पत्रकारिता का यह स्पष्ट विभाजन सरकार ने कराया है, अपने आप हो गया या देशभक्ति है?

 

हेडलाइन मैनेजमेंट करने वाले अखबार फॉलो अप करते तो यह हाल नहीं होता!! 

 

आज सबसे पहले मैंने टाइम्स ऑफ इंडिया खोला और ब्रजभूषण सिंह के खिलाफ एफआईआर से संबंधित एक खबर बढ़कर चिन्ता में पड़ गया कि यह खबर कैसी खबर है? किसके लिए है? हिन्दी के पाठकों के लिए खबर के शीर्षक का अनुवाद होगा, “अवयस्क पहलवान के पिता ने कहा, कुश्ती महासंघ के प्रमुख के खिलाफ झूठी शिकायत दर्ज कराई थी”। खबर के अंत में बताया गया है कि यह अंदर के पन्ने पर जारी है और उसके शीर्षक की खास बात है, बदले के लिए। इसमें पिता के हवाले से कहा गया है बदला लेना चाहते थे। इस खबर के साथ इसी पन्ने पर एक खबर है, “आर्यन को क्लीन चिट देने के लिए जांच टीम ने सूचना दबाई, वानखेडे़ ने बांबे हाईकोर्ट में कहा”। 

इस खबर से हेडलाइन मैनेजमेंट का खेल समझ में आता है और यह भी कि पहले पसंदीदा, प्रचार वाली खबरें गढ़ी जाती हैं, फिर उन्हें छोड़ दिया जाता है। जरूरत हुई तो आगे फिर मैनेज किया जाता है जैसे शाहरुख खान के मामले में या तो उसे बदनाम करने की कोशिश हुई या वसूली की या दोनों। कामयाबी नहीं मिली, संयोग से या दुर्भाग्य से बदनामी पूरी हुई तो वानखेड़े को बलि का बकरा बना दिया गया। पूरा मामला क्या है – ना बताया जाएगा ना समझ में आएगा और मीडिया अपने-अपने पाठकों की सेवा कर रहा है। मीडिया अगर निष्पक्ष होता तो यह स्थिति होती ही नहीं पर जो है आइए उसे देखें और समझने की कोशिश करें। अंदर छपने वाली ऐसी खबरें व्हाट्सऐप्प फॉर्वार्ड नहीं होतीं और इसका खास असर नहीं होता है या होता है अगला उपाय किया जाता है। यही चल रहा है। 

हालांकि, इस कारण यह समझ नहीं आ रहा है कि किरण पटनायक और संजय शेरपुरिया के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है (ये कार्रवाई के बाद ही खबरों में आए) तो कुलदीप सिंह सेंगर और बृजभूषण सिंह के खिलाफ कार्रवाई में क्या दिक्कत है? अगर झूठी एफआईआर हो सकती है तो पटनायक और शेरपुरिया के खिलाफ सही है इसकी पुष्टि कैसे हुई और नहीं हुई तो आम आदमी को छोड़िये, सरकार के करीबियों के खिलाफ भी दो तरह की कार्रवाई हो रही है। इसका आधार क्या हो सकता है। यह सब पता करना, बताना और उसपर अटकलें लगाना – मीडिया का काम है जो नहीं हो रहा है। व्यवस्था ऐसी है कि गुजरात पर 20 साल बाद बीबीसी की फिल्म आई। उसपर प्रतिबंध लग गया और बीबीसी पर छापा पड़ा। इसके बाद खबर आई कि बीबीसी ने माना कि उसने टैक्स कम दिया है। फिर खबर आई कि बीबीसी ने ऐसा स्वीकार नहीं किया है। आयकर अधिकारियों ने बीबीसी की स्वीकारोक्ति से इनकार किया आदि। 

कहने की जरूरत नहीं है कि फर्जी खबरें कौन करता और करवाता है। पर इतना ज्यादा है कि जवाब में फैक्ट चेक भी शुरू हो गया और सरकार भी इसमें कूद पड़ी। पीआईबी भी यह काम करने लगा। लेकिन तमाम सरकारी खबरों के मामले में ना सरकारी बयान होता है ना विज्ञप्ति जारी करती है और ना फैक्ट चेक। इन दिनों ऐसा है हमारा भारत देश। यहां बीबीसी का यह हाल है तो आम पत्रकार और पत्रकारिता संस्थान का क्या होगा आप समझ सकते हैं। कुल मिलाकर हालत यह है कि दोनों तरह की खबरें हैं, आपको जो ठीक लगे उसे सच मान लीजिये। इसमें सरकार की अन्य संस्थाओं की क्या भूमिका है और वे क्या कर रहे हैं इसपर सवाल मत कीजिये। जवाब नहीं मिलना है। काम की बात होती ही नहीं है। मन की बात के 100 एपिसोड हो चुके। 

आज मैं पहले पन्ने की खबरों से विषयांतर हो गया था। टाइम्स ऑफ इंडिया में पीटीआई की यह खबर पहले पन्ने पर छपनी चाहिए या नहीं, आज मुझे इसकी चर्चा करनी चाहिए या नहीं आदि सवालों से मैं खुद जूझने लगा। खबर की परिभाषा तय करने लगा और सब करते हुए मुझे ध्यान आया कि खबरें पाठकों के लिए होती हैं और हर अखबार के पाठक अलग होते हैं और अखबारों की कोशिश होती है अपने पाठकों की जरूरत या पसंद की खबर दे। इस लिहाज से पाठक बंटे हुए हैं तो अखबार भी बंटे हुए हैं सब अपने पाठकों की सेवा कर रहे हैं। इसमें आपको या मुझे लगता है कि पत्रकारिता पीछे छूट गई है तो वह सही या गलत, बाद में तय करेंगे पर देखेंगे कि अखबार अपने पाठकों की सेवा में कैसी खबरों को प्रमुखता दे रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि मेरी राय में टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर अगर अखबार के रिपोर्टर की एक्सक्लूसिव होती तो पहले पन्ने पर छप सकती थी लेकिन ऐसी खबर करवाई गई हो तो छपनी ही नहीं चाहिए थी। पीटीआई से आई है तो मैं पहले पन्ने पर नहीं छापता अंदर के पन्ने वालों को तय करने देता। 

इसके बाद इंडियन एक्सप्रेस की यह खबर पढ़ी। यह पहलवानों के मामले में एक अन्य एफआईआर के तथ्यों की पुष्टि है। इसे सही नहीं मानने का कोई कारण नहीं है और अब तक इस मामले में जो हुआ है उससे साफ है कि सरकार ब्रजभूषण सिंह के खिलाफ कार्रवाई नहीं चाहती है या उन्हें बचाने में लगी है। पहलवानों के आंदोलन से परेशानी थी तो उन्हें समझा-बुझाकर या डरा-धमका कर फिलहाल शांत कर दिया गया है और इसमें नौकरी जाने की धमकी शामिल है। इस बीच अवयस्क पहलवान के पिता की एफआईआर बदल गई। ऐसा कब होता है? कितने मामले में हुआ है और क्यों व कैसे हुआ होगा कौन नहीं समझता है। महीनों कार्रवाई नहीं हुई, आरोप कई बार दोहराने पड़े, अखबार में छप गये और ऐसे में कोई बयान बदल थे तो व्यवस्था की हार है। निर्दोष होने का सबूत नहीं। दूसरी ओर, जो थक-हारकर भी आरोप या बयान बदलेगा तो यही कहेगा। लेकिन यह सच है तो व्यवस्था पर टिप्पणी नहीं है। उसे कौन ठीक करेगा और उसके लिए क्या किया गया है। सच कहिये तो यह समस्या ही 2014 के बाद की है। लेकिन उसकी बात मीडिया में नहीं है। मुकरते तो गवाह भी हैं और इस मामले में भी आरोप साबित नहीं होता तो नहीं होता लेकिन कार्रवाई से पहले, महीनों बाद आरोप बदलना सामान्य है यह कौन मानेगा और इसमें खबर क्या है। 

इंडियन एक्सप्रेस की खबर एक्सक्लूसिव है और कहीं होनी नहीं थी पर टाइम्स ऑफ इंडिया वाली खबर तो पीटीआई की है पर वह भी कहीं पहले पन्ने पर नजर नहीं आई। इसलिए मामला सिर्फ पहले पन्ने पर छापने का नहीं ऐसी खबर करने-करवाने का भी है। जो व्हाट्सऐप्प से और ट्रोल के जरिए फैलाई जाती है।

खबर पीटीआई की है तो उसकी मजबूरी सबको मालूम है और एएनआई की नहीं है तो उसका कारण भी समझ में आता है। पत्रकारिता इतनी खुली, बेशर्म और नंगी कभी नहीं थी। हालांकि उसका काम ही पारदर्शिता का है, तब भी। इंडियन एक्सप्रेस में निहाल कोशी की बाईलाइन वाली खबर का शीर्षक है, “अंतरराष्ट्रीय रेफ्री ने कहा, मैंने सिंह को उसके बगल में खड़ा देखा, उसने खुद को आजाद किया …. उसके साथ कुछ गलत हुआ था”। एफआईआर में उल्लिखित घटना जब कुश्ती संघ के प्रमुख ने पहलवान के कुल्हे पर ‘हाथ फेरा’ पर जगबीर सिंह। कहने की जरूरत नहीं है कि टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर अगर यह साबित करने की कोशिश करती लग रही है कि ब्रज भूषण सिंह निर्दोष हैं और उनके खिलाफ आरोप बदलना लेने के लिए लगाये गये थे तो यह उनकी कहानी का समर्थन या उसे सही साबित करने की कोशिश है जबकि इंडियन एक्सप्रेस की खबर घटना बता रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर सही भी हो तो उसका मतलब अब नहीं है। प्रधानमंत्री से शिकायत के बाद, केंद्रीय मंत्रियों के सक्रिय होने और सरकार की नाराजगी साफ होने के बाद एफआईआर बदलना – दबाव में बदलना है। भले ही पहले से गलत हो। ऐसा नहीं मानने का कोई कारण नहीं है। जब आम लोगों के खिलाफऐसी एफआईआर पर कार्रवाई होती रही है तो सत्तारूढ़ दल के सांसद को बचाने का कोई मतलब नहीं है। 

स्कूल के बच्चों को भूत का डर 

टाइम्स ऑफ इंडिया में आज एक और खबर उल्लेखनीय है। सिंगल कॉलम की इस खबर का शीर्षक है, “उड़ीशा के जिस स्कूल में शव रखे गए थे उसके बच्चों को भूत का डर”। पहले पन्ने पर छपे खबर के हिस्से में कहा गया है कि शवगृह बनाये गए उड़ीशा सरकार के स्कूल की बिल्डिंग को गिराकर नया भवन बनाने की आवश्यकता हो सकती है। अखबार ने लिखा है कि कई छात्रों और शिक्षकों ने गर्मी छुट्टी के बाद 16 जून को स्कूल खुलने पर इसमें प्रवेश करने से इनकार कर दिया है। स्कूल की प्रबंध समिति ने जिला प्रशासन से यह बात कही है। बहानागा नोडल हाई स्कूल में दुर्घटना के बाद करीब 250 शवों को अस्थायी रूप से रखा गया था। इसके बाद इन्हें शवगृहों में ले जाया गया था। अखबार ने लिखा है कि त्रासदी से स्कूल बिल्डिंग के भूतहा होने की चर्चा फैल गई है। आज के समय में स्कूल प्रशासन ऐसे सोचता है और टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर पहले पन्ने पर छपी है तो निश्चित रूप से रेखांकित करने वाली बात है। खासकर तब जब उड़ीशा में डबल इंजन की सरकार नहीं है और नवीन पटनायक लंबे समय से मुख्यमंत्री हैं। 

 

द टेलीग्राफ में यह खबर लीड है। शीर्षक का हिन्दी होगा, “पाठ्यक्रम से छेड़-छाड़ के समय में एक रिमाइंडर (अनुस्मारक)”। इस मुख्य शीर्षक के साथ एक खबर का शीर्षक है, “स्कूल के लिए भूत या विज्ञान का सवाल”। भुवनेश्वर डेटलाइन से सुभाष मोहंती की खबर इस प्रकार है, माता-पिता ने अपने बच्चों को बहानागा के सरकारी नोडल हाई स्कूल में भेजने से इनकार कर दिया है। यहां ट्रेन दुर्घटना में मारे गए लोगों के शव एक दिन के लिए रखे गए थे। डर है कि स्कूल “प्रेतबाधित” है। बालासोर के जिला कलेक्टर दत्तात्रय भाऊसाहेब शिंदे ने गुरुवार को कहा कि वह राज्य सरकार को स्कूल की इमारत गिराकर नया भवन बनाने की मांग को अग्रसारित करेंगे। माता-पिता की इस मांग को स्कूल अधिकारियों का समर्थन है। हालांकि, उन्होंने जनता से आत्मनिरीक्षण करने के लिए कहा है कि क्या स्कूली बच्चों को “वैज्ञानिक सोच” विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करने के बजाय भूतों के बारे में “अंधविश्वास” का इंजेक्शन लगाया जाना चाहिए।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

 

 

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