‘नॉट बिफोर मी’ और ‘सुप्रीम कोर्ट जुग-जुग जियो’ के बीच अदालतों की निष्पक्षता का सवाल

 

कुछ मामले जो बहुमत की सरकार, उसकी मनमानी, अदालतों की निष्पक्षता और उसपर दबाव के संकेत देते हैं

 

गुजरात हाईकोर्ट की जज गीता गोपी ने राहुल गांधी का मामला सुनने से इनकार कर दिया और सिर्फ इतना कहा, नॉट बिफोर मी। अमूमन जजों को किसी मामले से अलग होने के लिए इससे ज्यादा कहने की जरूरत नहीं होती है। लेकिन इसके मायने हैं और इसे समझना मुश्किल नहीं है। देश में अगर सामान्य ढंग से पत्रकारिता चल रही होती तो इसके बाद, ‘नॉट बिफोर मी’ के मामलों से अखबार भर जाने चाहिए थे। प्रधानमंत्री जब 1947 और 1964 के यूदध के उदाहरण देते हैं तो 2000 के बाद के गुजरात के मामलों का जिक्र तो बनता ही है। खासकर तब जब शासन का बहु प्रचारित ‘गुजरात मॉडल’ घोषित या अघोषित रूप से देश भर में लागू है। कुछ लोगों ने ऐसी खबरें की हैं पर वह बहुत कम है और मुख्यधारा की मीडिया में नहीं होने के मायने हैं। हालांकि, अभी मुद्दा वह नहीं है। 

आज मुद्दा यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 28 अप्रैल 2023 को तीन प्रमुख आदेश दिए जिनकी चर्चा और प्रशंसा रही। आज के अखबारों में संबंधित खबरें भी हैं। मोटे तौर पर इन खबरों का मतलब यही है कि सरकार ने अपना काम नहीं किया, लोगों को सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ी और तब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि वह अपना काम करे जो उसे पहले ही, सामान्य तौर पर करना चाहिए था। पर हालत यह है कि लोगों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद भरोसा नहीं है कि सरकार काम करेगी और अमर उजाला में छह कॉलम में टॉप की खबर है, “बृजभूषण के खिलाफ दो एफआईआर दर्ज, पर पहलवान गिरफ्तारी पर अड़े …. धरना जारी।” यह यूं ही नहीं है। पुराने उदाहरण मिल जाएंगे जब एफआईआर के बाद भी कार्रवाई नहीं हुई और पीड़ित को न्याय नहीं मिला या उसका काम नहीं हुआ। 

आज मैं कुछ पुरानी खबरों के आधार पर यह रेखांकित करना चाहता हूं कि भाजपा शासन में अदालत या उसके फैसलों का उपयोग सरकार अपनी जरूरतें या इच्छाएं पूरी करने की लिए करती है। सीलबंद लिफाफे का मामला और उसपर इंडियन एक्सप्रेस के संपादक के व्यंग का असर, कुछ बयान, कुछ फैसले, कुछ तथ्य और कुछ मामले मैं याद दिला देता हूं। समग्र रूप में आप देखिए और समझिये कि क्या हो रहा लगता है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि ‘दीदी-भतीजा’ के गुनाह को दूर करने का रास्ता बीजेपी को जिताना है। बंगाल को आतंक से मुक्त करने का एकमात्र तरीका हमारी पार्टी है। उन्होंने कहा कि 2024 में हमें 35 सीटें दें फिर साल 2025 पश्चिम बंगाल चुनाव की कोई जरूरत नहीं होगी क्योंकि इससे पहले ही ममता की सरकार गिर जाएगी। कहने की जरूरत नहीं है कि केंद्र में भाजपा की सरकार है और वह बंगाल में सरकार बनाने की हर संभव कोशिश कर रही है उसके लिए हो क्या रहा है। उस समझने के लिए जिस खबर पर विचार करना चाहिए वह आज है तो सभी अखबारों में पर यह संदर्भ महत्वपूर्ण है। 

खबर यह है कि बंगाल में शिक्षकों की नियुक्ति में भ्रष्टाचार का एक मामला है। कलकत्ता हाईकोर्ट के जज न्यायमूर्ति, अभिजीत गंगोपाध्याय ने ‘एबीपी आनंदा’ को एक इंटरव्यू में तृणमूल कांग्रेस के नेता अभिषेक बनर्जी पर तीखी टिप्पणी की थी। विवाद इसीपर है और आज की खबर भी इसी से संबंधित है। इससे पहले बता दूं कि जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय ने ही पश्चिम बंगाल के कथित शिक्षक भर्ती घोटाले में सीबीआई जांच का आदेश दिया था, जिसके बाद टीएमसी के कई दिग्गज नेताओं की गिरफ्तारी हुई थी। इस मामले में पहली हाई प्रोफाइल गिरफ्तारी टीएमसी नेता और तत्कालीन मंत्री पार्था चटर्जी की हुई थी। चटर्जी के घर से बड़े पैमाने पर नकद बरामद हुआ था और कहा गया कि उनकी 100 करोड़ रुपए से ज्यादा की चल और अचल संपत्तियां हैं। चटर्जी की गिरफ्तारी के ठीक बाद पश्चिम बंगाल के शिक्षा विभाग के कई अफसरों की गिरफ्तारी हुई। इनमें टीएमसी के करीबी लोग भी शामिल हैं। संक्षेप में कहा जाए तो जज साब ने टीएमसी नेता से अपनी नाराजगी जाहिर की थी और उनके प्रति अपनी नापसंदगी जताई थी।

इसपर टीएमसी नेता ने सुप्रीम कोर्ट में शिकायत की। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, “मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि जो मामले लंबित हैं, उन पर इं​टरव्यू देना जजों का काम नहीं है।“ याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि जस्टिस गंगोपाध्याय ने पिछले साल सितंबर में ‘एबीपी आनंदा’ को एक इं​टरव्यू दिया था और उनके प्रति अपनी ‘नापसंदगी’ जाहिर की थी। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए सीजेआई ने कहा कि अगर उन्होंने वास्तव में इं​टरव्यू दिया है तो एक नए जज को मामले पर विचार करना चाहिए। इसके बाद कलकत्ता हाईकोर्ट के जज, जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल को निर्देश दिया कि वह आधी रात तक उन्हें उनके द्वारा मीडिया में दिए गए साक्षात्कार की ट्रांसक्रिप्ट कॉपी उपलब्ध कराएं, जिसे सुप्रीमकोर्ट के समक्ष रखा गया था। इसके बाद चीफ जस्टिस ऑफ इंड‌िया के नेतृत्व वाली बेंच ने कलकत्ता हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस को राज्य में प्राथमिक शिक्षक भर्ती घोटाले (जिसकी सुनवाई वर्तमान में जस्टिस गंगोपाध्याय के कोर्ट में सुनवाई हो रही है) से संबंधित मामले को किसी और जज को सौंपने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक अभूतपूर्व सुनवाई में कलकत्‍ता हाई कोर्ट के फैसले पर स्‍थायी रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘न्यायिक अनुशासनहीनता’ कहा है। 

यह खबर आज इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर है और इसका शीर्षक है, “बंगाल का शिक्षक भर्ती घोटाला (फ्लैग शीर्षक), मामला उनसे ले लिया गया, कलकत्ता हाईकोर्ट के जज ने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट जुग जुग जियो’।” दूसरी ओर, केंद्र की भजपा सरकार के संरक्षण में या सरकार के करीबी लोगों के अपराध के जो मामले सामने आ रहे हैं उनसे पता चलता है कि आम अपराधियों को तो छोड़िये पीएमओ में पहुंच रखने वालों पर नजर नहीं रखी जा रही है, उन्हें कुछ भी करने की छूट है या ऐसे लोग भी बेदाग नहीं हैं। एक से ज्यादा अपराध करने के बाद पकड़े जा रहे हैं। आप इसे जैसे चाहें वैसे देखिये पर यह सामान्य नहीं है और इंडियन एक्सप्रेस की आज की खबर बताती है कि गिरफ्तार संजय राय ने जम्मू और कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा को 25 लाख रुपये उधार दिये थे। ठीक है कि इस लेन-देन में कोई गड़बड़ी नहीं है पर इससे गिरफ्तार व्यक्ति से करीबी का पता तो चलता ही है और दूसरी तरफ यौन शोषण के आरोपी सांसद के खिलाफ एफआईआर के लिए सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ता है। और यह कोई पहला मामला नहीं है। बलात्कार के एक आरोपी विधायक के खिलाफ कार्रवाई कैसे हुई, सबको पता है। पूर्व गृह राज्य मंत्री चिन्मयानंद तो वीडियो सार्वजनिक होने के बाद भी बच गये।  

इससे पहले एक डिजाइनर का पैसा मार लेने के मामले में गिरफ्तार सरकार के करीबी और समर्थक टेलीविजन एंकर को एक हफ्ते में सुप्रीम कोर्ट से राहत मिल गई थी और ऐसी कोई खबर तो नहीं ही है कि उसके पैसे दिलवा दिये गए या उसकी मांग या आरोप गलत अथवा झूठे थे। कुल मिलाकर, सरकार के करीबी लोगों की लूट-खसोट और सत्ता के दुरुपयोग के मामले आम हैं और यह तब है जब अखबारों में खबरें आम तौर पर नहीं छपती हैं। मुंबई की एक डिजाइनर द्वारा पूर्व मुख्य मंत्री देवेन्द्र फडणवीस की पत्नी को गहने और कपड़े देने तथा उसे वापस नहीं देने और मांगने पर उसे ही गिरफ्तार कर लिए जाने का भी मामला है और जाहिर है, हर कोई सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं प्राप्त कर सकता है और ना सुप्रीम कोर्ट ऐसा कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट अगर सरकार का काम करने लगे तो सरकार क्या करेगी? पर हो वही रहा है और आज की खबरों से सुप्रीम कोर्ट पर अदृश्य दवाब (या टकराव) का जो मामला लग रहा है वह महत्वपूर्ण है। 

इन सब बातों की चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इससे पहले उस समय के मुख्य न्याधीश रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा था तो वे उतने निश्चित नहीं हो सकते थे जितने कुश्ती फेडरेशन के पूर्व अध्यक्ष नजर आ रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि ब्रजभूषण सिंह का जो बचाव हुआ वैसा सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का कौन करता लेकिन मामला क्या था, कैसे आया और कैसे खत्म हुआ तथा क्यों शिकायतकर्ता को नौकरी से निकाला गया और फिर क्यों रख लिया गया – यह सब अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ। उनके फैसले अपनी जगह और बाद में उन्हें राज्य सभा में मनोनीत कर दिया जाना जो कहता-बताता है वह सब है ही। फिर भी, भविष्य में ऐसा न हो, हो तो पारदर्शिता रहे इसके लिए कुछ किया गया हो ऐसी सूचना भी नहीं है। और अभी वह मुद्दा भी नहीं है। आज का मुद्दा है, कोलकाता हाईकोर्ट के न्यायाधीश का। और इसी संदर्भ में हिंसा के कुछ मामले की जांच का। 

कांग्रेस सत्ता में आई तो दंगा होगा 

आगे उसकी चर्चा से पहले बता दूं कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक चुनावी सभा में कहा है कि अगर कर्नाटक में कांग्रेस सत्ता में आई तो राज्य में परिवारवाद की राजनीति चरम पर होगी और वह “दंगों की चपेट में रहेगा।“ द प्रिंट की एक खबर के अनुसार, कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा है, “यह खुलेआम धमकाने वाला बयान है। भारत के पहले गृह मंत्री (सरदार बल्लभ भाई पटेल) ने जिस संगठन को प्रतिबंधित किया था, उससे संबंध रखने वाले मौजूदा केंद्रीय गृह मंत्री चुनाव प्रचार के दौरान धमकियां दे रहे हैं क्योंकि उन्हें अपनी हार निश्चित नजर आ रही है।“ उन्होंने एक अन्य ट्वीट में कहा है, “यह स्पष्ट है कि भाजपा चुनाव हार रही है। कांग्रेस नेतृत्व के चुनाव प्रचार को लेकर जनता की प्रतिक्रिया शानदार रही है। यही बात अमित शाह की चार-आई : इन्सल्ट, इनफ्लेम, इन्साइट एंड इन्टीमिडेट (अपमानित करना, भड़काना, उकसाना और धमकाना) की रणनीति का प्रमाण है।“

दंगे की जांच पर भाजपा नेताओं की अपील 

वैसे तो ऐसे कई उदाहरण हैं लेकिन इन उदाहरणों से अनुमान लगता है कि सत्ता में कौन लोग हैं और वे कैसे काम कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट पर सरकारी दबाव और सरकारी वकीलों की दलीलें तथा मुकदमे भी इसका कुछ अंदाजा देते हैं और भाजपा की दंगा कराने की राजनीति न नई है ना छिपी हुई है। इसलिए, जब गृहमंत्री खुले आम कह रहे हैं और कार्रवाई नहीं हो रही है तो यह समझना और याद रखना जरूरी है कि देश में जो दंगे हुए हैं, क्यों हुए हैं से लेकर अभियुक्तों के खिलाफ कार्रवाई तक के मामले और जांच अगर हुई है तो रिपोर्ट में भाजपा नेताओं के नाम आते रहे हैं। कई नेता दंगे में शामिल होने के आरोप के बाद तरक्की भी पाते रहे हैं। अभी बात अदालती फैसले (दरअसल उसके उपयोग की) हो रही है तो पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा का उल्लेख करना सही रहेगा। खबर है कि उसके एक आरोपी को बिहार से पकड़ा गया और भाजपा नेताओं से उसके संबंध हैं। तृणमूल नेताओं से भी उसके संबंध के आरोप हैं लेकिन मामले की जांच बंगाल पुलिस न करें यह मुद्दा क्यों है? हर मामले की जांच सीबीआई नहीं कर सकती है और इन दिनों जब सीबीआई पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में है तो उससे जांच की मांग का मतलब समझना मुश्किल नहीं है।   

कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले 

कलकत्ता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में रामनवमी के दौरान हुई हिंसा को लेकर एनआईए से मामले की जांच कराने का आदेश दिया है। एबीपी लाइव की खबर के अनुसार, एक्टिंग चीफ जस्टिस की खंडपीठ ने राज्य पुलिस को दो हफ्ते के अंदर जांच से संबंधित सभी जरूरी दस्तावेज, एफआईआर और सीसीटीवी फुटेज एनआईए को सौंपने का आदेश दिया है। भाजपा विधायक शुभेंदु अधिकारी ने एक जनहित याचिका दायर कर पश्चिम बंगाल में रामनवमी पर हुई हिंसा की एनआईए जांच की मांग की थी। केंद्र सरकार से एनओसी मिलने के बाद एनआईए मामले की जांच शुरू करेगी। आप समझ सकते हैं कि चल रही जांच एक तरह से रोक दी गई है और अगर जांच होगी तो वह एजेंसी करेगी जो केंद्र सरकार यानी भाजपा और गृहमंत्री के रूप में अमित शाह के नियंत्रण में है। इसी खबर में बताया गया है कि हाई कोर्ट का यह आदेश राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में अनुमति के बावजूद रामनवमी के जुलूस पर बदमाशों के हमले का आरोप लगाने वाली एक शिकायत का संज्ञान लेने के बाद आया है। 

खबर का यह तथ्य इसलिए महत्वपूर्ण है कि एनएचआरसी के अध्यक्ष की नियुक्त्ति की कहानी से भी भाजपा जुड़ी हुई है और रामनवमी पर जुलूस निकालने की ‘अनुमति’ उसी ने दी थी। अगर रामनवमी पर जुलूस नहीं निकलता तो भाजपा मजबूत कैसे होती? वैसे भी इस तरह की अनुमति स्थानीय प्रशासन से ली जानी चाहिए या मानवाधिकार आयोग से। मानवाधिकार आयोग वही है जिसने पहलवानों के मामले में संज्ञान नहीं लिया। या लिया तो भी सुप्रीम कोर्ट को सक्रिय होना पड़ा। इससे पहले पश्चिम बंगाल के बीरभूम में भी हिन्सा हुई थी। लाइव हिन्दुस्तान की 25 मार्च 2022 की एक खबर के अनुसार, कलकत्ता हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि बीरभूम में हुई हिंसा की सीबीआई जांच होगी। अदालत ने कहा कि सबूतों और घटना के प्रभाव से संकेत मिलता है कि राज्य पुलिस मामले की जांच नहीं कर सकती है। बीरभूम में 22 मार्च को घरों में आग लगने से आठ लोगों की मौत हो गई थी। यह घटना एक टीएमसी नेता की मौत के बाद हुई थी। मरने वालों में तीन महिलाएं और दो बच्चे भी शामिल हैं। मृतकों में नवविवाहित जोड़ा लिली खातून और काजी साजिदुर भी हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कहा गया है कि पीड़ितों को जिंदा जलाने से पहले पीटा गया था। 

सीबीआई को जांच के दौरान पता चला कि यह वारदात दो गुटों में चल रही पुरानी रंजिश के चलते हुई थी। आजतक की खबर के अनुसार, बीरभूम हिंसा में कोलकाता हाईकोर्ट ने भी स्वत: संज्ञान लेते हुए सुनवाई की थी। हाईकोर्ट ने पहले खुद सीबीआई जांच की मांग को नकार दिया था और कहा था जांच का पहला मौका राज्य को दिया जाना चाहिए। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज की अध्यक्षता में एसआईटी बनाकर या फिर सीबीआई से जांच कराने की मांग की गई है।  यह याचिका हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने दाखिल की थी।  इन तथ्यों के संदर्भ में यह भी गौर करने लायक है कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बिहार में कहा था, हमारी सरकार बनाएं, दंगाइयों को उल्टा लटका कर सीधा करेंगे। गृहमंत्री ने कर्नाटक के बारे में जो कहा है वह पहले बता चुका हूं और उनकी रणनीति, योजना या कार्यशैली का अनुमान पश्चिम बंगाल के मामलों से भी होता है।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

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