गुजरात चुनाव: पटेलों के गाँव में बीजेपी की ‘नो एँट्री’ !

‘जय सरदार,  

इस सोसायटी में धारा 144 लगी है।

कृपा करके कमल वाले वोट की भीख माँगने न आएँ..’

गुजरात के सैकड़ों पटेल बहुल गाँवों के प्रवेश द्वार पर ऐसे ही बैनर लगे हैं। गुजरात में दो दशकों से ज़्यादा समय से एक छात्र राज कर रही बीजेपी के लिए यह बैनर वाक़ई एक चुनौती है। उधर,नोटबंदी और जीएसटी को लेकर व्यापारी वर्ग का ग़ुस्सा मुखर हो रहा है। सोशल मीडिया में ‘विकास गांडो थयो छे’ (विकास पागल हो गया है) वायरल हो रहा है तो कहीं मोदी को 1789 की क्रांति के समय फ्राँस की रानी रही मेरी एंतोनिएत की तरह पेश किया जा रहा है। फ्राँस की जनता जब क्राँति के लिए उबल रही थी तो उसने भूख का उपाय बताते हुए कहा था कि अगर  ‘लोगों के पास ब्रेड नहीं  है तो केक खाएँ।’.. इसी तर्ज़ पर  ‘मोदी एंतोनिएत’  की तस्वीर पर लिखा है कि  ‘लोगों के पास कैश नही है तो वे कार्ड का इस्तेमाल करें।’.. जो अख़बार कुछ दिन पहले तक बीजेपी के लिए आसान विजय की भविष्यवाणी कर रहे थे, उनके ताज़ा सर्वे अब काँटे की टक्कर बता रहे हैं। तो क्य गुजरात की हवा वाक़ई बदल रही है। पढ़िए, वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता देसाई की टिप्पणी  –

 

दाँव पर लगा है मोदी का राजनैतिक भविष्य !

 

दिसम्बर 9 और 14 को होने वाले गुजरात विधान सभा चुनाव पर समूचे देश की नज़र टिकी है. 18 दिसम्बर को चुनाव के नतीजे तय करेंगे प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी का भविष्य. मोदी ने यहीं से विकास के ‘गुजरात मॉडल’ की परिकल्पना रख कर देश को ‘कांग्रेस मुक्त’ राष्ट्र बनाने का आवाहन दिया था. यहीं से 2011 में आयोजित ‘वाइब्रेंट गुजरात’ समारोह के अवसर पर देश के सबसे बड़े एक दर्जन उद्योगपतियों ने मोदी को प्रधानमंत्री पद का सबसे योग्य उम्मीदवार घोषित किया था. सन 2002 से लगातार 12 वर्ष तक गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके मोदी को ‘विकास पुरुष’ मान कर 2014 के लोक सभा चुनाव में भारी बहुमत से विजयी बना कर जनता ने उन्हें देश का प्रधानमंत्री चुना.

अब दिसम्बर के विधान सभा चुनाव में गुजरात की जनता देश के सामने अपनी राय जाहिर करेगी कि मोदी द्वारा प्रस्थापित और प्रचारित विकास के ‘गुजरात मॉडल’ से वह कितना खुश है या नाराज़. 2014 के लोक सभा चुनाव में गुजरात ने राज्य की सभी २६ सीट पर भाजपा के प्रत्याशियों को विजयी बनाया था. मोरारजी देसाई के बाद नरेन्द्र मोदी दूसरे गुजराती हैं जो देश के प्रधानमंत्री बने इस बात का गुजरात में गर्व किया जाता है.

लेकिन उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद गुजरात में हुए चार बड़े जन आन्दोलनों ने मोदी के ‘विकास मॉडल’ पर कई सवालिया निशान खड़े कर दिए. ये आन्दोलन थे औद्योगीकरण और शहरी विकास के लिए अधिग्रहित की जाने वाली खेती की जमीन के खिलाफ किसानों का आन्दोलन, बढती बेरोजगारी और महँगी होती उच्च शिक्षा से नाराज़ मध्यम वर्ग के पाटीदार युवाओं का अन्य पिछड़ी जातियों को नौकरी और शिक्षा संस्थानों में मिलने वाले आरक्षण के समान सुविधा की मांग के लिए आन्दोलन, राज्य में दलितों पर सवर्णों द्वारा अत्याचार और उत्पीडन की बढती हुई घटनाओं के खिलाफ आन्दोलन तथा राज्य में नशाबंदी के बावजूद युवाओं में नशाखोरी के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ पिछड़ी जातियों का राज्यव्यापी आन्दोलन.

इन चार जन आंदोलनों के पीछे किसी भी राजनैतिक दल का हाथ न था. इन आंदोलनों में से चार युवा नेता गुजरात के सामाजिक और राजनैतिक फलक पर उभरे. ये हैं कृषि योग्य जमीन के औद्योगीकरण और शहरीकरण के खिलाफ चलाये गए किसान आन्दोलन के गुजरात खेडूत समाज के नेता जयेश पटेल, पाटीदार अनामत आन्दोलन समिति के संयोजक हार्दिक पटेल, सौराष्ट्र के ऊना में स्वयंभू गोरक्षकों द्वारा पांच दलित युवकों को सड़क पर नंगा कर कोड़ों से मारे जाने की घटना के खिलाफ भड़के दलित आक्रोश को देश स्तर पर उछलने का श्रेय जिसे जाता है वह जिग्नेश मेवानी और नशाबंदी को कड़ाई से लागू कराने के ओ बी सी, दलित, आदिवासी एकता मंच द्वारा चलाये गए राज्य व्यापी अन्दोलन के संयोजक अल्पेश ठाकोर.

इन सभी जन आन्दोलनों को राज्य की भाजपा सरकार ने कुचलने की लगातार कोशिश करने की वजह से ये चारों युवा नेता और उनके समर्थक शासक दल के खिलाफ हो गए. इस बीच प्रधानमंत्री ने पिछले साल आठ नवम्बर को नोटबंदी की घोषणा कर एक हज़ार और पांच सौ रुपये की नोटों को गैर कानूनी करार दे दिया. नोटबंदी की लाठी की मार सबसे ज्यादा कृषि उत्पादन सहकारी बिक्री बाज़ार समितियों, जिला सहकारी बैंकों और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर वर्ग पर पड़ी. दूध, फल, सब्जी, जैसे जल्द खराब होने वाली चीज़ों की आपूर्ति में भारी रुकावट आ गई. किसानों ने विरोध दर्ज कराने के लिए प्रमुख मंडियों के सामने बीच सड़क पर दूध, फल, सब्जी ट्रेक्टर और बैल गाड़ी पर ला कर गिरा दिए.

नोटबंदी का घाव अभी सूखा भी नहीं था कि केंद्र सरकार ने देश में सालाना बीस लाख का व्यवसाय करने वाले व्यापारियों पर जी एस टी लागू कर दिया. जी एस टी भरने के नियमों में अनेकों बार फेर बदल और ऑनलाइन लेखा-जोखा भरने में असुविधा और व्यवधान आने के चलते व्यापारी वर्ग त्रस्त हो गया. गुजरात के सभी बड़े शहरों में व्यापारी हड़ताल पर उतरे और विरोध में जूलूस निकाले. इस वर्ष गुजरात में दीपावली का त्यौहार बहुत फीका रहा, रौशनी और आतिशबाजी कम दिखी.

वैसे भी जब से नरेन्द्र मोदी गुजरात छोड़ कर दिल्ली में प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए, गुजरात में भाजपा की लोकप्रियता में कमी होती नज़र आई. इस बात का अंदाजा 2015 में राज्य में हुए जिला पंचायत, तालुका पंचायत, नगर निगम और नगर महापालिका में हुए चुनाव नतीजों से लगता है. इन चुनाव में भाजपा को केवल राज्य के छः महानगरों में जीत हासिल हुई जबकि कांग्रेस ने कुल 31 जिला पंचायत में से 24 पर जीत हासिल की. 2014 के लोक सभा चुनाव, जिसमे गुजरात से भाजपा ने सभी 26 सीट पर जीत हासिल की थी, के एक साल के भीतर ही पिछले बाईस साल से सत्ता पर काबिज भाजपा की लोकप्रियता पंचायत चुनाव के समय इस हद तक गिर सकती है इसका किसी को अंदाज़ नहीं था.

विगत 2012 के विधान सभा चुनाव में भाजपा को 182 बैठकों में से 117 बैठक मिलीं थीं जबकि कांग्रेस को मात्र 61 बैठकों पर जीत हासिल हुई थी. दिसम्बर में होने वाले विधान सभा चुनाव में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी पार्टी कार्यकर्ताओं के सामने 150 बैठक जीतने का लक्ष्य रखा है. इस लक्ष्य को पाने के लिए भाजपा को 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की ‘हिन्दू ह्रदय सम्राट’ और ‘विकास पुरुष’ की छवि को पुनः प्रस्थापित करना होगा क्यों कि राज्य में पिछले दो साल से चले आ रहे चार बड़े जन आन्दोलनों ने विकास के ‘गुजरात मॉडल’ को न केवल ललकारा है बल्कि उसमें भारी खामियां भी दर्शाई हैं.

पिछले चुनावों में जो पटेल समुदाय भाजपा का प्रबल समर्थक रहा, उसने इस बार ‘भाजपा हराओ’ का नारा बुलंद किया है. राज्य के पटेल बहुल 4000 जितने गाँव के प्रवेश द्वार पर आन्दोलनकारी पटेल युवाओं ने ‘भाजपा के लिए 144 धारा है’ के बैनर लगा रखे हैं, यानि इन गाँव में भाजपा के प्रवेश पर प्रतिबन्ध है.

जन आंदोलनों से उभरे चार युवा नेताओं में से एक, अल्पेश ठाकोर ने हाल ही में राजधानी गांधीनगर में आयोजित एक विशाल रैली में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी की उपस्थिति में कांग्रेस की सदस्यता स्वीकार की और वे विधान सभा का चुनाव भी लड़ेंगे. पाटीदार आन्दोलन के 23 वर्षीय हार्दिक चुनाव लड़ने के लिए योग्य हैं. दलित युवा नेता जिग्नेश मेवानी और किसान नेता जयेश पटेल ने कांग्रेस में शामिल न होते हुए भाजपा के खिलाफ चुनाव प्रचार करने का ऐलान किया है.

इस बीच राहुल गाँधी ने गुजरात के तीन अलग अलग क्षेत्रों – उत्तर गुजरात, दक्षिण गुजरात और सौराष्ट्र – की सघन यात्रा की है जिसे उत्साहजनक समर्थन मिला है. राहुल ब्लैक कैट कमांडो के सुरक्षा कवच को अनदेखा कर दर्शकों की भीड़ में घुल मिल जाते हैं और लोगों से बात चीत करते हैं. कभी बैल गाडी पर, कभी पैदल तो कभी रोड के किनारे के ढाबा पर आम लोगों की तरह चाय पीते या रोटी दाल खाते दीखते हैं.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी गुजरात के तीन दौरे लगा लिए हैं और चुनाव तक वे 50 से अधिक सभाओं को संबोधित करने वाले हैं. भाजपा के एक मात्र स्टार प्रचारक मोदी हैं और पार्टी के पोस्टरों पर एक ही नारा है “अमे विकास छीए, अमे गुजराती छीए” (हम विकास हैं, हम गुजराती हैं). हालांकि यह नारा आपातकाल की याद दिलाता है जब तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देबकान्त बरुआ ने ‘इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’ का नारा दिया था.

पाटीदार आन्दोलन के प्रचारकों ने गुजरात की आर्थिक बदहाली की ओर इशारा करते हुए और मोदी के किए गए चुनावी वायदों को न पूरा करने की बात को लोगों को याद दिलाने के लिए ‘विकास गांडो थयो छे’ (विकास पागल हो गया है) का सूत्र कार्टून और विडियो के रूप में सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया है.

भाजपा की ओर से हिन्दू– मुस्लिम मतदारों का ध्रुवीकरण करने की भी कोशिश की जा रही है. मुख्यमंत्री विजय रूपानी का यह बयान कि हाल में गिरफ्तार किए गए कथित आतंकवादी का कांग्रेस के वरिष्ट नेता अहमद पटेल से सम्बन्ध है, इस बात को इंगित करता है.

गुजरात में हाल अन्य पिछड़ी जातियों, दलित, आदिवासी, मुसलमान और पटेलों का जो जातीय समीकरण कांग्रेस के पक्ष में होते दिखाई दे रहा है उसे काटने का भाजपा के पास सिर्फ धार्मिक ध्रुवीकरण ही ‘राम बाण’ दीखता है. गुजरात के छोटे बड़े संत, महंत, मंदिरों के पुजारियों के मोदी के गुणगान करते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर रोज जारी हो रहे हैं.

ऐसे में ‘विकास’ का मुद्दा खो सा गया है. एक बात तो तय है, गुजरात विधान सभा के चुनाव देश की राजनीति को एक निर्णायक मोड़ देंगे जो 2019 के लोक सभा चुनाव पर भी अपनी गहरी असर छोड़ेंगे.

 



 

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