समलिंगी शादी पर फ़ैसले की जगह सरकारी खुसपुस को हेडिंग बनाते अख़बार!

आज के मेरे पांच में से तीन अखबारों की लीड है – सेम सेक्स की शादी से बवाल हो जाएगा – सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है। चौथे, इंडियन एक्सप्रेस ने जो लिखा और शीर्षक लगाया है, उसका मतलब है, सुप्रीम कोर्ट में सेम सेक्स की शादी पर परस्पर विरोधी अपील, सरकार ने कहा, सदन को तय करने दें। हालांकि, दलील देने वाले का नाम बताये बगैर इनवर्टेड कॉमा में कहा गया (यानी यह राय अखबार की नहीं है) कि देश में जब पर्सनल लॉ हैं, समाज में स्वीकृत नियम हैं तो इस कानून से हंगामा मच जाएगा। इंडियन एक्सप्रेस में यह उपशीर्षक है। 

मुझे नहीं पता, सरकार में किन लोगों ने किस आधार पर ऐसा कहा है और इंडियन एक्सप्रेस अगर यह बता रहा है कि सरकार ने सदन में फैसला करने की बात की है तो वह इससे सहमत है कि नहीं या उसकी राय क्या है। मुझे लगता है कि यह खबर नहीं है और राय या दलील को खबर की तरह पेश नहीं किया जाना चाहिए। और इतनी प्रमुखता देने का कोई मतलब नहीं है। यह दिलचस्प है कि अखबारों ने सरकार की दलील को राय बनाकर पेश कर दिया है ताकि उसके समर्थकों की कट्टरता बनी रहे। वोट का फायदा मिले। जबकि खबर तो फैसले के बाद बनेगी। लेकिन वह अलग मुद्दा है।  

सरकार ने सदन के फैसले की बात कही है यह खबर जरूर है पर अभी फैसला नहीं आया है। अगर तर्क या दलील ही लीड है तो इस आधार पर हुए फैसले को कैसे छापा जाएगा, कितना महत्व देना होगा? सदन का फैसला समाज को स्वीकार्य होगा यह कैसे माना जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट फैसला कर दे तो हो सकता है कि लोग मान जाएं कि कानूनन ऐसा होना चाहिए, संविधान यही चाहता है आदि आदि। लेकिन जिसकी लाठी उसकी भैंस की तरह कोई फैसला बाकी लोगों को क्यों स्वीकार्य होगा। और जनता फैसला स्वीकार नहीं करेगी तो वही होगा जो वेश्यावृत्ति औऱ दूसरे कानूनों के मामले में होता है। लोग परेशान होते हैं, पुलिस कमाई करती है और शिकायतों पर कुछ नहीं होता। समाज में पुलिस, सरकार या व्यवस्था की साख खराब होती है। लोग पैसे देकर मनमानी करते हैं या फिर मजबूरी में करने वाले फंस जाते हैं या फंसा दिए जाते हैं। 

निजी तौर पर इस मामले में मैं कुछ कह नहीं सकता और अब जब शादी हो चुकी है, शादी की उम्र निकल गई है और पुरुष से दूसरी शादी की छूट मिल भी जाए तो ऐसा करने का कोई इरादा (या पात्र) नहीं है तो मेरी राय पूर्वग्रह वाली भी हो सकती है और इसे वैसे ही देखा जाए लेकिन सरकार ने कहा और अखबारों ने छाप दिया तो इसपर चर्चा बनती है। और फैसले से पहले उनकी सलाह ली जानी चाहिए जो इससे प्रभावित हो सकते हैं। मुझे नहीं लगता कि दो लोग बंद कमरे में सहमति से क्या करते हैं इससे संबंधित कोई कानून होना चाहिए। किसी भी तरह की जबरदस्ती की शिकायत जरूर की जा सकती है और उसपर संभव हो तो कार्रवाई भी होनी चाहिए।  

बंद कमरे में सहमति से क्या करें और क्या नहीं – इसका कोई मतलब नहीं है। मुझे नहीं पता कि मैथुन के कौन से प्रकार कानूनी हैं और कौन से नहीं। पहले इससे संबंधित कानून थे, खत्म हो रहे हैं और उन्हें खत्म होना ही चाहिए। वरना समाज की जो हालत है और इस सरकार ने जो कुछ नए कानून बनाए हैं और उनका पालन कराने के लिए जो सरकार समर्थक छुट्टा छोड़ दिए गए हैं – उससे समाज की हालत ज्यादा खराब है। मेरा मानना है कि सेम सेक्स में शादी की अनुमति से समाज पर कुछ असर नहीं पड़ेगा। वैसे ही जैसे लिव इन पर नहीं पड़ता है। और लिव इन में क्या दो मित्र या दो सहेलियां साथ नहीं रहती हैं? शादी करके इससे ज्यादा क्या करेंगे? 

वैसे भी समाज को पता है और संभवतः यह घोषित है कि आरएसएस के बड़े लोग शादी नहीं करते हैं। बाद में यह भी सार्वजनिक हो गया कि कर भी लें तो भाग लेते हैं। ऐसे में क्या समाज ने कभी ये चिन्ता जताई कि ऐसे लोग अकेले रहते हैं, किसी पुरुष के साथ या महिला के साथ रहते हैं? यौन जरूरतें कैसे पूरी करते हैं (वेश्यावृत्ति तो गैर कानूनी है) मेरे ख्याल से नहीं। जिस समाज का हवाला दिया जा रहा है वह जानता है कि कौन किसके साथ रहता रहा है और ट्रेन में भी खुद को रोक नहीं पाया था। वह सब स्वीकार्य भी रहा है। बवाल कहां मचा? खासकर जब सरकार इनके समर्थकों की है। यह भी किसी से छिपा हुआ नहीं है कि जो लोग सेम सेक्स के बीच शादी से बवाल मच जाने की बात करते हैं वही दूसरे सेक्स वाले के साथ रहने पर भी बवाल काटते हैं। घूमने और पार्क में बैठने पर भी एतराज करते हैं। खासकर वैलंटाइन डे पर और तथाकथित लव जेहाद का मामला बनाया जा सके तब भी। 

इसलिए मेरा मानना है न तो सरकार का यह कहना सही है कि इससे समाज में हंगामा मच जाएगा और न मैं यह मानने के लिए तैयार हूं कि इसका फैसला संसद या विधान सभा के किसी सदन में या किसी तरह के मतदान या बहुमत से होना चाहिए। अव्वल तो मुझे ऐसे किसी कानून की जरूरत ही नहीं लगती है और कौन किसके साथ रह रहा है, शादी करके रह रहा है या वैसे ही यह सब निजी मामला है और इससे सरकार या प्रशासन को मतलब ही नहीं होना चाहिए। ज्यादा से ज्यादा यह कानून हो सकता है कि एक ही सेक्स के लोग शादी नहीं कर सकते हैं, करेंगे तो मान्यता नहीं मिलेगी – लेकिन उसकी जरूरत भी कहां है, किसलिए? 

समाज में रहने वाले सामाजिक प्राणी को एक दूसरे से मिलने, बात करने और साथ रहने से क्यों रोका जाना चाहिए। बात सिर्फ शादी करके साथ रहने की नहीं है। बिना शादी किए साथ रहने में भी क्या दिक्कत है। और होने को कानून है ही कि विवाहित दंपत्ति सड़क पर सेक्स नहीं कर सकते हैं। दो पुरुष विवाहित या दो महिलाएं विवाहित हुई तो नहीं ही करेंगे / करेंगी। ऐसे में उन्हें विवाह करने दिया जाए तो क्या फर्क पड़ेगा। लेकिन ऐसे विवाह की जरूरत क्यों है – क्योंकि समाज में कुछ लोग हैं (जिन्हें पुलिस और कानून का डर नहीं है) वो पहुंच जाते हैं पूछने – और पार्क में भी पूछ लेते हैं। समाज को कानून की नहीं, कानून हाथ में लेने वालों से बचाने की जरूरत है।    

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।  

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