अबके बुर्राक दशहरे में निकाली जाए…

हिंदुस्तान को समझने के लिए ग्रेगोरियन कैलेण्डर (अंग्रेजी कैलेण्डर) काफी नहीं है। इससे शायद हिन्दुस्तान की विविधता को नहीं समझा जा सकता। यह कहना भी मुनासिब ही है कि ग्रेगोरियन कैलेण्डर देश के राजनैतिक प्रशासन को सुलभ बनाने के लिए अपनाया गया। यह भी एक ज़रूरी पहल थी क्योंकि जब देश आज़ाद हुआ तब तक दुनिया के अधिकतर देशों ने ग्रेगोरियन कैलेण्‍डर सार्वजनिक नागरिक जीवन में अपना लिया था। इसके साथ ही चूंकि भारत में ब्रिटिश उपनिवेश था, इसलिए यहां भी राजनैतिक जीवन में यही कैलेण्डर अपना लिया गया था।

एक बनते हुए राष्ट्र के सामने उस समय देश में प्रचलित लगभग 30 कैलेण्डर के बीच एक वैज्ञानिक अध्ययन करना ज़रूरी था ताकि किसी भी भौगोलिक, सामाजिक व सांस्कृतिक क्षेत्र में रहने वाले देशवासियों को इस सार्वभौमिक कैलेण्डर में समुचित स्थान मिले। समिति के अध्यक्ष एम.एन. साहा ने अपनी रिपोर्ट में यह स्वीकार किया कि ये तमाम प्रचलित कैलेण्डर काल की अपनी-अपनी अवधारणाओं के कारण एक-दूसरे से इतने भिन्न थे कि इनमें एक व्यवस्थित तारतम्यता ढूंढना बहुत मुश्किल था।

1957 में इस समिति ने देश भर में मौजूद और प्रचलित कैलेण्डर की वैज्ञानिक गणनाओं के आधार पर एक सार्वभौमिक कैलेण्डर का प्रारूप भारत सरकार को दिया। विभिन्न धर्मों के धार्मिक कैलेण्डर को शासकीय अवकाशों का आधार बनाया गया और देश की धर्मनिरपेक्ष (सर्वधर्म समभाव) बुनियाद को सुदृढ़ किया गया। पहले से प्रचलित धार्मिक कैलेण्डर आज भी चंद्रमा व सूर्य की गति के प्राचीन आकलनों पर आधारित हैं। इनमें आधुनिक विज्ञान और बाद में हुए वैज्ञानिक शोधों को शामिल नहीं किया गया है।

हिंदी के ख्यात साहित्यकार व विचारक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ ने कहा भी है, ‘हिंदुस्तान का व्यक्ति चाहे वह किसी भी भौगोलिक क्षेत्र से हो, कम से कम दो काल-बोधों में एक साथ जीता है।’ शायद यही वह विशिष्टता है जो एक तरफ राजनैतिक तौर पर उससे नागरिक की तरह व्यवहार करने की अपेक्षा करती है, दूसरी तरफ सामाजिक व सांस्कृतिक प्राणी की तरह।

यह विडम्बना है या देश की प्राचीनता का वैभव, कहना मुश्किल है लेकिन यह तय है कि इतनी विविधताओं के बिना यह देश हिंदुस्तान जैसा सुंदर देश शायद नहीं होता। प्रो. साहा समिति और तत्कालीन भारत सरकार के नेताओं को शुक्रिया कहना लाजिमी है कि उन्होंने देश की विविधता को पूरा सम्मान देते हुए इस धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की बुनियाद को मजबूत किया। अगर यह काम आज हुआ होता तो शायद तस्वीर दूसरी होती। भारतीय कैलेण्डर में यही विविधतता ऐसे संयोग पैदा करती है जिससे इस देश की बुनियाद को खाद-पानी मिल सकता है। फसाद का डर हालांकि आज फिज़ाओं में कम नहीं।

आज ही के मौजूं को लेकर मैं आपको अपने गांव ले चलता हूं।

सभी मोहल्लों से आए हुए ताजिये

चार दिन पहले मुहर्रम बीता है। मुहर्रम यानी इस्लामिक कैलेण्डर के पहले महीने का इक्कीसवां दिन। इस महीने को रमज़ान के बाद सबसे पाक महीना माना जाता है। खुद को इस्लाम का खलीफा घोषित कर चुके यजीद नाम के एक तानाशाह ने इसी महीने में हज़रत मुहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन साहब का कत्ल  किया था। इसमें हुसैन साहब के पूरे परिवार ने शहादत दी थी। हुसैन साहब- पैगंबर की सीख, कि इस्लाम तलवार की नोंक पर नहीं बल्कि मोहब्बत और समर्पण से जिंदा रहेगा- का पालन करते हुए यजीद की तलवार का निशाना बने थे। मुहम्मद अली जौहर ने इस वाकये को बेहद लोकप्रिय शेर में कुछ इस तरह कहा है- “कत्ले हुसैन अस्ल में मर्गे-यजीद था, इस्लाम ज़िंदा होता है हर कर्बला के बाद”

मुसलमानों में इसे ग़मी के तौर पर देखा जाता है। देखा जाये तो यह अन्याय के खिलाफ हुई शहादत को याद करने का दिन है।

बाँके बिहारी भगवान का विमान

मुहर्रम के ही दिन भाद्रपद शुक्ल द्वादशी थी। देश के बाकी हिस्सों में इस तिथि का क्या महत्व है पता किया जाना चाहिए लेकिन बुंदेलखंड में इस दिन हर गांव में मंदिरों में बैठे भगवान विहार के लिए गांव में निकलते हैं, जिन्हें हिन्दू धर्म के अनुयायी विमान के माध्यम से पूरे गांव में ले जाते हैं और फिर किसी जलस्रोत में विहार के बाद वापस मंदिरों में बैठा देते हैं। कुछ समय पहले तक हमारे गांव में विहार के बाद इन विमानों को लोग अपने-अपने घरों में भी आमंत्रित करते थे और भगवान उन दिनों लोगों के मेहमान हुआ करते थे। अब हमारे गांव में इसका चलन नहीं रहा।

इसका सार्वजनिक महत्व देश के अन्य हिस्सों में कितना है बता पाना मुश्किल है क्योंकि खुद हिन्दू धर्म में हजारों तरह की मान्यताएं व व्यवहार हैं जो भौगोलिक क्षेत्रों के आधार पर बदलती रही हैं। इसके अलावा यह आचार संहिता वैष्णव परंपरा से बद्ध है जिसका मतलब है कि इसका पालन वही हिन्दू करते हैं जो खुद को भक्ति की वैष्णव परंपरा में मानते हैं।

आजकल फि़ज़ाओं में जैसा ज़हर घुला हुआ है, उसके मद्देनज़र 10 सितंबर का दिन तनावपूर्ण हो सकता था लेकिन पूरे दिन गांव से संपर्क में रहते हुए शाम को इत्मीनान की सांस आयी, जब वहां की तस्‍वीरें मुझे प्राप्‍त हुईं। यकीन हो चला कि गांव की वर्षों पुरानी परंपरा की जड़ें अभी इतनी कमजोर नहीं हुईं हैं कि कुछ लोगों की दहशतगर्दी के सामने  झुक जाएं और वर्षों पुरानी सांप्रदायिक व धार्मिक सौहार्द की थाती को यूं ही ज़ाया कर दें।

श्रीवास्तव परिसर में ताज़ियों की चौकी

ताज़ियों को गुलगुले चढ़ाने जाना, हमारे घर की चौपाल पर ताज़ियों का आना, जलेबियों का लंगर, परिवार की तरफ से ताजिये बनवाना और एक खास रस्म ‘भीख’ मांगना जैसी कई समृद्ध परम्पराएं अब भी हमारी चेतना का जीवंत हिस्सा हैं। ताज़ियों की बहन बुर्राक हमारे मोहल्ले से ही होती हैं जिसे सजाने का काम हमारे मोहल्ले के सभी लोग करते थे, जो आज भी बदस्तूर जारी है। ताजिये तो विसर्जन के बाद तालाब में डूब जाते थे, बुर्राक को हम वापस अपने साथ ले आते थे। कहते थे कि बुर्राक रोते हुए लौटती है। हमें उसकी आंखों में आंसू दिखाई भी देते थे। हम खुद रोते हुए लौटते थे।

मुहर्रम पर मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले के एक गांव देरी में इन दोनों जुलूसों की खासियत नफरती राजनीति की नींद हराम करने के लिए काफी थी क्योंकि यहां दोनों जुलूस न केवल साथ साथ-साथ आगे–पीछे निकले बल्कि दोनों मजहबों के लोग बराबर से शरीक हुए। लंगर भी बंटा, प्रसाद भी बंटा। बांके बिहारी की जय भी हुई और अली-हुसैन का मातम भी मना।

एक खासियत और रही जिसका ज़िक्र हालांकि गैर-ज़रूरी है। कुछ ताज़ियों को तिरंगे में मौजूद रंगों से सजाया गया। इससे दूसरे तरह के राष्ट्रवाद का खतरा हो सकता है और यह भी कि इसमें थोड़ा ‘सफाई’ देने जैसा स्‍वर भी झलकता है।

लच्छी राम भाई अपने बनाए ताजिये के साथमेरे गांव के ही एक व्यक्ति हैं लच्छी राम चढ़ार जिन्होंने इस बार अपना ताजिया बनाया और उसे लेकर जुलूस में शामिल हुए। वहीं भगवान के विमानों को कंधा लगाते कई मुस्लिम युवा भी देखे गए। प्रसाद या लंगर पाने में किसी को कोई गुरेज नहीं रहा बल्कि पूरी श्रद्धा से ग्रहण किया गया।

एक रात पहले पापा से मेरी लंबी बात हुई थी। मैंने अपनी बेचैनी और चिंता का इज़हार किया कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो। पिछली बार मुहर्रम पर गांव में एहतियातन पुलिस की दो कंपनियां तैनात की गयी थीं। बड़ी आबादी वाला गांव है। फिरकापरस्त दोनों तरफ काम कर रहे हैं। चिंता वाजिब थी। पापा ने कहा– “तुम चिंता न करो। मैं खुद गांव के बाकी लोगों के साथ पूरे समय मौजूद रहूंगा। अभी गांव के लोगों की आंखों में अदब और पानी शेष है।”

इस बार जुलूस से पहले पुलिस ने थाने में गांव के लोगों की बैठक ली। गांव के सभी लोगों ने एक स्वर में कहा– ”आपकी ज़रूरत नहीं। जुलूस में आपकी मौजूदगी से गांव की बदनामी होती है।” आज के दौर में इन आवाज़ों को, इन परम्पराओं को और इन भावनाओं को दर्ज़ किया जाना चाहिए।

अपने गांव में मने मुहर्रम के बहाने मिश्रित तहज़ीब और इतिहास को याद करते हुए एक तथ्‍य याद दिलाना मौजूं होगा कि इमाम हुसैन की तरफ से कर्बला की जंग में हिंदुओं ने भी शिरकत की थी। इन्‍हें हुसैनी ब्राह्मण कहते हैं। फिल्‍म अभिनेता सुनील दत्‍त हुसैनी ब्राह्मणों में सबसे जाना-माना चेहरा रहे। हर मुहर्रम कर्बला की जंग में हुसैनी ब्राह्मणों की शहादत का अफ़साना दोहराये जाने भी लायक है।

कौमी एकता की ऐसी ही आवाज़ों में एक आवाज़ हमारे उस्ताद, मौलाना और शायर हारून अना कासमी की भी है। अपने एक शेर में देश की आबोहवा और गंगा-जमुनी तहज़ीब को सहेजने के इरादे से वे कहते हैं:

मैं भी कह दूं जो मेरी बात न टाली जाए, अबके बुर्राक दशहरे में निकाली जाए

ज़ाहिर है, न सिर्फ मेरे गांव बल्कि इस समूचे देश की आवाज़ इस एक शेर में शामिल है।


सभी तस्वीरें गांव के उभरते हुए पत्रकार हरिओम साहू ने भेजी हैं

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