लाइफ़ ऑफ़ एन आउटकास्ट: जाति के ज़हर में डूबे समाज को आईना दिखाने वाली फ़िल्म

 

हिंदी समाज जाति के ज़हर में डूबा हुआ है, लेकिन हिंदी का मुख्यधारा सिनेमा इस विषय को कभी-कभार बस लग्गी से छूता है। ऐसे में कोई नौजवान जनता से पैसा इकट्ठा करके दलित जीवन की दुर्दशा पर न सिर्फ़ फ़िल्म बनाए बल्कि मल्टीपेल्क्स के दुश्चक्र को धता बताते हुए देश के 500 गाँवों में प्रदर्शित करने की योजना भी बनाए, तो आश्चर्य होता है।

वाक़ई दो-तीन नाटक करके फ़िल्मी दुनिया की चकमक में कूद जाने वाले युवाओं की भीड़ में छपरा जैसे छोटे शहर से आये  पवन.के.श्रीवास्तव  का होना किसी आश्चर्य की तरह है। उनकी नई फ़िल्म ‘लाइफ़ ऑफ़ एन आउटकास्ट’ ऐसा ही एक प्रयोग है जिसकी स्पेशल स्क्रीनिंग 29 मई को दिल्ली के फ़िल्म डिवीज़न प्रेक्षागृह में हुई। हॉल खचाखच भरा था। फ़िल्म देखने के बाद वहाँ मौजूद दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने फ़िल्म की तारीफ़ करते हुए कहा कि शहरों को जातिवाद के ज़हर से मुक्त मानना ग़लत है। इस फ़िल्म को गाँवों के साथ-साथ दिल्ली जैसे शहरों में भी दिखाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि केंद्र ने सारी शक्तियाँ छीन ली हैं, वरना दिल्ली सरकार इस फ़िल्म को टैक्स फ़्री ज़रूर करती।

 

मनीष सिसोदिया के साथ लेखक-निर्देशक पवन.के.श्रीवास्तव

 

फ़िल्म की कहानी लखनऊ के पास एक गाँव से निष्कासित, करीब 50 साल के अधेड़ दलित की है जिसका बेटा बड़ी मुश्किलों से पढ़कर मास्टर बनता है लेकिन दबंग सवर्ण उसे साज़िश करके हवालात पहुँचा देते हैं क्योंकि वह ब्लैकबोर्ड में लिखने की शुरुआत ‘ओम’ लिखकर नहीं करता और बच्चों के बीच तर्क, विज्ञान और संविधान की बात करता है। फिल्म में कोई संगठित प्रतिवाद, विद्रोह या बदला न दिखाकर उस पीड़ा को उकेरने की कोशिश की गई है जिससे कोई दलित परिवार गुज़रता है जिसे व्यवस्था पर भरोसा है पर व्यवस्था पर काबिज़ लोगों की नज़र में उसकी हैसियत महज़ कीड़े-मकोड़े की होती है।

ज़ाहिर है, ऐसी फ़िल्मों के लिए पैसा जुटाना आसान नहीं होता। लेखक-निर्देशक पवन के.श्रीवास्तव ने बताया कि उन्होंने चार लाख रुपये क्राउड फंडिंग के ज़रिए जुटाया। पोस्ट प्रोडक्शन के लिए कई शहरों में फैले शुभचिंतक और नेशनल कन्वेंशन आफ दलित एंड आदिवासी राइट (NACDOR) जैसी संस्थाएँ आगे आईं। उन्होंने कहा कि 90 मिनट की इस फ़िल्म को दस भाषाओं में डब करके देश के 500 गाँवों में प्रदर्शित किया जाएगा।

 

 

पवन ने इसके पहले 2014 में पलायन की समस्या पर ‘नया पता’ फ़िल्म बनाई थी। आठ लाख रुपये में बनी ‘नया पता’ के लिए भी क्राउड फंडिंग का सहारा लिया गया था। फ़िलहाल, ‘लाइफ़ ऑफ़ एन आउटकास्ट’ को अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भेजने की तैयारी हो रही है। सेंसर से पास होने के बाद उसे गाँव-गाँव दिखाने का अभियान चलाया जाएगा।

 

 

बर्बरीक



 

First Published on:
Exit mobile version