NPR, NRC और आधारः समूची आबादी की चौतरफा निगरानी के जुड़े हुए औज़ार

भारत सरकार की जिस अधिसूचना के माध्यम से यूनीक आइडेंटिफिकेशन अथाँरिटी आँफ इंडिया (यूआइडीएआइ) का गठन किया गया था, उसके अनुलग्नक 1 में यूआइडीएआइ की जिम्मेदारियों और भूमिका का वर्णन है। इसके अंतर्गत चौथे बिंदु में कहा गया हैः “यूआइडी योजना के क्रियान्वयन के अंतर्गत एनपीआर को यूआइडी के साथ संकलित करने के लिए अनिवार्य कदम उठाने होंगे (स्वीकृत रणनीति के अनुसार)”। एनपीआर यानी नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर और यूआइडी का मतलब है 12 अंकों की वह संख्या जिसके भीतर जनांकिकीय और बायोमीट्रिक डेटा समाहित होता है, जिसे आधार का ब्रांड नाम दिया गया है।

आधार (वित्तीय और अन्य सब्सिडी, लाभ व सेवाओं की लक्षित डिलीवरी) कानून, 2016 भारत 26 मार्च, 2016 को गठित किया गया और उसी दिन के गजेटियर में इसे छापा गया। इस कानून की धारा 59 कहती हैः यूआइडीएआइ के संबंध में 28 जनवरी, 2016 की तारीख में “भारत सरकार द्वारा लिए गए संकल्प के तहत केंद्र सरकार का कोई भी कृत्य या कार्रवाई जिसकी अधिसूचना योजना आयोग ने की हो” अथवा 12 सितंबर, 2015 की तारीख में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग का कोई भी कृत्य या कार्रवाई जिसकी अधिसूचना कैबिनेट सचिवालय ने की हो, उसे इस कानून के तहत वैध माना जाएगा।” नागरिकता कानून, 1955 के नागरिकता (नागरिकों के पंजीकरण और राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करने) नियमों, 2003 के नियम संख्या 3 के अंतर्गत उपनियम संख्या 4 में देशव्यापी नेशनल सिटिजनशिप रजिस्टर (एनआरसी) हेतु एनपीआर का जिक्र है।

राष्ट्रपति भवन स्थित कैबिनेट सचिवालय के कमेटी रूम में 23 नवंबर, 2015 को कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में सचिवों की कमेटी (सीओएस) की एक बैठक हुई थी जिसमें सरकार द्वारा यूआइडीएआइ व भारत के महापंजीयक (आरजीआइ) की प्रगति समीक्षा के दौरान रखे गए लक्ष्य के मुताबिक आधार पंजीकरण की रणनीति पर चर्चा होनी थी। इस बैठक की लिखित कार्यवाही कहती हैः “आरजीआइ ने बताया कि ज्यादातर राज्यों में एनपीआर को अपडेट करने का काम लगभग पूरा हो चुका है। इससे जो डेटा निकलेगा, उसके माध्यम से आधार द्वारा कवर गांवों/रिहाइशों के स्तर पर परिवारों की निशानदेही की जाएगी और इसका इस्तेमाल प्रभावी रूप से आधार कवरेज में छूटे हुए मामलों को लक्षित करने में किया जा सकेगा। आरजीआइ ने यह भी सूचित किया कि डीबीटी मिशन (प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण) को एक प्रस्ताव भेजा गया है कि तहसील/तालुका स्तर पर “हब” के रूप में स्थायी पंजीकरण केंद्र और गांवों के स्तर पर “स्पोक” के रूप में विभिन्न पंजीकरण केंद्र खोले जाएं। एनपीआर और आधार के तहत इस दोहरी रणनीति के माध्यम से स्थायी पंजीकरण केंद्रों के खोले जाने का एक खाका स्थापित होता है।

दरअसल, “एनपीआर और आधार के तहत दोहरी रणनीति के एकीकरण” का जो संदर्भ यहां दिया गया है, वह आधार कानून, 2016 की धारा 59 की अधिसूचना में रेखांकित “एनपीआर को यूआइडी के साथ संकलित करने के लिए अनिवार्य कदम उठाने होंगे (स्वीकृत रणनीति के अनुसार)” के समान ही है।

बैठक की कार्यवाही में यह बात सामने आती है कि “गृह सचिव ने बताया कि आरजीआइ भारतीय नागरिकता कानून के अंतर्गत भारतीय नागरिकों के लिए राष्ट्रीय रजिस्टर तैयार कर रहे हैं। नागरिकता कानून के प्रावधानों में आरजीआइ को ये अधिकार दिए गए हैं कि वे सभी निवासियों के बायोमीट्रिक एकत्रित करें और नेशनल सिटिजनशिप रजिस्टर की पूर्वपीठिका के तौर पर नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर तैयार करें। दोहरे काम और मेहनत से बचने के लिए कैबिनेट ने यह फैसला किया कि यूआइडीएआइ और आरजीआइ आवंटित राज्यों में आधार संख्या बांटने के बहाने बायोमीट्रिक और अन्य सूचनाएं एकत्र करेंगे और आपस में इस सूचना को साझा करेंगे।” इसके बाद फैसला लिया गया कि “भारतीय नागरिकता कानून के अंतर्गत भारतीय नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर तैयार करने के लिए यूआइडीएआइ से बायोमीट्रिक डेटा को लिया जाए।”

गृह मंत्रालय की 31 जुलाई, 2019 की अधिसूचना कहती है कि केंद्र सरकार ने फैसला किया है कि “पॉपुलेशन रजिस्टर को अपडेट कर के तैयार किया जाएगा और इसके लिए देश भर में घर घर घूमकर फील्ड वर्क से आंकड़े जुटाए जाएंगे, सिवाय असम के, जिसमें 1 अप्रैल 2020 से 30 सितंबर, 2020 के बीच स्थानीय रजिस्ट्रार के न्यायाधिकार क्षेत्र में रहने वाले सभी लोगों के संबंध में सारी जानकारियां एकत्रित की जाएंगी।”

गृह मंत्रालय ने 22 जुलाई, 2015 की तारीख में एक विज्ञप्ति जारी की थी जिसका शीर्षक था, “एनपीआर डेटा को आधार संख्या के साथ जोड़ना”। यह विज्ञप्ति कहती हैः “सरकार ने नेशनल पाँपुलेशन रजिस्टर को अपडेट करने और आधार संख्या को एनपीआर के डेटाबेस के साथ जोड़ने का निर्णय लिया है जिसकी अनुमानित लागत 951.35 करोड़ रुपये है। इसके लिए फील्ड वर्क मार्च 2016 तक पूरा कर लिया जाएगा। आधार संख्या के साथ जुड़ चुके इस अपडेटेड एनपीआर का डेटाबेस ही मूल डेटाबेस होगा जिसका प्रयोग सरकार के विभिन्न महकमे अपनी योजनाओं के लिए लाभार्थी चुनने में कर सकेंगे। इससे दोहरी मेहनत बचेगी चूंकि सभी एजेंसियां, जैसे भारतीय महापंजीयक, गृह मंत्रालय, यूआइडीएआइ, नीति आयोग, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) मिशन, वित्त मंत्रालय और राज्य/यूटी सरकारें करीबी से साथ मिलकर इस काम को पूरा करने की दिशा में काम कर रही हैं।” यह बात लोकसभा में गृह राज्यमंत्री ने लिखित जवाब में कही थी।

जैसा कि अंदाज़ा था, गृह मंत्रालय और यूआइडीएआइ की पहलों का एकीकरण शुरुआती योजना का ही हिस्सा था। 180 दिनों के निवासियों और नागरिकों से जुड़ी सामाजिक योजनाओं के लिए यूआइडी/आधार का इस्तेमाल मछली के कांटे की तरह किया गया है ताकि बहुराष्ट्रीय वाणिज्यिक ताकतों और सैन्य गठजोड़ों की शह पर नागरिकों की मौजूदा और भावी पीढ़ियों को फंसाया और डराया जा सके।

अगर हम यूआइडीएआइ की 2009 वाली अधिसूचना, जुलाई 2015 की गृह मंत्रालय की विज्ञप्ति, नवंबर 2015 की बैठक के मिनट्स, आधार कानून, 2016 की धारा 59 और नागरिकता कानून, 1955 में 31 जुलाई, 2019 को जुड़ी अधिसूचना को मिलाकर पढ़ें, तो यह बात सामने आती है कि एक स्वीकृत रणनीति के रूप में एनआरसी, एनपीआर और यूआइडी/आधार दरअसल चौतरफा जासूसी और निगरानी की एक वृहद् परियोजना का ही हिस्सा हैं, जिसमें निवासियों और रहवासियों की प्रोफाइलिंग की जानी है और उनके डेटा को खंगाला जाना है। यह कितनी बार किया जाएगा, इसकी कोई सीमा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में नौ जजों की बेंच इसे अस्वीकार कर चुकी है।

नागरिकता कानून, 1955 में 12 दिसंबर, 2019 को किया गया और भारत के गजेटियर में जोड़ा गया संशोधन यह सुनिश्चित करता है कि यह कानून दरअसल “अविभाजित भारत”, विभाजित भारत और अब अफगानिस्तान के कुछ निवासियों के साथ ताल्लुक रखता है। ध्यान देने वाली बात है कि अफगानिस्तान के अलावा यह जासूसी/निगरानी परियोजना “अविभाजित भारत” के इलाकों में भी लागू है। अब तक व्यक्तियों की लक्षित जासूसी और निगरानी की जाती थी। इस संशोधन के बाद अप्रत्याशित परिवर्तन यह हुआ है कि बिना किसी भेदभाव के अब समूची आबादी ही जासूसी और निगरानी के दायरे में आ जाएगी, फिर चाहे उक्त आबादी एनपीआर, एनआरसी, आधार में पंजीकृत हो या फिर उसके पास पाकिस्तान व बांग्लादेश के राष्ट्रीय आइडी कार्ड हों या फिर अफगानिस्तान का इलेक्ट्रॉनिक आइकार्ड (ई−तज्किरा) हो।

शेक्सपियर ने हैमलेट में लिखा था, “डेनमार्क के राज्य में कुछ तो सड़ रहा है।” यूआइडी/आधार/एनपीआर/एनआरसी से जुड़े दिल्ली हाइकोर्ट में चल रहे मुकदमों पर भी यही बात लागू होती है, जहां सूचना के अधिकार के तहत मांगी गयी जानकारी के संदर्भ में केंद्रीय सूचना आयोग के निर्देशों के बावजूद एक्सेंचर और साफ़रान समूह जैसी विदेशी कंपनियों के इनकार करने के मामले लंबित हैं। ये कपनियां “अविभाजित भारत” और अफगानिस्तान की आबादी की जनांकिकीय व बायोमीट्रिक प्रोफाइलिंग के काम में लिप्त हैं, जो कि विश्व बैंक समूह की परिवर्तनकारी पहलों के अनुकूल है। मीडिया की चमक-दमक से दूर यह मुकदमा 18 दिसंबर, 2014 को दायर किया गया था और 11 दिसंबर, 2019 को इसकी सुनवाई जस्टिस जयन्त नाथ ने की। इस मामले में वे चौदहवें जज थे। उन्होंने एक पंक्ति के आदेश में कहा, “प्रतिवादियों की ओर से विद्वान वकील के अनुरोध पर अगली तारीख 1 मई 2020 की दी जाती है।” इस केस में इन्हीं कंपनियां को पार्टी बनाया गया हैं।

इस किस्म के खतरनाक षडयंत्रों की सूरत में सोचने-समझने वाले सूचित नागरिक अगर प्रतिक्रिया देना चाहते हों, तो उनके पास अन्यायपूर्ण कानूनों के खिलाफ़ असहयोग और सिविल नाफ़रमानी का ही रास्ता बचता है। यह उनका अधिकार है और कर्तव्य भी।


डॉ. गोपाल कृष्ण पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। कंपनी कानून पर इन्होंने शाेध किया है और लंबे समय से आधार/यूआइडी व पर्यावरण से जुड़े मसलों में पैरोकार रहे हैं। मूल अंग्रेज़ी में लिखे इस लेख का अनुवाद अभिषेक श्रीवास्तव ने किया है। 

First Published on:
Exit mobile version