मणिपुर की ‘शर्म ‘से मोदी सरकार को उबारने में नंगा हुआ मीडिया

आज की खबरों से दिख रहा है-

प्रशासन चलाने में गोल पर राजनीति बतियाने में सबसे तेज है भाजपा!

पढ़िये और समझिये कि मीडिया इस राष्ट्रवादी पार्टी का साथ कैसे दे रहा है

 

मणिपुर के वीडियो से हुए नुकसान की भरपाई के लिए भाजपा तरह-तरह के प्रयास कर रही है और इनमें सबसे प्रमुख पर सबसे फूहड़ है, देश में ऐसी और घटनाओं के आरोप लगाना। इसकी शुरुआत प्रधानमंत्री द्वारा 78 दिनों की हिंसा के बाद ‘मणिपुर’ बोलने से हुई थी। आप जानते हैं कि मणिपुर के साथ उन्होंने राजस्थान और छत्तीसगढ़ का नाम बिलावजह लिया था। इसके बाद समर्थकों ने संकेत समझा और गैर भाजपा शासित राज्यों में महिला उत्पीड़न के मामले उजागर करने लगे। इस क्रम में पश्चिम बंगाल में मणिपुर जैसा ही एक मामला होने का आरोप लगाया गया लेकिन राज्य के डीजीपी ने उसका कायदे से खंडन कर दिया।
इसके बावजूद शनिवार को कुछ अखबारों में उसकी खबर पहले पन्ने पर थी। इस तथ्य के बावजूद कि डीजीपी ने खंडन किया है, आरोप लगाने वाली महिला ने अपना बयान दर्ज नहीं कराया है और जबरदस्ती किये जाने से हुए जख्म, उसके इलाज का कोई सबूत नहीं दिया है। वीडियो तो नहीं ही है। जाहिर है, यह मामला नहीं चला तो कल शाम भाजपा के हैंडल से एक ट्वीट कर विपक्षी राज्यों में महिला उत्पीड़न के मामलों का उल्लेख किया गया और यह आरोप लगाया गया, ….. विपक्ष इन पर सब मौन साधे हैं! साफ़ है कि विपक्ष पहले राज्य देखता है, उसके बाद महिला और फिर अपने विरोध तय करता है! इसपर मैंने अलग से लिखा है इसलिए अभी कल सामने आए पश्चिम बंगाल के मामले का जिक्र करता हूं। यह आज के अखबारों में भी है।

भाजपा के कल के ट्वीट में पहला बिन्दु था, जुलाई 2023 : बंगाल पंचायत चुनाव में पांचला में महिला प्रत्याशी को निर्वस्त्र कर घुमाया गया। आज अमर उजाला में कोलकाता डेटलाइन से टॉप पर ब्यूरो की खबर है, “पश्चिम बंगाल : मालदा में भी बर्बरता” – फ्लैग शीर्षक है। मुख्य शीर्षक है, दो आदिवासी महिलाओं की निर्वस्त्र कर पिटाई। खबर के अनुसार, पश्चिम बंगाल में हावड़ा के बाद अब मालदा जिले में भी मणिपुर की तरह महिलाओं से बर्बरता की घटना सामने आई है। वायरल वीडियो के अनुसार, पकुआहाट इलाके में लोगों ने चोरी के आरोप में दो आदिवासी महिलाओं को निर्वस्त्र करके जूतों व लात-घूसों से बेरहमी से पिटाई की। घटना 19 वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि दो महिलाओं को कुछ महिलाएं जमकर पीट रही हैं। हालांकि, पुलिस को इस तरह की कोई शिकायत नहीं मिली है। पुलिस का कहना है कि वायरल वीडियो देखने के बाद ही उनको इस घटना का पता चला है। …. पुलिस ने कहा है कि स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई की जाएगी।

कहने की जरूरत नहीं है कि यह मणिपुर मामले से बहुत अलग है। इसलिए भी कि उसके वायरल होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कार्रवाई के लिए कहा, आरोपी पकड़ा गया। यहां शिकायत ही नहीं है वहां जीरो एफआईआर के बावजूद गिरफ्तारी नहीं हुई थी। फिर भी अमर उजाला में इस खबर के साथ एक औऱ खबर है, मणिपुर की घटना पर राजनीति। इसके अनुसार, केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा है, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और बिहार में महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराधों की लंबी सूची है लेकिन ममता बनर्जी मणिपुर की घटना पर राजनीति कर रही हैं। मानवता तब शर्मसार हुई जब हावड़ा में तृणमूल के 40 से अधिक गुंडों ने पंचायत चुनाव के दिन एक महिला को निर्वसत्र कर घुमाया। अमर उजाला ने इसके नीचे (एक ही कॉलम में तीसरी) खबर छापा है, “मणिपुर में फिर भड़की हिंसा, घर स्कूल जलाये गये”। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा शासित, डबल इंजन वाले मणिपुर में हिंसा संभल नहीं रही है और विपक्ष के नेता अगर इसमें राजनीति या राजनीति करने का मौका देख रहे हैं तो भाजपा भी स्थिति को नियंत्रित करने की बजाय राजनीति कर रही है और इसमें झूठी खबरें भी फैला रही है। इसमें उसे मीडिया और समर्थकों का सहयोग भी मिल रहा है।

मणिपुर की यह खबर आज नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स में दो खबरे हैं। पहली का शीर्षक है, “मणिपुर की घटना पर पुलिसियों ने कहा चीजें ‘शांत’ हैं”। इसके साथ एक और खबर है जिसका शीर्षक है, “जनजातिय तनाव फैल गया है इसलिए मेइती मिजोरम छोड़ रहे हैं”। लेकिन मालदा की घटना का जिक्र यहां भी दो कॉलम में है। फ्लैग शीर्षक है, “भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस पर हमला किया”। द हिन्दू में मिजोरम की खबर लीड है और पश्चिम बंगाल वाली खबर पहले पन्ने पर नहीं है। लीड का शीर्षक है, “तनाव बढ़ रहा है तो मेइती मिजोरम छोड़ने के लिए मजबूर हैं”। उपशीर्षक है, “इस पलायन से पहले पूर्व आतंकवादियों के एक समूह ने कहा था कि ‘अपनी सुरक्षा’ के लिए चले जाएं 56 मेइतियों ने इंफाल की फ्लाइट ली, कई बसों व टैक्सियों से गए”।

पश्चिम बंगाल की हिन्सा के संबंध में एक खबर आज हिन्दुस्तान टाइम्स में है। “एक वीडियो है, जो पश्चिम बंगाल के मालदा से इंटरनेट पर वायरल हो रहा है। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने एक मीडिया ब्रीफिंग में कहा, दो दलित महिलाओं को बेरहमी से पीटा गया और उनके कपड़े उतार दिए गए। इसके जवाब में टीएमसी ने कहा कि विपक्ष इस मुद्दे का राजनीतिकरण कर रहा है। राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री शशि पांजा ने कहा कि पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है। “यह आरोप लगाया गया था कि उन दो गरीब महिलाओं ने कुछ चुराया था। गांव की कुछ महिलाओं के बीच झगड़ा हो गया, जो मारपीट में बदल गया। हाथापाई में उनके कपड़े उतर गए,” पांजा ने कहा।

“महिला नागरिक स्वयंसेवकों ने हस्तक्षेप करने की कोशिश की, लेकिन वे असफल रहीं क्योंकि वे सशक्त थीं।” चश्मदीदों के अनुसार, पांच आदिवासी महिलाएं अपनी उपज बेचने के लिए बामनगोला के साप्ताहिक बाजार में गईं। वे कथित तौर पर चोरी करती पकड़ी गई थीं। इनमें से तीन भागने में सफल रहीं, स्थानीय महिलाओं ने उनमें से दो को पकड़ लिया और उनके साथ मारपीट की। अब इस मामले में कितनी राजनीति है और कितनी सरकार की लापरवाही यह आप तय कीजिये और देखिये कि यह खबर आपके अखबार में कैसे छपी है और तय कीजिये कि आपको खबरें दी जा रही हैं या भड़काया / उकसाया जा रहा है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में भी मणिपुर की खबर तीन कॉलम में टॉप पर है। इसका शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, “बदले की कार्रवाई के डर से मणिपुरियों का एक वर्ग मिजोरम छोड़कर भागा”। इस खबर का इंट्रो है, “4 मई की भीड़ वाली वारदात के लिए दो और गिरफ्तार, इनमें एक अवयस्क। कहने की जरूरत नहीं है कि ये पेशेवर अपराधी नहीं हैं ना ही चुनावी हिंसा करने वालों की श्रेणी में रखे जा सकते हैं। ये समाज में फैल रही घृणा के शिकार हुए हैं और भीड़ में मौका मिला तो दूसरे पक्ष की महिला को अपमानित करने का मौका नहीं चूके।

ये अवयस्क, भाजपा सांसद ब्रजभूषण सिंह की तरह जिम्मेदार पद पर भी नहीं थे और ना उनपर देश की महिला खिलाड़ियों को सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन में सहयोग करने की जिम्मेदारी थी फिर भी वे उनका यौन शोषण करने के आरोपी है। इसीलिए, यह तथ्य मीडिया में प्रमुखता से नहीं है पर जाहिर है कि ऐसा क्यों है और इसके लिए सरकार अपनी जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकती है पर वह टुच्ची राजनीति में लगी है। ऐसे में हालत यह है कि स्वतंत्रता सेनानी की विधवा को जिन्दा जला दिया गया और देश भक्ति की दुहाई देने वाली सरकार बचा भी नहीं पाई। यह टाइम्स ऑफ इंडिया की दूसरी खबर है जो मिजोरम की खबर के साथ छपी है।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने इन खबरों के साथ भाजपा की राजनीति को भी पूरा महत्व दिया है और बताया है कि मालदा मामले में पांच लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इसमें ‘वीडियो वायरल होने पर’ नहीं लिखा है बल्कि कहा गया है कि ‘वीडियो सामने आने के बाद’ – और यह भी राजनीति है। भाजपा मणिपुर के बाद इन घटनाओं का उल्लेख करके मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से सवाल कर रही है जबकि राज्य में इन मामलों में सामान्य तौर पर समय पर आवश्यक कार्रवाई हो रही है और मणिपुर से अलग स्थिति है। वहां वीडियो 70 से ज्यादा दिनों तक छिपा रहा और संसद सत्र के पहले वायरल हो गया तो प्रधानमंत्री को बोलना पड़ा। हालांकि संसद में जवाब देने की मांग अभी पूरी नहीं हुई है। लेकिन अमर उजाला की खबर आपने पढ़ ली जो भाजपा की राजनीति का प्रचार करती लग रही है।

ऐसी स्थिति में भाजपा ने आरोप लगाया है और बेशक उसके पास ऐसा जिगरा है इसलिए, कि विपक्ष बंगाल, बिहार और राजस्थान में महिला उत्पीड़न पर चुप है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस आरोप को पहले पन्ने पर दो कॉलम के शीर्षक के साथ छापा है और इसके साथ राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलौत का आरोप भी है। उन्होंने कहा है कि प्रधानमंत्री के पास उन राज्यों का दौरा करने का समय है जहां चुनाव होने हैं पर वे उत्तर पूर्व के राज्य में नहीं गये हैं।

इंडियन एक्सप्रेस बनाम द टेलीग्राफ

इंडियन एक्सप्रेस और द टेलीग्राफ ने आज एक जैसी खबरों को पहले पन्ने पर प्रमुखता से छापा है और महत्व दिया है। ऐसे में दोनों की प्रस्तुति की तुलना उल्लेखनीय और दिलचस्प है। इंडियन एक्सप्रेस का फ्लैग शीर्षक है, “मिजो संगठन ने मेइती समुदाय के सदस्यों से राज्य छोड़ने के लिए कहा”। मुख्य शीर्षक है, “मेइती ‘धमकी’ के बाद मिजोरम छोड़ रहे हैं, मणिपुर सरकार ने कहा उड़ान मुहैया कराने के लिए तैयार है”। इंट्रो है, “मिजोरम के होम कमिश्नर (गृह आयुक्त) ने कहा कि संगठन के शब्दों को गलत समझा गया”। इसके साथ एक खबर का शीर्षक है, “(झारखंड के मुख्यमंत्री) हेमंत सोरेन ने राष्ट्रपति को लिखा, अपने आदिवासी भाइयों-बहनों से ऐसा व्यवहार नहीं होने दे सकता”। इसके ठीक नीचे अखबार ने एक खबर छापी है जिसका शीर्षक है, “भाजपा का जवाब बिहार राजस्थान और पश्चिम बंगाल को देखिये”।
मुझे तो इस जवाब पर हंसी आ रही है और इसमें खबर क्या है, नहीं समझ पा रहा हूं। इंडियन एक्सप्रेस ने शायद इसीलिए इसे इतना महत्व दिया है ताकि हम आप भाजपा के जवाब का स्तर जान सकें। कहने की जरूरत नहीं है कि एक आदिवासी बहुल राज्य के आदिवासी मुख्यमंत्री ने अगर आदिवासियों के हित में, उनका ख्याल रखे जाने के लिए (आदिवासी) राष्ट्रपति को लिखा तो उससे बिहार, राजस्थान और पश्चिम बंगाल को देखने के लिए क्यों कहा जा रहा है और इसका क्या मतलब है? बेशक, यह एंटायर पॉलिटिकल साइंस का कोई पाठ हो सकता है पर खबर तो नहीं है। ऐसा मैं इसलिए भी कह रहा हूं कि द टेलीग्राफ ने अपनी खबर को संतुलित करने के लिए इस बकवास को महत्व नहीं दिया है। सत्तारूढ़ दल के रूप में भाजपा का पत्रकारिता का ज्ञान निश्चित रूप से एंटायर जर्नलिज्म नहीं हो सकता है।

टेलीग्राफ ने सोरेन के पत्र को लीड बनाया है। फ्लैग शीर्षक में बताया है कि मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर मणिपुर में न्याय सुनिश्चित करने के लिए कहा। मुख्य शीर्षक है, राष्ट्रपति से अपील – खुलकर बोलिये। इस शीर्षक के साथ इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक (भाजपा के आरोप के रूप में) और हास्यास्पद लगेगा तथा अघोषित इमरजेंसी की यह पत्रकारिता निश्चित रूप से रेखांकित करने लायक है। इंडियन एक्सप्रेस ने मणिपुर से संबंधित अपनी खबरों के साथ तीन मणिपुरी छात्रों के दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिले के इंतजार पर भी एख खबर छापी है जो बताती है कि किसी राज्य में हिन्सा और अनिश्चितता की स्थिति बनी रहने का असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है और उन्हें कितनी मुश्किल आती है। टेलीग्राफ ने हेमंत सोरेन के पत्र की खबर के साथ मिजोरम की जो खबर छापी है उसका शीर्षक है, मिजोरम के मेइती जवाबी हमलों के डर से घिरे हुए हैं।

नवोदय टाइम्स में आज पहले पन्ने पर तीन कॉलम की एक खबर है, “अब बांग्लादेश के हिन्दू मंदिर में तोड़ी गई 5-6 मूर्तियां”। मणिपुर की जो खबर मेरे सभी अखबारों में आज पहले पन्ने पर है वह यहां नहीं है। दोनों ही नहीं। यानी भाजपा के आरोप भी नहीं पर इस खबर में शीर्षक के ये शब्द, ‘हिन्दू मंदिर में तोड़ी’ लाल स्याही से हैं। अव्वल तो बांग्लादेश के हिन्दू मंदिर का क्या मतलब? मंदिर तो हिन्दू के ही होते हैं, यही नहीं मूर्तियां भी हिन्दू देवी-देवताओं की ही होती हैं। किसी और धर्म स्थल को मंदिर नहीं कहा जाता है। ऐसे में बांग्लादेश की इस खबर को पहले पन्ने पर चार खास शब्दों को लाल रंग से तीन कॉलम में छापने का क्या मतलब है। इसे पढ़कर या जानकर पाठकों को क्या करना है? अगर सरकार को कुछ करना है तो वह क्यों नहीं कर रही है और इतनी मजबूत हिन्दू सरकार के रहते अगर पड़ोसी देश में मूर्तियां तोड़ी जा रही हैं तो यह सरकार की मजबूती, विदेश से संबंध आदि पर सवाल नहीं है?

खबर उसकी नहीं होनी चाहिए? यह धार्मिक आस्था पर चोट पहुंचाने वाली खबर नहीं है? अगर मणिपुर की घटना का वीडियो दुनिया भर में कहीं भी लीक या जारी नहीं हुआ तो इसे यहां इतनी प्रमुखता से छापने की क्या जरूरत और अगर कोई जरूरत या कार्रवाई होनी है तो खबर वह नहीं होनी चाहिए कि सरकार ने क्या किया या नहीं किया। अगर इतनी ही प्रमुख थी तो सिंगल कॉलम में छोटी सी भी छपती तो सरकार कार्रवाई करती और सूचना मिल जाती। जाहिर है, यह हिन्दुओं की भावनाओं को भड़काने और हमेशा गुस्से में रखने के काम आएगी और इसीलिए छापी गई है या छापने वाले को इस लायक लगी है या उसके गुस्से का असर है। यह इरादतन नहीं है तो देश के उन्मादी माहौल का वर्णन है जिसका असर अखबारों के दफ्तरों तक पहुंच चुका है।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

 

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