जेम्स माइकल लिंगदोह से बराक हुसैन ओबामा तक- बीजेपी का हेडलाइन मैनेजमेंट!

आज अमर उजाला में पहले पन्ने पर छोटी सी एक खबर दो कॉलम के शीर्षक से छपी है, “ओबामा याद रखें …. उन्होंने कितने मुस्लिमों पर हमला किया”। खबर इस प्रकार है, “राजनाथ सिंह ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा पर भी निशाना साधा। कहा, याद करना चाहिए कि अपने कार्यकाल में उन्होंने कितने मुस्लिम बहुत देशों पर हमला किया था ….।” इसके साथ एक और छोटी खबर है, “अमेरिका से भी मिली ओबामा को नसीहत”। 

आप जानते हैं कि दो गलतियां एक सही नहीं बनाती हैं। अगर ओबामा ने गलती की है तो इसका मतलब यह नहीं है कि वे भारत के बारे में न बोलें। अनुभव से बोल रहे हों तो उसका सम्मान ही होना चाहिए। हालांकि, ओबामा का मुस्लिम बहुल देशों पर हमला और भारत की राजनीति में बहुत अंतर है और वह अलग विषय है। आज राजनाथ सिंह ने अगर पीओके (पाक अधिकृत कश्मीर) को याद किया है तो वह उनकी राजनीति है और इसीलिए अमर उजाला में सेकेंड लीड या टॉप पर खबर है। यह खबर इंडियन एक्सप्रेस में भी है। शीर्षक है, “राजनाथ ने कहा, पीओके को वापस लेने के लिए हमें बहुत कुछ करने की जरूरत नहीं है।” 

तथ्य यह है कि इसके बवजूद पहले की सरकारों ने कोई साठ साल और मोदी सरकार ने 10 साल कुछ नहीं किया। अब चुनाव के समय बोल रहे हैं। मकसद समझना मुश्किल नहीं है लेकिन उस पर फिर कभी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अमेरिका यात्रा से पहले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सीएनएन को दिए एक इंटरव्‍यू में कहा था, “अगर भारत अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा नहीं करता तो इस बात की प्रबल आशंका है कि एक समय आएगा जब देश बिखरने लगेगा।” इसके खिलाफ भाजपा और भारत सरकार की धुआंधार बल्लेबाजी हो रही है और आज इसी के कुछ खास हिस्सों की चर्चा करता हूं। 

आप जानते हैं कि सरकार की आलोचना के लिए विपक्षी नेताओं के खिलाफ असम में एफआईआर और कार्रवाई होती रही हैं। पिछले साल गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवाणी और फरवरी में कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को फ्लाइट से उतारना और गिरफ्तार करना उल्लेखनीय है। ऐसे में सोशल मीडिया पर सवाल उठा, “क्या असम पुलिस भारत में अल्पसंख्यकों की कथित असुरक्षा पर टिप्पणी के लिए पूर्व अमेरिकी प्रेसिडेंट बराक ओबामा को गिरफ्तार करेगी।” मुझे लगता है कि इसका भाव यह रहा होगा कि राजधर्म निभाने की बजाय कितने लोगों का मुंह बंद करने की कोशिश की जाएगी? 

जवाब में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा ने ट्वीटर पर लिखा, “भारत में ही कई हुसैन ओबामा हैं। वाशिंगटन जाने के बारे में विचार करने से पहले हमें उन पर गौर करने को प्राथमिकता देनी चाहिए। असम पुलिस अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर कार्रवाई करेगी।” मुसलमानों (और दूसरे सभी धर्मों) के प्रति भारत सरकार और भाजपा नेताओं का व्यवहार और विचार हम जानते हैं। मणिपुर का मामला इसका उदाहरण है जहां कोई दो महीने हिंसा चली 250 से ज्यादा चर्च जला दिये गये और अब प्रधानमंत्री ने हालात की जानकारी ली – तो नवोदय टाइम्स और हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड खबर बन गई। इंडियन एक्सप्रेस ने भी प्रमुखता से छापा है। 

तथ्य यह भी है कि अगस्त 2002 में वड़ोदरा में एक रैली में बोलते हुए नरेन्द्र मोदी लगातार चुनाव आयोग पर निशाना साध रहे थे। पूरा मामला समझने के लिए पुरानी खबर देखें। एक जगह मोदी बोलते हैं, “एक पत्रकार ने हाल में मुझसे पूछा, क्या जेम्स माइकल लिंगदोह इटली से आए हैं।” मैंने कहा, “मेरे पास उनकी जन्मकुंडली नहीं है। मुझे राजीव गांधी से पूछना पड़ेगा।” इसके आगे मोदी कहते हैं, “पत्रकार ये भी पूछ रहे थे कि क्या वे (सोनिया गांधी और लिंगदोह) चर्च में मिलते हैं।” मैंने जवाब दिया, “शायद मिलते हों” (द लल्लनटॉप की एक खबर से) पूरा मामला कितना हल्का है इसे अब समझाना जरा मुश्किल है फिर भी अंदाजा तो लगेगा ही। 

वही नरेन्द्र मोदी दस साल से भारत के प्रधानमंत्री हैं। मीडिया उनकी चरणों में बिछा हुआ है और वे नेहरू परिवार से लेकर इमरजेंसी तक को कोसते हैं। हाल में वे अमेरिका की राजकीय यात्रा पर थे। वहां से प्रधानमंत्री मिस्त्र गये और वहां की मस्जिदों में भी गए। वैसे तो यह सामान्य बात है लेकिन नरेन्द्र मोदी का मामला थोड़ा अलग है। इसलिए इन दिनों इसकी चर्चा हो रही है और भारत सरकार हेडलाइन मैनेजमेंट में लगी हुई है। वैसे तो इसमें कुछ गलत नहीं है पर ओबामा ने जो कहा या आरोप लगाया उसका जवाब देने की बजाय यह कहने का क्या मतलब है कि वे हुसैन हैं या मुसलमान हैं।  फिर भी कह रहे हैं और बताया जा रहा है कि खुद ओबामा भी मुसलमानों का नुकसान कर चुके हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि दोनों मामले एक नहीं हैं और अगर उन्होंने गलत किया तो हर कोई गलत नहीं कर सकता है और ना ही वे इस कारण बोल नहीं सकते हैं। 

दूसरी ओर, प्रधानमंत्री की दो सवाल वाली प्रेस कांफ्रेंस को भी यही रंग रूप देने की कोशिश की जा रही है। आप जानते हैं कि अमेरिका दौरे पर यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस थी और उन्होंने राष्ट्रपति जो बाइडेन के साथ प्रेस कांफ्रेंस की। व्हाइट हाउस ने इसे ‘बड़ी बात’ बताया। व्हाइट हाउस के राष्ट्रीय सुरक्षा प्रवक्ता जॉन किर्बी ने कहा कि हम आभारी हैं कि प्रधानमंत्री मोदी यात्रा के अंत में एक प्रेस कार्यक्रम में भाग ले रहे हैं। हमें लगता है कि यही महत्वपूर्ण है और हमें खुशी है कि वह सोचते हैं कि यह भी महत्वपूर्ण है।  

इसके बाद जो प्रेस कांफ्रेंस हुई और जो जवाब दिया गया वह अपने आप में महत्वपूर्ण और रिकार्ड है। हिन्दी में मुझे दोनों सवाल और उनका जवाब अलग से नहीं मिला। मीडिया मैनेजमेंट की दशा यह है कि (हिन्दी में) सवाल ढूंढ़ना मुश्किल हो रहा है पर प्रधानमंत्री का जवाब और पूछने वालों की ‘कुंडली’ सरेआम उपलब्ध है। द टेलीग्राफ ने 25 जून के अपने अंक में पहले पन्ने पर छपी एक खबर में बताया था कि ट्वीट रिपोर्टर के धर्म पर केंद्रित हैं और इसका मुख्य शीर्षक था, नोदी बता रहे हैं कि मोदी (जी) गलत क्यों हैं। बिना डेटलाइन के फिरोज एल विनसेन्ट के का यह आलेख में इस प्रकार है, “प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुरुवार को व्हाइट हाउस में सबरीना सिद्दीकी से कहा : 

भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों में, कोई भेदभाव नहीं है, बिल्कुल नहीं। न ही जाति, पंथ, या उम्र, या किसी भी अन्य किस्म के भौगोलिक आधार पर।” खुद को सिद्दीकी के ट्वीटर पन्ने पर उनका राजनीतिक सलाहकार बताने वाले ट्विटर उपयोगकर्ता मरेंद्र नोडी ने लिखा है, “आप वॉल स्ट्रीट जर्नल के एक रिपोर्टर के रूप में वहां थीं जो एक बिजनेस अखबार है। आप भारत की अर्थव्यवस्था, व्यापार” संबंध आदि पर सवाल पूछ सकती थीं। लेकिन नहीं। 

आपको हर जगह हर मुसलमान की तरह इसे अपने और अपनी पहचान के बारे में बताना था और एक ऐसा सवाल पूछना था जिसका जवाब मोदी को आधे-अधूरे जानने वालों को भी पता था कि वे कभी जवाब नहीं देंगे। आपने अपना मौका बर्बाद कर दिया और आप एक अक्षम पत्रकार हैं। यह आपके लेन करियर का उच्चतम बिंदु होगा।” लगभग समान ट्वीट कई ट्विटर हैंडल द्वारा दोहराए गए थे – एक ऐसा काम जिसे “टूलकिट” अभियान के रूप में जाना जाता है और आमतौर पर एक ही स्रोत द्वारा संचालित होता है। 

वाल स्ट्रीट जर्नल की व्हाइट हाउस पत्रकार सिद्दीकी द्वारा अल्पसंख्यकों के अधिकार के बारे में सवाल पूछे जाने के बाद 48 घंटे से भी कम समय में उन्हें वह सब खुद झेलना पड़ा जिसका सामना देश में कई अल्पसंख्यकों को झेलना पड़ा है जब उनकी कही कोई बात दक्षिणपंथी इको सिस्टम को पचने लायक नहीं लगती है। 

भारतीय नाम वाले कुछ सोशल मीडिया उपयोगकर्ता अगर सिद्दीकी की कथित जड़ों और उनके माता-पिता की राष्ट्रीयता को उजागर कर रहे हैं तो दूसरे उनके प्रश्न की प्रासंगिकता को कम करने के लिए उनके धर्म को रेखांकित करने में लगे हैं जबकि मोदी ने उसका जवाब ही नहीं दिया। दूसरी ओर, एक पत्रकार की जिम्मेदारियों का निर्वहन करते समय यह पूरी तरह बेमतलब है। जो लोग अपने जैसे लोगों के समझने के लिए शोर मचा रहे थे वे असल में अनजाने ही मोदी द्वारा भारत में किसी भी तरह के भेदभाव से इनकार करने के दावे को गलत साबित कर रहे थे। 

सिद्दीकी ने मोदी से पूछा था: “…आप और आपकी सरकार अपने देश में मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों के अधिकारों में सुधार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए क्या कदम उठाने जा रहे हैं?” मोदी ने इस बात से इनकार किया कि भारत में कोई भेदभाव है, लेकिन उनके सवाल का सीधा जवाब देने से बचते रहे। जल्दी ही, सिद्दीकी को ट्विटर पर “पाकिस्तानी” और इसलिए, “भारत विरोधी” बताया गया। यह अलग बात है कि कुछ भारतीय पत्रकारों ने सिद्दीक का समर्थन किया है और सिद्दीक ने भी अपना बचाव किया है। इसमें उन्हें फैक्ट चेकर मोहमम्द जुबैर का भी साथ मिला। 

जहां तक खबरों का सवाल है, द टेलीग्राफ ने एक खबर छापी है और वह है प्रधानमंत्री ने अमेरिका से लौट कर जानना चाहा कि देश में क्या हो रहा है (गोदी मीडिया के बिना सूचना कैसे मिलती)। वैसे, आज ज्यादातर अखबारों ने मणिपुर मामले में प्रधानमंत्री की दिलचस्पी को प्रमुखता दी है तो द हिन्दू ने बताया है कि मुख्य मंत्री ने क्या कहा। हालांकि वे भी यही कह रहे हैं कि केंद्र सुनिश्चित करेगा (और जो नहीं हुआ या हुआ वह केंद्र के कारण ही!)। राजनीतिक खबरों का आलम यह है कि 2024 के आम चुनाव और उससे पहले के विधानसभा चुनावों के लिए पाक अधिकृत कश्मीर को मुद्दा बनाने की कोशिश शुरू हो गई है। राजनाथ सिंह ने कहा है और अमर उजाला तथा इंडियन एक्सप्रेस ने लीड बनाया है। 

बहुत आम और रूटीन खबरों में यह है कि नई दिल्ली स्टेशन पर बिजली के खंबे में करंट आने से एक महिला की मौत हो गई और उसके बावजूद उस खंबे की तारें अगले दिन तक खुली हुई हैं। पहले अखबारों ने खबर नहीं छापी और फिर फॉलो अप भी नहीं किया। दोनों खबरें टाइम्स ऑफ इंडिया में दिखीं और अंदर के पन्नों की खबरों का हाल यह है कि दिल्ली पुलिस ने 34 साल के एक युवक को गुरुवार को गिरफ्तार किया। उसपर आरोप है कि उसने एक महिला की कान की बालियां छीन कर निगल ली हैं। लेकिन दो बार एक्स-रे और अल्ट्रा साउंड के बावजूद बालियां नजर नहीं आईं। उसे दवाइयां खिलाई गईं ताकि पेट से निकल आए पर वह भी नहीं हुआ। 

अभियुक्त कह रहा है कि उसने बालियां निगली नहीं बल्कि पकड़े जाने के डर से उसे फेंक दिया। पुलिस ने बालियां ढूंढ़ने के लिए टीम लगाई हुई है पर संभव है कोई उठा ले गया हो। गवाह हैं जो कह रहे हैं कि उसने छीना था निगला है। इसलिए पुलिस भी क्या करे। ब्रज भूषण सिंह पर नहीं चली तो कहीं चलनी चाहिए वरना उसकी जरूरत क्या रह जाएगी। हालांकि यह अलग मुद्दा है। पुलिस का कहना है कि अभियुक्त के खिलाफ आठ मामले हैं (तो कान की बाली निगलना कौन सी बड़ी बात है) और पुलिस की खोज यह भी है कि इस तरह सोना छीनने वाले अक्सर पीड़ित को बेवकूफ बनाने के लिए निगल लेने की ऐक्टिंग करते हैं र वहीं फेंक देते हैं जिसे उनका कोई सहयोगी उठा ले जाता है। इन तर्कों की तुलना बृज भूषण सिंह के मामले में एफआईआर और पुलिस के तर्कों से कीजिए बात बिल्कुल साफ हो जाएगी। वैसे भी इस अभियुक्त का नाम नसीर है। प्रयोग हो या संयोग तथ्य है। इंडियन एक्सप्रेस, 26 जून 2023 की खबर के आधार पर। 

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

 

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