इंडिया, घमंडिया और भारत-व्हाट्सऐप्प विश्वविद्यालय की तैयारियाँ

 

भक्तों ने प्रचार सामग्री को ऐसे प्रचारित और प्रसारित किया

इंडिया वालों की जानकारी के लिए अमिट छाप छोड़ने का तरीका, देखिये-जानिये-समझिये

 

जी-20 सम्मेलन के पहले दिन, शनिवार, 10 सितंबर को दो खास या चौंकाने वाली बातें हुईं। पहली तो यह कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का परिचय अंग्रेजी में इंडिया के प्रधानमंत्री के रूप में नहीं, अंग्रेजी में भारत के प्राइम मिनिस्टर के रूप में दिख रहा था। देश-विदेश में रहने वाले कई लोगों को यह अटपटा या नया लगा और अपने स्तर पर लोगों ने इस बारे में पूछताछ की। यही नहीं, व्हाट्सऐप्प पर 55 पन्ने की एक ग्लॉसी पत्रिका कई बार, कई लोगों कई ग्रुप में यह बताते हुए भेजी कि सम्मेलन स्थल पर बंट रहा था। कुछ लोग इसकी पुष्टि भी करना चाहते थे पर ज्यादातर लोग यह सूचना दे रहे थे और पुस्तिका का प्रचार कर रहे थे। मैग्निफिशियंट भारत बाई कोरोनेशन के नाम की इस पत्रिका की पीडीएफ फाइल मेरे पास है पर यह वह नहीं है जो कल बंटी है। इसपर आने से पहले कुछ और बातें। और सबसे पहले यह कि आज उस ‘भारत’ पर कोई खबर नहीं है।  

व्हाट्सऐप्प और यूट्यूब पर वीडियो में भी ऐसा प्रचार जोर-शोर से चल रहा है और कहने वाले कह रहे हैं कि संसद का विशेष सत्र इसीलिए बुलाया गया है। कुछ शीर्षक हैं, एक देश एक चुनाव के लिए मोदी की तैयारी हो चुकी है, पीएम मोदी ने क्यों रातों रात इंडिया का नाम बदलकर भारत करने का फैसला किया, चुनाव सांस्कृतिक विरासत और गुलामी के प्रतीक के बीच है। प्रचार के लिए फैलाई गई पत्रिका को व्हाट्सऐप्प पर फॉर्वार्ड करते हुए एक मित्र ने लिखा था, “जी20 बैठक के दौरान भारत आने वाली हस्तियों के बीच बांटी जा रही पुस्तिका। हर किसी के लिए उपयुक्त उपहार जिससे हमारी पुरातन शिक्षा प्रणाली और भारत के मूल्यों को जाना जा सकता है।” ऐसे में आज के अखबारों में यही बताया जाना चाहिये था कि मोदी सरकार कैसे इस आयोजन का उपयोग अपने प्रचार के लिए कर रही है। 

आज के शीर्षकों में सबसे आम है, घोषणापत्र पर बड़ी जीत, नई दिल्ली लीडर्स समिट डिक्लरेशन पर बनी सहमति। आज की दूसरी बड़ी खबर चंद्रबाबू नायडू को गिरफ्तार कर लिये जाने की है। तेलुगू देशम पार्टी के प्रमुख को 371 करोड़ रुपए के कथित कौशल विकास घोटाले में गिरफ्तार किया गया है जबकि अडानी मामले में कुछ नहीं हो रहा है, उस अफसर की भी चर्चा नहीं है जिन्हें सेबी प्रमुख के रूप में कार्रवाई करनी थी और अब अडानी की नौकरी कर रहे हैं। यही नहीं एक केंद्रीय मंत्री की याद आती है जो कौशल विकास मंत्री रह चुके है और सासंद निधि से खरीदे गए कई एम्बुलेंस जब कोविड के समय नहीं चल रहे थे और उनके घर में ढंक कर रखे हुए मिले तो (पूर्व) मंत्री जी ने बताया था कि उनके पास ड्राइवर नहीं थे। वे अब मंत्री नहीं हैं पर कार्रवाई की खबर इस मामले में भी नहीं है। ना मंत्री जी की ओर से कोई प्रचार दिखा कि अब एम्बुलेंस चल रहे हैं और जनता खुश है।   

दुनिया भर के अखबार कह रहे हैं और देसी अखबारों से लग भी रहा है कि जी-20 सम्मेलन का उपयोग चुनावी नजरिये से किया जा रहा है। आप जानते हैं कि विपक्ष ने अपने गठजोड़ का नाम इंडिया रखा उसके बाद से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कैसे हैरान-परेशान हैं। भाजपा सरकार के ही शाइनिंग इंडिया को छोड़ भी दें तो मोदी सरकार भी स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया जैसे कई कार्यक्रम चलाये हैं। पर अचानक इंडिया नाम वाले घमंडिया हो गये और इसमें प्रधानमंत्री ने अपने समर्थकों के इंडिया टीवी चैनल और अन्य प्रचारकों का भी ख्याल नहीं रखा। दक्षिण अफ्रीका और ग्रीस के दौरे पर इंडिया के प्राइम मिनिस्टर भारत के हो चुके थे और जी-20 सम्मेलन में भोजन का निमंत्रण प्रेसिडेंट ऑफ भारत की ओर से था। यह जानकारी भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने ट्वीट कर दी थी। शुरू में लग रहा था कि यह सब हेडलाइन मैनेजमेंट का हिस्सा है क्योंकि संसद का एक विशेष सत्र भी बुलाया गया जिसका एजंडा नहीं बताया गया है। 

यह सब गोदी मीडिया के लिए मसाला और सुर्खियां हो सकती हैं पर अब यह अधिकृत है और सरकार की ओर से विदेशी मेहमानों को भी बता दिया गया है। हिन्दुस्तान टाइम्स में आज पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर छपी चार कॉलम की एक खबर का फ्लैग शीर्षक है, राजनीतिक चर्चा के बीच। इसका मुख्य शीर्षक है, मोदी की मेज पर इंडिया की जगह भारत ने लोगों को चौंकाया तो जी-20 के अतिथियों की पत्रिका ने नाम स्पष्ट किया। यह अलग बात है कि इसमें भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को 10 साल और भारत को भारत बनने या होने में 70 साल लग गये। अभी मुद्दा इतना ही है कि सरकार ने अपने स्तर पर अचानक इंडिया को भारत कहने का फैसला कर लिया है और शुरुआत हो चुकी है। खबर के अनुसार 24 पन्ने की एक ग्लॉसी पत्रिका, “भारत द मदर ऑफ डेमोक्रेसी” बांटी गई है और यह जी20 सम्मेलन स्थल के इंटरनेशनल मीडिया सेंटर स्थित बुक रैक से तेजी से गायब हो रही है। 

पत्रिका के दूसरे पन्ने पर इसके शीर्षक को इस प्रकार स्पष्ट किया गया है, “भारत देश का आधिकारिक नाम है। यह संविधान में उल्लिखित है और संविधान को स्वीकार किये जाने से पहले 1946-48 की चर्चा में भी इसका जिक्र है।” कहने की जरूरत नहीं है कि सम्मेलन स्थल पर जो पत्रिका बंटी और व्हाट्सऐप्प पर जो फैलाई गई वे अलग-अलग पुस्तिकाएं हैं। व्हाट्सऐप्प विश्वविद्यालय का अपना मकसद है और जो बंटा उसके नाम पर प्रचारकों ने कुछ और फैला दिया। आम लोगों को इस बात की जानकारी नहीं होगी और वे नाम बदलने का कारण वही मानेंगे जो व्हाट्सऐप्प पर फैलाया गया है। अधिकृत कारण (अगर कुछ है भी) तो वह विदेशी और कुछ खास देसी पत्रकारों को मिला होगा। और वह भी अंग्रेजी में। व्हाट्सऐप्प पर फैलाए गये दस्तावेज में लेखक, प्रकाशक या मुद्रक का भी नाम नहीं है भारत सरकार से कोई संबंध नहीं दिखता। ऐसे में कुछ लोगों ने व्हाट्सऐप्प पर पूछा था कि क्या यह भी बंटा हो सकता है।

मेरा यही मानना है कि जब मुद्रक के नाम के बिना पोस्टर नहीं लगाया जा सकता है तो लेखक या प्रकाशक के नाम के बिना भारत सरकार कोई भी दस्तावेज कैसे बंटवा सकती है। लेकिन भक्तों को यह सब कहां समझ में आता है। एक भक्तन ने इसपर भेजने वाले से कहा था, “भेजने के लिए शुक्रिया। मोदी जी और उनकी टीम के महान प्रयास।“ इसपर मैंने उनसे पुष्टि करनी चाही, मोदी जी का है? कहीं लिखा नहीं दिखा जबकि नियम है कि लिखा होना चाहिए। पिछले दिनों दिल्ली पुलिस ने पोस्टर छापने वालों के खिलाफ कार्रवाई की थी क्योंकि उसपर छापने वाले प्रेस का नाम नहीं लिखा था।  

भक्तन ने कहा, “मैं भी राजनीतिज्ञों के बारे में बहुत कुछ सुनते और देखते हुए बड़ी हुई हूं। कई कारणों से मेरे लिये हमेशा हर हर मोदी जी है। यही नहीं, भारत की एक नागरिक के रूप में मैं अपने प्रधानमंत्री के कार्य से संतुष्ट और गौरवान्वित हूं।” हिन्दी में सवाल पहले बता चुका हूं, उसपर यह टिप्पणी (जवाब तो नहीं ही है) अंग्रेजी में है। इसलिए अनपढ़ भी नहीं कह सकता, केंद्रीय मंत्री होने लायक अंग्रेजी तो आती ही है। जो भी हो, ऐसे लोगों के रहते इस बात का क्या मतलब की तीन दिन छुट्टी कर दिये जाने से दिहाड़ी मजदूरों का क्या होगा। बदले में दिल्ली के कार वाले निवासियों को डॉक्टर के पास जाना है, मरीज देखने अस्पताल जाना है जैसे कारण बताने पर छूट नहीं दी गई।  वोटर इसी को काम समझते हैं।  

पत्रिका बांटने और उसके नाम पर दूसरी पत्रिका का प्रचार करने की राजनीति समझने की कोशिश में मैंने पहले तो बांटी गई पत्रिका का नाम गूगल किया। तो  एक पोर्टल का पता चला। यह जीओवी डॉट आईएन का पोर्टल नहीं है जबकि आरटीआई से मुक्त, गैर सरकारी घोषित, पीएम केयर्स जीओवी डॉट आईएन पर है। मोटे तौर पर यह किसी आईएएस स्टडी सेंटर का है। यहां बताया गया है कि इसे जी20 एक्जीबिशन में लांच किया गया है। लिंक सी दिखने वाली यह सूचना द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर पर ले जाती है। परवेज सुलतान, एक्सप्रेस न्यूज सर्विस की यह खबर बताती है कि संस्कृति मंत्रालय ने यह पोर्टल लांच किया है। 

आईएएस स्टडी सेंटर की सूचना के अनुसार यह वेबसाइट  इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर दि आर्ट्स (आईजीएनसीए) ने तैयार किया है। डॉट कॉम वाले इस पोर्टल पर अंग्रेजी में गवरन्मेंट ऑफ इंडिया लिखा है और हिन्दी में सत्यमेंव जयते के साथ अशोक की लाट लगी है। कई देसी विदेशी भाषाओं में से हिन्दी सेक्शन खोलने पर भी अंग्रेजी-हिन्दी का हिस्सा यथावत रहा। दूसरी पुस्तिका का नाम गूगल करने पर अमैजन का एक लिंक खुल रहा है जो कृष्ण नेहा अग्रवाल की ई पुस्तिका खरीदने का लिंक है। पुस्तिका 100 रुपए की बताई जा रही है और रविवार, 10 सितंबर 2023 को दिन में 11:44 पर इसमें दो ही समीक्षाएं हैं। लिंक खोलने पर पता चला कि यह दूसरे भाग का है। कल जो पीडीएफ घूम रहा था वह पहला भाग है। दूसरा 69 पेज का है, 8 अगस्त 2021 को प्रकाशित हुआ था। यह किन्ही कृष्णा अग्रवाल की याद में उनकी बेटी कृष्णा नेहा अग्रवाल की कृति है। दूसरी साइट, मैग्निफिशियंट भारत पीडीएफ, आर्काइव डॉट ऑर्ग की है यही वह पीडीएफ है जो कल व्हाट्सऐप्प पर घूम रही थी।   

इस बीच, जयराम रमेश ने कहा है, जी20 का नारा है एक धरती एक परिवार। हालांकि, प्रधानमंत्री असल में एक व्यक्ति, एक सरकार और एक कारोबारी समूह में विश्वास करते लगते हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री तानाशाह नहीं हो सकता है और वह मंत्रिपरिषद की सलाह से काम करता है। 2014 में प्रधानमंत्री ने नवाज शरीफ को निमंत्रण अपने ही स्तर पर दिया होगा और अब तो भक्तगण ही बता रहे हैं कि प्रधानमंत्री ने नाम भी बदल दिया। मुझे तभी से नरेन्द्र मोदी में तानाशाही प्रवृत्ति दिखाई देती है जो दिनों दिन मजबूत और स्पष्ट होती जा रही है। हम भारतीयों द्वारा तानाशाही को पसंद किये जाने का उदाहरण पूर्व विदेश सचिव जे.एन दीक्षित ने अपनी पुस्तक, “एनाटोमी ऑफ फ्लॉड इनहेरीटेंस“ (कोणार्क – 1995) में किया था। इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद मैंने किया था जो हिन्द पाक रिश्ते 1970-1994 के नाम से प्रकाशित हुआ था। इसमें जेएन दीक्षित ने एक घटना का वर्णन किया था जब पाकिस्तानी तानाशाह जियाउल हक ने भारतीय पत्रकारों को घूमने के लिए सेना का विमान दे दिया। इसपर उन्होंने कहा था कि भारतीय पत्रकार यह नहीं समझें कि पाकिस्तान में यह काम कितनी आसानी से हो गया और भारत में तो (उस समय तक) हो ही नहीं सकता है। श्री दीक्षित ने कहा था कि तानाशाही और लोकतंत्र का यही अंतर है। 

लोकतंत्र की कीमत 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहते रहे हैं कि 70 साल में कुछ नहीं हुआ पर भारत पाकिस्तान संबंध ठीक करने के लिए जो कोशिशें हुईं उसका बड़ा हिस्सा इस किताब में भी है। और भाजपा राज में जो हुआ वह सब अलग मुद्दा है। पुस्तक का संबंधित अंश इस प्रकार है : “…. यह मुलाकात प्रतिनिधिमंडल के बहुत वरिष्ठ सदस्यों के लिए ही थी। यहां तक कि एक्सटर्नल पब्लिसिटी के संयुक्त सचिव, मैं खुद और पाकिस्तान में हमारे मिशन के उप प्रमुख एसके लांबा भी कमरे में नहीं गए। …. हमलोग (पीवी नरसिंह) राव के साथ गए ढेरों भारतीय पत्रकारों के साथ बैठे हुए थे। उनमें से कुछ लोग कह रहे थे कि लाहौर और कराची के औपचारिक समारोहों में शामिल होने की उनकी कोई इच्छा नहीं है। बल्कि पाकिस्तान सरकार आवश्यक व्यवस्था कर दे तो वे पाकिस्तान के कुछ दूसरे हिस्से देखना चाहेंगे। उन लोगों ने यह बात मेरे सहयोगी से कही। उन्होंने कहा कि इस बारे में। पाकिस्तानी अधिकारियों से बात करनी पड़ेगी और इसमें समय लग सकता है। इस बीच राष्ट्रपति जिया के चीफ ऑफ स्टाफ जनरल आरिफ बैठक वाले कमरे से थोड़ी देर के लिए बाहर आए। हमारे यहां के पत्रकारों ने उन्हें घेर लिया और उनसे पूछा कि वे लोग पाकिस्तान घूम सकते थे कि नहीं। जनरल आरिफ एक सौम्य व्यक्ति हैं, उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति और मुख्य मार्शल लॉ प्रशासक राजी हो जाएं तो कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।

इसके बाद लगभग आधे घंटे में राव और जिया की बैठक खत्म हो गई। जिया को उनके शिष्टाचार के लिए जाना जाता था। वे राव को विदा करने के लिए बाहरी दरवाजे तक आए। भारतीय पत्रकारों ने उन्हें वहां घेर लिया और राव से हुई बातचीत के बारे में सवाल पूछने के बाद उन लोगों ने पाकिस्तान के दूसरे हिस्से की यात्रा का आग्रह किया। जिया अपने एडीसी में से एक और जनरल आरिफ की ओर मुड़े तथा कहा, ‘हम लोगों को अपने भारतीय मित्रों को जितना ज्यादा संभव हो पाकिस्तान देखने की इजाजत देनी चाहिए। कृपया इन्हें एक विशेष विमान दे दें ताकि वे पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों की यात्रा कर सके और राव के साथ वापस दिल्ली जाने के लिए समय पर विशेष उड़ान पकड़ सकें।” जिया अपने कमरे में वापस चले गए तो भारतीय पत्रकार मेरी ओर मुखातिब हुए या मुझे कहना चाहिए कि मुझे उकसा दिया। उन लोगों ने कहा, ‘जनसंपर्क ऐसे बनाकर रखा जाता है। अगर भारत में, पाकिस्तानी या अन्य पत्रकारों ने ऐसा आग्रह किया होता तो जिया ने जो सकारात्मक जवाब दिया उसकी बजाय भारतीय राजनैतिक नेतृत्व या नौकरशाही ने ढेरों प्रक्रियागत मुश्किलें बताई होती। बेशक, पत्रकारों को विशेष विमान देने का कोई सवाल नहीं था। मैंने अपने भारतीय पत्रकार मित्रों से कहा कि लोकतंत्र के लिए उन्हें यही कीमत चुकानी पड़ती है।”

कहने की जरूरत नहीं है कि जनता यह कीमत चुकाने के लिए तैयार नहीं होगी तो सरकारें कुछ नहीं कर सकती हैं। पहले वाली सरकार तो कोशिश भी करती थी ये वाली तो जो साथ थे उसी के सहारे मनमानी पर उतारू है। जो लाभ प्राप्त कर रहे हैं उनकी बात अलग है पर जो मुश्किल में होने के बावजूद नहीं समझ रहे या बिना कुछ पाये ही सिर्फ सख्ती से फिदा हैं तो उनका कुछ हो नहीं सकता। उपरोक्त उदाहरण के आधार पर कह सकता हूं कि संघ परिवार के नेतृत्व और भाजपा राज में भारत भी पाकिस्तान की तरह तानशाही की ओर बढ़ता लग रहा है। 

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

 

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