दंगे की रिपोर्टिंग में हिन्दी अखबारों की नालायकी देखिए! 

 

हिंसा और वारदात मुक्त दक्षिण भारत ‘नये’ भाजपाई भारत से अलग है ही 

भाजपा शासित नये भारत में हिंसा संयोग हो या प्रयोग – है तो जरूर

 

अंग्रेजी का ‘न्यूज’ शब्द चार दिशाओं के अंग्रेजी नाम नॉर्थ, ईस्ट, वेस्ट और साउथ के पहले चार अक्षरों से बना है। इसमें से अंतिम साउथ यानी दक्षिण का एस अलग कर दिया जाए तो दूसरा बिल्कुल अलग शब्द बनता है – न्यू यानी नया। संयोग से भारत के इन तीन हिस्सों में थोड़ी बहुत भाजपा है या उसका शासन है पर दक्षिण भारत भाजपा से मुक्त हो चुका है और हाल में कर्नाटक में भाजपा की हार के बाद ही यह स्थिति बनी है और उत्तर में हरियाणा, पूर्व में मणिपुर तथा पश्चिम में गोली मारने का घृणा अपराध हुआ तो टेलीग्राफ ने ऐसा शीर्षक लगाया है। खबर तो सबको है और आज कई अखबारों में तीनों खबरें पहले पन्ने पर हैं भी लेकिन किसी ने टेलीग्राफ की तरह नहीं छापा है और ना मेरी तरह यह लिखा है कि भाजपा मुक्त दक्षिण, हिंसा या वारदात मुक्त है। 

यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि बीते पाँच साल में (उनके शासन में) राज्य में कोई दंगा नहीं हुआ। यह अलग बात है कि बीबीसी ने इस दावे को गलत कहा था और इसके बावजूद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बिहार में कहा था, (2025 चुनाव में) ‘आप हमें 40 में 40 सीट दीजिए, दंगाइयों को उलटा टांग देंगे’। इसके साथ अमित शाह ने (02 अप्रैल 2023) दावा किया था कि भाजपा शासित राज्यों में दंगा नहीं होता है। इसके बाद (25 अप्रैल को) अमित शाह यह दावा भी कर चुके हैं कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो कर्नाटक ‘दंगों से पीड़ित’ होगा। अमित शाह ने यह भी कहा था, “अगर कांग्रेस गलती से सत्ता में आती है तो भ्रष्टाचार चरम पर होगा और ‘तुष्टिकरण’ होगा।” 

इसके बाद प्रधानमंत्री ने रायपुर में कहा था, “कांग्रेस करप्शन और कमीशनखोरी की गारंटी है, तो मोदी भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की”। लेकिन दो जुलाई 2023 को भाजपा ने एनसीपी से अलग हुए लोगों को महाराष्ट्र सरकार में शामिल किया और भ्रष्टाचार के आरोपी अजित पवार वित्त मंत्री बन गये। एनसीपी के नौ विधायक एकनाथ शिंदे की सरकार में शामिल हुए। इसके बाद विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि ये नेता ईडी-सीबीआई के दबाव में भाजपा के साथ हुए हैं। जो भी हो, यह भाजपा की कथनी और करनी का अंतर तो है ही। हरियाणा के दंगों और उत्तर प्रदेश के बरेली में दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई करने वाले पुलिस अफसर के तबादले ने दंगों को लेकर भाजपा के दावों की पोल खोल दी। 

इससे पहले आरपीएफ के एक जवान ने अपने बॉस की हत्या के बाद जिस तरह ट्रेन में चुनकर तीन मुसलमानों की हत्या की और मोदी-योगी का नाम लिया वह नामुमकिन का मुमकिन होना है। यह अलग बात है कि अखबारों ने खबर नहीं दी लेकिन पहली बार ऐसा हुआ कि हत्या और घृणा के एक मामले में अपराधी (या रोगी) ने किसी निर्वाचित और बहुमत प्राप्त नेता का नाम लिया हो। खासकर डबल इंजन नेता का। अमूमन ऐसे लोग धर्म विशेष के नारे लगाते रहे हैं और ऐसा हिन्दुओं समेत विभिन्न धर्मों के मामले में होता रहा है। इस कांस्टेबल को अब मानसिक रोगी बताया जा रहा है जबकि ऐसा था तो उसे हथियार के साथ ड्यूटी नहीं देनी थी और दी गई तो मृतकों को उचित मुआवजा देना रेलवे और सरकार का काम है। रेल यात्रियों का बीमा भी होता ही है। पता नहीं इनका था या नहीं और इन्हें बीमा की रकम मिलेगी या नहीं। 

ना खाऊंगा ना खाने दूंगा का दावा करने वाले प्रधानमंत्री की सरकार ने बीमा खूब कराए हैं पर मुआवजे के मामले में कुछ पता नहीं चलता है और यह जनधन खाताधारकों का बीमा करने और कोविड के बाद बड़े पैमाने पर मौत के बाद भी नहीं बताया गया था जबकि यह राजनीतिक कार्य था तो प्रचारित किया जाना चाहिए था और सरकारी कार्य था तो बाकायदा घोषणा होनी चाहिए थी। इसलिए रेल में सिपाही द्वारा अपने बॉस के साथ तीन मुसलमानों को चुन कर मारना हत्या या आतंकवाद की सामान्य घटना नहीं है और भाजपा भले दावा करे कि उसकी सरकार आंतकवादी वारदात नहीं होने देती है मरने वाले के लिए क्या अंतर है। 

आज ही खबर है, महाराष्ट्र के ठाणे में पुल बनाने वाले गर्डर लांचर के गिरने से 20 लोग दबकर मर गए। पश्चिम बंगाल में चुनाव के पहले निर्माणाधीन पुल गिरा था तो मुख्यमंत्री ने इसे ऐक्ट ऑफ गॉड कहा था जबकि प्रधानमंत्री ने इसे ऐक्ट ऑफ फ्रॉड कहकर खूब सुर्खियां बटोरी थीं। बाद में बनारस समत कई भाजपा राज्यों में निर्माणाधीन पुल गिरे कितने ही लोग मरे पर प्रधानमंत्री चुप रहे। विपक्षी नेताओं ने भी इसे मुद्दा नहीं बनाया। दूसरी ओर ओर, मोरबी के पुल हादसे को देखने जाने से पहले प्रधानमंत्री ने इतना समय दिया कि अस्पताल को रंग-पोत कर सुंदर बनाया जा सके। अखबारों में खबरें नहीं छपती हैं और जो छपती हैं वो प्रचार होता जबकि व्हाट्सऐप्प यूनिवर्सिटी भी काम पर लगा हुआ है। 

ऐसे में अखबारों और टेलीविजन की भूमिका गंभीर है, भले वे न समझें। आज की खबरों और अपने पहले पन्ने से द टेलीग्राफ ने अगर यह बताने की कोशिश की है कि पूरा का पूरा उत्तर भारत या भारत का उत्तर-पूरब व पश्चिमी हिस्सा सांप्रदायिक और जातिय हिंसा की गिरफ्त में है तो तथ्य यह भी है कि दक्षिण भारत की जनता ने भाजपा को उखाड़ फेंका है। खबर देने में तथ्यों का उल्लेख करने से बचना जरूर सिखाया जाता है पर तथ्य वह नहीं होने चाहिए जिनसे सांप्रदायिकता भड़कने की आशंका हो। उदाहरण के लिए इंदिरा गांधी की हत्या उनके सिख अंगरक्षकों ने की। इस तथ्य को छिपा लिया जाता तो देश भर में शायद सिखों के खिलाफ हिंसा नहीं होती। पर वह तो नहीं हुआ उल्टे राजनीतिक कारणों से उस हिंसा का दोषी कांग्रेसियों को ठहराया जाता है (जो निश्चित रूप से ज्यादातर हिन्दू रहे होंगे और दल बदल के बाद अब दूसरे दलों में भी होंगे)। जबकि आमतौर पर दंगा भीड़ करती है और भारत में भीड़ का मतलब आप जानते हैं और भीड़ दो हिस्से में बंटी हो तो किसकी होती है। हालांकि, अभी यह मुद्दा नहीं है।     

आज हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, नूंह का दंगा गुरुग्राम तक पहुंचा, पांच मारे गए। हरियाणा के दंगे के साथ एक बड़ा तथ्य है कि अपराधी मोनू मानेसर को पकड़ा नहीं गया है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने अपनी लीड खबर के साथ दूसरी खबर का शीर्षक लगाया है, मोनू मानेसर पुलिस हिरासत में क्यों नहीं है। इसके साथ मुख्यमंत्री का बयान भी है जो बता रहा है कि हिंसा के पीछे साजिश की जांच चल रही है। आप जानते हैं कि भाजपा सरकार को रेल दुर्घटना के पीछे भी साजिश लग रही है और मणिपुर की हिंसा तथा वीडियो लीक होने के मामले में भी। इस संबंध में आरके लक्ष्मण का एक पुराना कार्टून सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इसमें एक व्यक्ति को पुलिस पकड़कर ले जा रही है और उससे कह रही है, बेशक आप अफवाह नहीं फैला रहे थे – आरोप यह है कि आप तथ्य फैला रहे थे। इसे मणिपुर में जो महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाए जाने का वीडियो बनाने वाले को सीबीआई द्वारा गिरफ्तार किये जाने से जोड़ कर देखिये और अंदाजा लगाइये कि कितना विकास हो चुका है। कहने की जरूरत नहीं है कि हम अभी भी वहीं है। 

 

टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी हरियाणा की हिंसा को लीड बनाया है और बताया है कि 80 गिरफ्तारियां हो चुकी हैं और 44 एफआईआर हैं। भीड़ के हमले की एक नई वारदात में एक और मरा। इसके बराबर की खबर का शीर्षक है, “मणिपुर में मई से जुलाई तक संवैधानिक मशीनरी ध्वस्त हो गई थी : सुप्रीम कोर्ट”। कहने की जरूरत नहीं है कि यह मणिपुर में भाजपा शासन और कथित डबल इंजन के बावजूद जनता को मिली सुविधाओं पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी है। इसके मुकाबले व्हा्टसऐप्प पर आने वाली सरकार की प्रशंसा को याद कीजिए और सोचिये कि इस सरकार से आपको क्या मिला या इस सरकार ने आपका क्या भला किया। टाइम्स ऑफ इंडिया का इंट्रो है, नूंह में यात्रा पर पथराव के एक दिन बाद मस्जिद जलाई गई। कल नवोदय टाइम्स में शीर्षक था, नूंह में धार्मिक यात्रा पर पथराव। आज शीर्षक है, नूंह के बाद पूरे हरियाणा में तनाव। 

कहने की जरूरत नहीं है कि अखबार ने पहले दिन लिखा, नूंह में धार्मिक यात्रा पर पथराव तो इसकी प्रतिक्रिया की आशंका तो रही ही होगी और उससे बचाव के उपाय किये जाने चाहिए थे। मुझे नहीं पता उपाय किये गये या नहीं और किये गये तो कैसे। जो भी हो उसके बाद जो हुआ वह क्रिया की प्रतिक्रिया थी। उसे रोकने का काम प्रशासन का था। उसने रोका नहीं या रोक नहीं पाया। प्रशासन का काम पहले दिन यात्रा पर पथराव रोकना भी था औऱ उसकी व्यवस्था करनी थी या आशंका थी तो मामले को ज्यादा बढ़ने से रोकने के लिए यात्रा रोकी जा सकती थी या कुछ किया जाना चाहिए था। इस तरह प्रशासन पहले पथराव नहीं रोक पाया और फिर उसपर प्रतिक्रिया। अखबार ने पहले बताया धार्मिक यात्रा पर पथराव और प्रतिक्रिया के लिए उकसाया (या उसका ख्याल नहीं रखा)। अगले दिन प्रतिक्रिया नहीं रोकी जा सकी तो उसे बताने की बजाय कहा जा रहा है कि पूरे हरियाणा में तनाव है। जबकि मुझे लगता है कि तनाव तो एनसीआर क्षेत्र में भी होगा। या पूरे एनसीआर भी लिखा जा सकता था। तो यह है पूरा परिदृश्य। अगर प्रशासन शीर्षक पर टीका-टिप्पणी करे तो वह हस्तक्षेप हो जाएगा नहीं करे तो खुल्ला खेल फर्रूखाबादी। आजकल यही चल रहा है। 

टाइम्स ऑफ इंडिया ने जैसे खबर दी है वैसे खबर नहीं दी जाती है। अमर उजाला का आज का शीर्षक है, नूंह में दंगाइयों को देखते ही गोली मारने का आदेश ….। कहने की जरूरत नहीं है कि यह शीर्षक मेरे जैसे पाठक के लिए नहीं है जिसे दूसरे अखबारों से भी सूचना मिलती है। यह एक अखबार के नियमित पाठक के लिए है और कल के शीर्षक, शोभायात्रा पर पथराव के बाद बवाल, दो होमगार्डों की मौत। यहां शीर्षक में नहीं है पर टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर है मस्जिद जलाई गई। सवाल उठता है, देखते ही गोली मारने के आदेश के बावजूद ऐसा कैसे हुआ या आदेश बाद में दिया गया। खबरों में कुछ तथ्य नहीं रहने से अफवाह फैलती है। और उसका भी असर होता है। मैं सिर्फ शीर्षक की बात कर रहा हूं हो सकता है दंगाई पूरी खबर पढ़ते हों या नहीं भी पढ़ते हों तो खबर में सारी बातें होनी ही चाहिए। ऐसे सवालों का जवाब जरूर। 

उदाहरण के लिए, द हिन्दू की खबर का शीर्षक है, मस्जिद पर हमले में इमाम की मौत। हरियाणा में मरने वाले पांच हुए। दोनों खबरों से लगता है कि मस्जिद तो जलाई ही गई, इमाम भी मारा गया और हिन्दी अखबार बता रहे हैं कि पूरे हरियाणा में तनाव है या हिंसा के पीछे साजिश की आशंका है। मोटी सी बात है कि पुलिस रोक नहीं पा रही है जिसका उल्लेख ही नहीं है। टाइम्स और हिन्दू की खबर में भले परोक्ष रूप से यही बताया गया है और खबर भी है। अंग्रेजी के अखबारों की खबरों के मुकाबले हिन्दी के अखबारों की दयनीय स्थिति स्पष्ट है। यह दंगे के समय रिपोर्टिंग का संकट हो सकता है और इसका रास्ता निकाला जाना चाहिए। इससे बचने का तरीका इंटरनेट बंद करना तो बिल्कुल नहीं है पर आजकल वही किया जाता है। 

इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर लीड है। फ्लैग शीर्षक है, हरियाणा में मरने वाले पांच हुए। मुख्य शीर्षक है, हिंसा गुड़गांव के कुछ हिस्से में फैली, मुख्यमंत्री ने कहा साजिश। यहां मुख्यमंत्री ने कहा साजिश – खाली जगह भरने के लिए भी जोड़ा गया हो सकता है पर यही आपत्तिजनक है। साजिश तो यह है कि मस्जिद जलाई गई, इमाम की मौत हो गई उसके बाद देखते ही गोली मारने का आदेश जारी हुआ। हो सकता है मेरा यह निष्कर्ष गलत हो पर आज के अखबारों की खबरों, शीर्षक से तो यही लगता है। और यही राजनीति है। कुछ अखबार सीधे-सीधे सरकार की सहायता करते नजर आ रहे हैं और इसके लिए गोल-मोल शीर्षक लगाने से लेकर साजिश के आरोप को प्रचार देना शामिल है। साजिश हो भी तो मुख्यमंत्री का काम है उससे निपटना। यह बचाव नहीं हो सकता है और ना बताकर अपनी नालायकी से छुटकारा पाया जा सकता है। मुझे लगता है कि यह रिपोर्टिंग कांग्रेस के जमाने की या जब मैं और मेरे समय के लोग डेस्क पर होते थे तबकी रिपोर्टिंग से अलग है।

इंडियन एक्सप्रेस में मुख्य खबर के साथ एक और खबर का शीर्षक है, यात्रा का प्रबंध सर्वश्रेष्ठ नहीं था, सख्त कार्रवाई की जाएगी। यह खबर हरियाणा के मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के हवाले से है। हालांकि इसका विस्तार नहीं है लेकिन इतने से ही पता चलता है कि प्रबंध ठीक होता तो शायद हिंसा नहीं होती और जवाबी कार्रवाई नहीं होती और पूरा हरियाणा तनाव में नहीं घिरता। जो भी हो, प्रबंध ठीक हो यह सुनिश्चित करना सरकार का ही काम है। कुल मिलाकर, आज के अखबारों में पहले पन्ने पर तीन ही दिशाओं की खबरें हैं। दक्षिण भारत की खबर चाहे जिस कारण से न हो। न्यूज शब्द अगर दिशाओं के नाम से बनता है तो नया में तीन ही दिशाएं हैं और यह नये भारत की कहानी कही जा सकती है। और एक्सप्रेस की इस खबर के अनुसार उप मुख्य मंत्री ने कहा है कि यात्रा का प्रबंध सर्वश्रेष्ठ नहीं था।  

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

 

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