बीजेपी के पक्ष में हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए मरा जा रहा है दिल्ली मीडिया

‘क्लियर्स’से क्लीनचिट तक के उदाहरण देखिये 

 

आज की असली और सबसे बड़ी खबर, “हिन्डबर्ग-अडानी मामले में सेबी को एक्सपर्ट पैनल से मिला क्लीनचिट है”। लेकिन यह सिर्फ द हिन्दू की लीड खबर है। उसने शीर्षक में ‘क्लियर्स’ का उपयोग किया है और वह भी सिंगल इनवर्टेड कॉमा में है। इस मामले में आगे बढ़ने से पहले आज के दूसरे अखबारों की लीड देख लेते हैं। द टेलीग्राफ की लीड 2000 रुपए का नोट रद्द किए जाने पर है, “मित्रों, 2000 के नोट को अलविदा कहिये”। इसमें शून्य की जगह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक ही तस्वीर तीन बार है जो बताती है कि इसे पेश करने में नरेन्द्र मोदी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मेरे पांच में से चार अखबार दिल्ली के हैं और दिल्ली के चार में से तीन अखबारों की लीड है दिल्ली की खबर और खबर मुख्य रूप से यह है कि दिल्ली में ट्रांसफर पोस्टिंग पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बेअसर करने के लिए केंद्र सरकार अध्यादेश लेकर आई है। कहने की जरूरत नहीं है कि इसका संबंध पिछले दिनों केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू को अचानक कम महत्वपूर्ण माने जाने वाले मंत्रालय का मंत्री बनाने और उसी तरह अचानक संस्कृति व संसदीय मामलों के कनिष्ठ मंत्री को कैबिनेट मंत्री बनाए जाने से भी हो सकता है। 

नए कानून मंत्री अर्जुन मेघवाल 2009 से सांसद हैं और कोरोना महामारी के समय एक पापड़ ब्रांड (भाभी जी ब्रांड) का प्रचार-प्रसार करने के लिए विवाद में रहे हैं। राजस्थान से सांसद हैं जहां विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। रिजिजू को हटाए जाने के अस्पष्ट कारणों के बीच उनके उत्तराधिकारी का यह बयान महत्वपूर्ण था कि कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संबंध सद्भावना पूर्ण और संवैधानिक रहेगा। कहने की जरूरत नहीं है कि रिजिजू जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर न्यायपालिका के प्रखर आलोचक रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले स्पष्ट रूप से केंद्र सरकार के खिलाफ रहे हैं। इनमें दिल्ली के उपराज्यपाल के अधिकार से लेकर महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और फैसला उल्लेखनीय है। 

इससे पहले सेबी ने 17 मई को एक नए हलफ़नामे में स्पष्ट किया था कि अडानी समूह की 2016 से जांच नहीं की जा रही है। सेबी ने कहा था कि ग्लोबल डिपॉजिटरी रिसीट यानी जीडीआर के संदिग्ध दुरुपयोग को लेकर हो रही उसकी जांच में अडानी समूह की कोई भी सूचीबद्ध कंपनी शामिल नहीं है। अडानी मामले में सेबी के एक अधिकारी, जिसकी आयु 22-25 वर्ष बताई जा रही है का बयान महत्वपूर्ण है क्योंकि अदानी समूह का मामला विश्व स्तर पर बहुत बारीकी से ट्रैक किया जा रहा है और इस बात पर गौर किया जा रहा है कि भारत की अदालतें और विनियामक संस्थाएं, धोखाधड़ी और कॉरपोरेट गवर्नेंस के उल्लंघन के आरोपों से कैसे निपटती हैं ख़ासकर तब जब आरोप किसी ऐसे समूह के ख़िलाफ़ हैं जो घोषित रूप से प्रधानमंत्री के करीबी हैं और प्रधानमंत्री के बारे में यह प्रचार किया गया था कि उनका कोई नहीं है। 2014 में लोकसभा का चुनाव जीतने और उनकी पार्टी को बहुमत मिलने तथा प्रधानमंत्री का पद संभालने के बहुत बाद में पता चला कि उनकी मां जीवित हैं (अब दिवंगत) और शादी हो चुकी थी जिसे उन्होंने स्वीकार ही नहीं किया था। 

इससे इन खबरों की महत्ता समझी जा सकती है और किसी खबर को दबाने के लिए दूसरी खबर या अध्यादेश के समय का अपना महत्व है और यह सब शुक्रवार की शाम हो तो निश्चित रूप से इनका मकसद हो सकता है और इसका कारण यह भी है कि पहले भी इस पार्टी और सरकार से संबंधित मामलों में ऐसा होता रहा है। अदानी समूह की कंपनियां, उनके काम और उनमें निवेश तथा उसकी जांच का महत्व इसलिए भी है कि ये कंपनियां कमोडिटी ट्रेडिंग, हवाई अड्डों और बंदरगाहों के संचालन के साथ अक्षय ऊर्जा सहित कई क्षेत्रों में काम करती हैं और भारत सरकार की विनिवेशीकरण योजना का लाभ पाने वालों में प्रमुख है। ऐसे में, दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बेअसर करने के लिए लाए गए अध्यादेश से संबंधित खबरों के शीर्षक के भी मायने हैं। प्रस्तुति तो दिल्ली के तीन अखबारों में लीड के रूप में है ही। 

इंडियन एक्सप्रेस की लीड पांच कॉलम में दो लाइन के शीर्षक के साथ है। मुख्य शीर्षक है, “सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार का सशक्तिकरण किया, केंद्र ने अध्यादेश जारी कर नौकरशाहों को मुख्यमंत्री से ऊपर कर दिया”। उपशीर्षक है, (राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा) प्राधिकरण की स्थापना की जिसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री करेंगे और केंद्र सरकार के दो अधिकारी करेंगे, सभी मामले बहुमत के आधार पर तय किये जाएंगे। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड है। इसका शीर्षक है, “दिल्ली सर्विसेज पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बेअसर करने के लिए अध्यादेश लाया गया”। इसके साथ एक बॉक्स में बताया गया है कि एलजी यानी उपराज्यपाल का कैसे सशक्तिकरण किया गया है। टाइम्स ऑफ इंडिया में इस खबर का शीर्षक है, “सुप्रीम कोर्ट के आदेश को नकारते हुए दिल्ली के अधिकारियों की तैनाती के लिए केंद्र सरकार अध्यादेश ले आई”। 

टाइम्स ऑफ इंडिया ने अडानी को सुप्रीम कोर्ट के पैनल से क्लीन चिट मिलने की खबर का जो शीर्षक लगाया है वह हिन्दी में कुछ इस प्रकार होता, “सुप्रीम कोर्ट पैनल ने कहा अडानी के शेयर गिरने में सेबी की ओर से कोई नियामक नाकामी नहीं”। अखबार ने अपनी इस खबर के साथ बताया है कि संदिग्ध सौदों के लिए छह इकाइयों की जांच चल रही थी। 2000 के नोट की मियाद खत्म होने और उसे रद्द किए जाने की घोषणा इस पन्ने पर नहीं है। हां, इंडियन एक्सप्रेस की एक एक्सक्लूसिव खबर का खंडन (दरअसल उसके बाद का बदलाव) इसमें जरूर है और मीडिया विजिल के पाठकों के लिए इसका उल्लेख किया जाना चाहिए। आप जानते हैं कि विदेश में क्रेडिट कार्ड पर किए जाने वाले खर्च पर हाल में टैक्स लगाया गया था। अब स्पष्टीकरण आया है कि यह टैक्स सात लाख रुपए से ऊपर के खर्च पर ही लगेगा। मेरा मानना है कि ऐसे कितने पैसे टैक्स के रूप में मिलेंगे और इतने पैसे के लिए क्या ऐसे नियमों का कोई उद्देश्य है जिसका पालन और जिसका डर दोनों मुश्किलें पैदा कर सकता है। लेकिन वह अलग मुद्दा है। 

इंडियन एक्सप्रेस में 2000 के नोट वापस लिए जाने की खबर लीड के बराबर में टॉप पर दो कॉलम में है। अडानी के मामले में सुप्रीम कोर्ट की एक्सपर्ट कमेटी की खबर भी दो कॉलम में है और यह शीर्षक भी क्लीन चिट मिलने जैसी है। द हिन्दू में 2000 के नोट वाली खबर सिंगल कॉलम की है और दिल्ली के अध्यादेश की खबर फोल्ड के नीचे असल में सबसे नीचे दो कॉलम में है। द हिन्दू का दिल्ली संस्करण असल में दिल्ली में रहने वाले दक्षिण भारतीय पाठकों के लिए है। इसलिए दिल्ली की खबरों को लेकर इसकी प्राथमिकता थोड़ी अलग होती है। इसे इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इस लिहाज से अडानी की खबर को इसने राष्ट्रीय महत्व दिया है। द टेलीग्राफ ने भी अडानी की खबर को सिंगल कॉलम में रखा है और दिल्ली के लिए अध्यादेश की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। 

कहने की जरूरत नहीं है कि आज के मेरे अखबारों में अडानी की खबरों को वह महत्व नहीं मिला है जो मिलना चाहिए था और टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे लीड नहीं बनाकर भी जो जानकारी दी है वह दूसरे अखबारों में नहीं है जबकि तथाकथित क्लीनचिट मामले में यह इसलिए भी महत्वूर्ण है कि जेपीसी की मांग को इसी जांच के आधार पर टालने के लिए कहा जाता रहा है। कांग्रेस की ओर से यह समझाने की कोशिश होती रही है कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी वाली जांच का दायरा वह है ही नहीं जिसकी जांच की मांग राहुल गांधी करते रहे हैं या जो होनी चाहिए। इस विषय पर तृणमूल कांग्रेस की सांसद, महुआ मोइत्रा पहले कह और ट्वीट कर चुकी हैं तथा इसके आधार पर द टेलीग्राफ ने पहले ही खबर दी है। इसकी चर्चा मीडिया विजिल के इस कॉलम में पहले हो चुकी है। 

आज इस मामले को समझने के लिए टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर का उल्लेख करता हूं। इससे आप समझ सकेंगे कि कैसे दूसरे अखबारों ने मूल मुद्दे को गोल करके तथाकथित क्लीन चिट का प्रचार किया है। सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया है कि जांच अडानी के शेयर गिरने की हो रही थी शेल कंपनी के निवेश की नहीं।  और जिन संदिग्धों की जांच हो रही थी वह निवेश के लिए नहीं, शेयर के भाव कम करने में भूमिका के लिए हो रही थी। इससे जाहिर है कि उसी कंपनी की जांच हो रही हो तो भी मुद्दा दूसरा था। इस क्लीन चिट को भक्त सुप्रीम कोर्ट से क्लीन चिट कह सकते हैं पर है यह गुजरात मॉडल वाला ही। मीडिया गोदी में हो तो यह मुश्किल नहीं है और बचाव प्रचारकों की पार्टी कर रही हो हो तो क्या कहने।  

आप कह सकते हैं कि महुआ मोइत्रा का मामला इससे अलग है पर तथ्य यह है कि उसकी जांच ही नहीं हुई है। सेबी के शपथपत्र पर द टेलीग्राफ की खबर में कहा गया था और मैंने यहां 17 मई को लिखा था, अर्थशास्त्री प्रसेनजीत बोस ने कहा है कि हलफनामे से सेबी की “अक्षमता, इससे भी बदतर, एक बेशर्म लीपा पोती” का पता चलता है। यह खबर तब नहीं छपी थी और आज तो बाकायदा नहीं छपी। लेकिन खबर क्लीन चिट देने वाली है। हिन्दी अखबारों में यह खबर आज कैसे छपी, मैं नहीं देख पाया लेकिन पूरी उम्मीद है कि भविष्य में इस खबर का उपयोग ‘सुप्रीम कोर्ट के क्लीनचिट’ के रूप में जरूर किया जाएगा। उदाहरण हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर का यह कतरन है जो शीर्षक में ‘क्लीन चिट’ का उपयोग कर रहा है। हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट का विस्तार और क्लीन चिट का यह प्रमाणपत्र  – याद रखेगा हिन्दुस्तान। इसलिए बजरंगबली पर भरोसा रखिये। अब जो करेंगे, वही करेंगे और उम्मीद है अच्छा ही करेंगे। उनकी ताकत और निष्पक्षता पर मुझे कोई संदेह नहीं है। आप भी भरोसा रखिये और हनुमान चालीसा पढ़ा कीजिए।  

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

 

    

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