, सिरसा, कासिमपुर हैं. इन आठ गाँव के तकरीबन 1850 किसानों से पॉवर प्लांट के लिए जमीन को कब्जे में लिया गया है. ज़मीन को अधिग्रहित करने का काम चार साल पहले ही सरकार के द्वारा किया जा चुका है जबकि मुआवज़े की रकम अभी कुछ ही लोगों को दी गयी है. पिछले चार सालों से यहाँ के अधिकाँश किसानों को न तो कोई मुवाज़ा मिला है और ज़मीन से बेदखल किये जाने के चलते ये अपने खेत में खेती भी नहीं कर पा रहे हैं. सरकार की इस करवाई ने इन किसानों को सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया है. इस परियोजना की शुरुआत यूपीए 2 के कार्यकाल में हुई थी जब श्री प्रकाश जायसवाल कोयला मंत्री थे. उस समय ही किसानों से सरकार ने ये वायदा किया था की चार गुना मुआवजा दिया जाएगा. उसके बाद केंद्र में बीजेपी की सरकार बनी और पॉवर प्लांट के कार्यक्रम को केंद्र व राज्य सरकार के सहयोग से आगे बढ़ाने का काम जारी रहा. लेकिन किसानों के सवाल आज भी जस के तस बने हुए हैं. कासिमपुर लहुरीमऊ के किसान नेता अशरफ उर्फ़ दद्दू ने जांच दल को बताया कि कुल 1850 किसानों से पॉवर प्लांट के लिए ज़मीन ली गयी हैं यहाँ के किसान शुरू से यह कह रहे हैं कि उन्हें मुआवज़े के रूप में चार गुना रकम दी जाए, यह चार गुने से हमारा तात्पर्य सर्किल रेट और बाज़ार रेट में जो ज्यादा हो वह मुआवजा किसानों को दिया जाए. सर्किल रेट इस समय 18 लाख रूपए प्रति हैक्टयेर है. उस समय जो समझौता हुआ था, वह 4 लाख 30 हज़ार रूपए प्रति बीघा के हिसाब से मुआवजा दिया जाएगा. और अगर इस बीच ज़मीन की कीमत बढती है तो बढ़ी हुई कीमत के हिसाब से मुआवजा दिया जाएगा. 9 दिसम्बर 2013 को केवल कुछ किसानों (पांच किसानों को) को इस दर से मुआवज़े की रकम अदा की गयी थी. अशरफ उर्फ़ दद्दू आगे कहते हैं कि ये मुआवजा इसलिए दिया गया था क्योकि 2014 में जमीनों का रेट बढ़ना था. इसलिए कम्पनी ने जान बूझ कर कुछ लोगों को मुआवजा दे दिया था. जिसको आधार बनाकरपर आगे भी इसी दर से कंपनी के द्वारा भुगतान करने में कोई बाधा न खड़ी हो. शुरू में हमसे कहा गया था कि जब पॉवर प्लांट का काम शुरू होगा तो यहाँ के मजदूरों को ही काम पर रखा जाएगा लेकिन इन चार सालों में यहाँ के एक भी मजदूर को काम नहीं मिला है. इन लोगों ने ग्राम सभा की ज़मीन को भी नहीं बक्शा है. हमारे गाँव में लगभग 300 बीघा जमीन ग्राम सभा की है, उस पर भी जबरन कब्ज़ा कर लिया गया है. उसके लिए आज तक कोई नोटिस भी नहीं आया है.

जांच दल को भारतीय किसान यूनियन, हमीरपुर महिला प्रकोष्ठ की जिलाध्यक्ष विशेखा राजपूत ने बताया कि हमीरपुर में मुख्यमंत्री जी 15 दिसम्बर 2016 को आये थे. उनको हम ज्ञापन देने गए थे. दरअसल उससे दो दिन पहले ही सपा के पूर्व सांसद राकेश सचान यहाँ गाँव में आये थे और उन्होंने ही कहा था कि मुख्यमंत्री जी को ज्ञापन दे दो और हमें देखना है कि आप लोगों के साथ कितने किसान हैं. हम लोग अपनी भीड़ के साथ ही गए थे. वहां जाने से पहले हमें रोका गया लेकिन हम नहीं रुके आखिर हम अपनी समस्या किसे सुनायेंगे. जब हम वहां पहुचे तो एडीएम साहब ने कहा कि सिर्फ पांच लोग आईये. पांच की जगह हम सिर्फ चार ही लोग गए. हम चार लोगों को वे ले तो गए लेकिन हम लोगों को मंच के पीछे छुपा दिया और हमारे साथ जो किसान जनता थी, उन्हें लगा की पुलिस ने हमें पकड़ लिया है. लेकिन मुख्यमंत्री ने एक बार भी ये नहीं सोचा कि इन लोगों का जो भी मुखिया है उसको बुलाकर ज्ञापन ले लें. इस बीच वहां पर मौजूद सपा के लोगों ने अपनी टोपियाँ उतारकर जो किसान सभा में थे उनपर कुर्सियां फेंकना चालू कर दिया. जब उन लोगों ने कुर्सियां फेंकना चालू कर दिया. यह सब कुछ मुख्यमंत्री जी के सामने हो रहा था. मुख्यमंत्री जी जैसे ही मंच पर चढ़े वैसे ही ये कार्यक्रम चालू हो गया था. विशेखा राजपूत आगे बताती हैं कि पूरे कार्यक्रम के दौरान हमारा ज्ञापन भी नहीं लिया गया.

जब मुख्यमंत्री जी जाने लगे और जैसे ही गाड़ी का गेट बंद किया, मैं वहां पहुँची और मैंने अपना हाथ दिखाया और ज्ञापन दिखाया तो उन्होंने गाड़ी का गेट खोला और ज्ञापन भी लिया और हमसे जाते-जाते कहा की आप लोग हमारा कार्यक्रम बिगाड़ने के लिए आये थे. मैंने कहा की नहीं सर कार्यक्रम बिगाड़ने के लिए नहीं आये थे हम तो अपना ज्ञापन देने आये थे. हम अपनी समस्या आप से नहीं कहेंगे तो किससे कहेंगे. वो बोले हम देख लेंगे.

विशेखा राजपूत कहती हैं कि यहाँ पर किसान पिछले चार साल से मर रहा है और सरकार उनकी समस्या हल नहीं कर रही है ऊपर से मुख्यमंत्री जी मंच से बोल रहे थे की ये मुठ्ठी भर किसान हैं मैं इन्हें बंद करवा दूंगा. तब तुम लोगों के अच्छे दिन आयेंगे. बुआ जी ने तो तुम्हारे जो राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं उन्हें बंद कराया था मैं तो मुक़दमे वापस ले रहा हूँ और मैं चाहूं तो अभी तुमको अरेस्ट करवा दूंगा. तुम मुट्टी भर हो.

इस घटना के तुरंत बाद 15 दिसम्बर 2016 को ही हमारे ऊपर हमीरपुर और सजेती थाने में गुंडा एक्ट के तहत मुक़दमे दर्ज हो गए. पुलिस ने हम किसानों को गुंडा बना दिया.

स्थानीय किसानों ने जांच दल को बताया कि 18 दिसम्बर को शाम 4 बजे के आस-पास लहुरीमऊ गाँव में कई थानों की पुलिस आ गयी. उस धर्मशाले का घेराव कर लिया जहाँ हमारा धरना चल रहा है. पुलिस वाले कम से कम 15 से 20 गाड़ियों में रहे होंगे. हम लोग शांतिपूर्ण तरीके से यहाँ बैठे हुए थे और हमारा धरना चल रहा था कि एकाएक पुलिस आ गयी. और आते ही लाठी चार्ज शुरू कर दिया. माइक को तोड़ दिया जो कोई भी मिला उसको मारना शुरू कर दिया. महिलाओं को भी नहीं छोड़ा गया. पुलिस वालों ने कोई भी बात-चीत नहीं की बस आते ही लाठी चलाना शुरू कर दिया. लगभग 13 थानों की पुलिस थी. घाटमपुर के सीओ व मौदहा थाने के सीओ भी थे. जैसे ही पुलिस ने लाठियां चलाना शुरू किया यहाँ की जनता ने भी उसका प्रतिकार किया. इतनी देर में यहाँ पर भगदड़ मच गयी. क्योंकि हम लोग भी यहाँ पर ठीक-ठाक संख्या में थे, इसलिए पुलिस वाले वहां से देख लेने की धमकी देते हुए चले गए. हम लोगों ने अपनी तरफ के लोगों को शांत कराया और पुलिस वालों को तुरंत यहाँ से जाने के लिए कहा.

इस घटना के बाद फिर से हम लोगों पर मुकदमा दर्ज हुआ. जिसमें कई लोगों पर नामजद और 400 अज्ञात लोगों पर मुकदमा दर्ज हुआ है.

ये पूरा इलाका लगातार सूखे की चपेट में रहता है इसलिए इसे भी डार्क जोन के अंतर्गत रखा गया है. इसलिए यहाँ पर ट्यूबबैल लगाने को प्रतिबंधित किया गया है. यहाँ पर कुछ लोगों के खेतों में बाँध और सुधौल के बीच में बालू निकली है. यहाँ से रोजाना पचासों ट्रक बालू अवैध तरीके से जाती है. यहाँ के थानों में उनका कमीशन बंधा हुआ है. एक ट्रक पर बीस हज़ार का दाम थाने से बंधा हुआ है. किसान आक्रोश के साथ कहते हैं कि ‘अब बालू के अवैध खनन से वाटर लेवल नीचे नहीं गिर रहा है क्या’ लेकिन जैसे ही कोई किसान अगर ट्यूबबैल खुदवाता है तुरंत उस पर मुकदमा दर्ज हो जाता है, क्योंकि इसे डार्क जोन घोषित कर दिया गया है. यहाँ के किसानों को न तो समय पर पानी मिलता है, न ही नहर की कोई सुविधा है. ट्यूबबैल, खाद का संकट अलग से बना ही रहता है. ऊपर से ओलावृष्टि, सूखा, आंधी, पानी व प्राकृतिक आपदाओं से किसान बेहद परेशान रहते हैं बिजली की भी स्थित बहुत ख़राब है. यहाँ पर कोई उद्योग धंधे नहीं हैं, इसलिए रोज़गार का भी संकट है. इसी के चलते बड़े पैमाने पर यहाँ से विस्थापन होता है.

पॉवर प्लांट लगाने के लिए इन लोगों ने पहले उबड़-खाबड़ जमीन को कब्जे में नहीं लिया, बल्कि उस ज़मीन को कब्जे में लिया जिसमें यहाँ के किसान खेती कर रहे थे. उन खेतों में फसल थी, इन लोगों ने सारी फसलों को नष्ट कर दिया. उसका कोई मुआवजा नहीं दिया गया. जो सरकारी ट्यूबबैल थे, उन्हें भी नष्ट कर दिया. खेतों में डस्ट डाल दिया तो कहीं गिट्टी डाल दी. उसके ऊपर रोलर चला दिया है. बिजली के खम्बे उखाड़ कर ले गए, ट्रांसफार्मर ले गए, सारा तार निकाल लिया. हमारे खेत में ही हैलीपैड बना दिया गया है केंद्रीय मंत्री पियूष गोयल उसी में उतरे थे. यानी किसान अपने खेतों में खेती भी न कर पाए इसका पूरा इंतजाम सरकार ने कर दिया है और हम किसानों को पूरी तरह से पंगु बना दिया है.

पॉवर प्लांट के निर्माण के लिए सारे मजदूरों को बाहर से लाया जा रहा है, इन आठों गाँव में से एक भी मजदूर को काम के लिए नहीं लिया गया, यहाँ के लोगों की समस्या तो जस की तस बनी हुई है. कहा जा रहा है कि गाँव के लोगों को कौशल विकास योजना के तहत नौकरी दी जायेगी, लेकिन आज तक इन आठों गाँव के किसी भी व्यक्ति को नौकरी नहीं दी गयी है.

जबसे यहाँ पर पॉवर प्लांट का काम शुरू हुआ है. यहाँ पर 4-5 ट्रक पीएसी पड़ी हुई है. बीच में यही पीएसी वाले रात के दस-ग्यारह बजे दारू पीकर गाँव में घुमते थे. महिलाओं और लड़कियों को घूर-घूर कर देखते थे. यहाँ पर सजेती थाने की एक चौकी भी बन गयी है और वही लोग अब यहाँ पर गुंडागर्दी भी करते हैं. गाँव के किसानों ने हमें बताया कि स्थानीय सपा विधायक घाटमपुर से इन्द्रजीत कोरी हैं और भाजपा सांसद अकबरपुर से देवेन्द्र सिंह भोले हैं लेकिन दोनों आज तक यहाँ झाँकने नहीं आये. चार साल से हम लोग भूखों मर रहे हैं लेकिन हमारे सांसद जी का हमने आज तक चेहरा भी नहीं देखा है.

हमारे ये पूछने पर कि चुनाव बिलकुल नज़दीक हैं इस बार आप लोग किस पार्टी को समर्थन देंगे? किसानों की नेता हमीरपुर महिला प्रकोष्ठ की जिलाध्यक्ष विशेखा राजपूत ने बताया कि इन आठों गाँव की आबादी लगभग 40 हज़ार के आस-पास है और लगभग 15000 के आस -पास यहाँ वोटर हैं. लेकिन इस बार हम गाँव वालों ने चुनाव बहिष्कार की योजना बनाई है. यहाँ के लोगों ने यह तय किया है कि यहाँ पर किसी भी पार्टी का बूथ नहीं लगने देंगे, गाँव के हर घर में काले झंडे टंग चुके हैं. किसी भी राजनीतिक पार्टी के लोगों को हम आठों गाँव में नहीं घुसने देंगे. कोई भी पार्टी आ जाए, हमारा सपोर्ट कर दे, हमें मुआवजा दिला दे हम उसका सपोर्ट कर देंगे.

जांच दल के सामने किसानों ने ये साफ कहा कि अगर उन्हें उचित मुआवजा मिले तो हम अपनी ज़मीन छोड़ने के लिए तैयार हैं. हमें उचित पैसा मिल जाए, नौकरी मिल जाए तो हम अपनी ज़मीन छोड़ देंगे. कुछ किसानों का ये भी कहना है कि जब हमारे पास पैसा होगा तो हम दूसरी जगह भी ज़मीन ले सकते हैं और उसमें खेती कर सकते हैं.

जांच दल को किसानों ने ये बताया कि जबसे उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से अपना धरना शुरू किया है उसी दिन से प्रशासन की तरफ से हमारे सामने मुश्किलें पैदा की जा रही हैं. पहले 15 दिसम्बर को मुकदमा दर्ज हुआ फिर 18 दिसम्बर को दूसरा मुकदमा दर्ज हुआ.

हाल ही में मीडिया में आयीं ख़बरों से यह मालूम पड़ा कि इन गाँव के आठ लोग इलाहाबाद में किसान यूनियन के एक कार्यक्रम में शरीक होने के लिए गए थे. 18 जनवरी की शाम को जब ये लोग वहां से लौट रहे थे तभी मूरतगंज के पास पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार कर लिया. रात में ही पुलिस इन्हें कानपुर ले आई और पूरी रात इन्हें एसपी के ऑफिस में ही रखा गया. इस घटना को लेकर जब जांच दल ने रूपेंद्र सिंह से बात की तो उन्होंने बताया कि पूरी रात और अगले दिन हमें एसपी ऑफिस में ही रखा गया, जहाँ से रात के दस बजे हमें छोड़ा गया. हम सभी लोगों को सजेती एसओ ने जूतों से भी मारा. हमारे नेता निरंजन सिंह राजपूत और विशेखा सिंह को अगले ही दिन पुलिस यहाँ से ले गयी और उन्हें माती कोर्ट में पेश किया और उसके बाद उन्हें माती अकबरपुर जेल में डाल दिया गया है. पुलिस ने हमें धरना समाप्त करने की शर्त पर छोड़ा है. फिलहाल हम लोगों ने धरना समाप्त कर दिया है और धरना स्थल पर ताला लगा दिया गया है. हम लोग कोशिश करेंगे की समस्या का हल बात-चीत से निकला जाए.

मांग

  1. जांच दल सरकार से यह मांग करता है कि किसान नेता निरंजन सिंह राजपूत व विशेखा राजपूत को अविलम्ब रिहा किया जाए व गाँव के तमाम किसानों पर जो फर्जी मुकदमें लगाये गए हैं उन्हें तत्काल वापस लिया जाए.
  2. अधिग्रहण की गयी ज़मीन का पूर्व सर्किल रेट से जिन किसानों ने मुआवजा ले लिया है और जो किसान अभी बाकी हैं उन सभी किसानों को नए सर्किल रेट से चार गुना मुआवजा दिया जाए.
  3. जिन किसानों की ज़मीन पॉवर प्लांट में गयी है, उन किसानों के परिवार के एक सदस्य को योग्यतानुसार नौकरी और बाकि सदस्यों को 5-5 लाख रूपए का मुआवजा दिया जाए.
  4. भूमिहीन व मजदूर किसानों को पुनर्वास के तहत मुआवजा और योग्यतानुसार नौकरी दी जाए.
  5. जिन किसानों के बोरवेल, तार ट्रांसफार्मर, खम्भे व जिन किसानों की फसल नष्ट की गयी है उनको मुआवजा दिया जाए.
  6. सन 2011 से जिन किसानों की भूमि अधिग्रहण कर ली गयी थी और जिन्होंने पैसा नहीं लिया है, उन किसानों को सन 2011 से आज तक का फसल का मुआवजा दिया जाए.
  7. आठ गावों के किसानों की जमीन के अलावा ग्राम सभा की भूमि का मुआवजा ग्राम सभा को दिया जाए या भूमिहीन किसानों या मजदूरों को इसके पट्टे दिए जाएं.

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) की कानपुर इकाई द्वारा जारी.

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