#MeToo: बात निकली है तो दूर तलक जाएगी!

जितेन्‍द्र कुमार


अंततः यह खबर आज दिल्ली के महत्वपूर्ण अखबार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की लीड स्टोरी बन पाई (हांलाकि कल कोलकाता से निकलनेवाला अखबार ‘द टेलीग्राफ’ ने इसे लीड बनाया था, जबकि एम जे अकबर उस अखबार का संस्थापक संपादक रहा है )। यह सिलसिला हिम्मत, मजबूती और बहादुरी के साथ चलते रहना चाहिए। और इसके लिए महिलाएं जितना हिम्मत जुटा पा रही हैं वो बधाई की पात्र हैं। क्योंकि वे सभी जानती हैं कि भारतीय समाज में उन ‘ह्वेलो’ की औकात कितनी ज्यादा है और ये आवाज उठानेवाली महिलाएं कितनी ‘कमजोर’ हैं। यह यह सच्चाई नहीं होती तो जो सुषमा स्वराज हर बात पर प्रतिकार करती हैं, अपने एक जुनियर मंत्री के खिलाफ बार-बार पूछे जाने पर चूं नहीं कर पाई। क्योंकि वह जानती हैं कि मुंह खोलने की कीमत कितनी अधिक हो सकती है! वह यह भी जानती हैं कि एक बार मुंह खोलीं तो कितने ‘अपनों’ के खिलाफ भी मुंह खोलना पड़ सकता है! 

इतना होने के बावजूद मेरी सदइच्छा है कि अगर टेलीवीजन में पत्रकारिता करनेवाली महिलाएं भी मुंह खोलतीं तो टेलीवीजन इंडस्ट्री का भला होता और भविष्य में महिलाएं थोड़ा-बहुत बेखौफ होकर सहजता से काम कर पातीं। फिर भी, मुझे विश्वास है कि थोड़े दिनों में कोई न कोई वीरागंना आवाज उठाएगीं। लेकिन इससे भी ज्यादा विश्वास इस बात पर है कि वह आवाज आज की आवाज से कहीं अधिक मुखर होगी!

लेकिन जिस बात से मुझे सबसे ज्यादा निराशा है वह यह कि ब्यूरोक्रेसी के खिलाफ किसी ने कोई सवाल नहीं उठाया है। जबकि हकीकत हम जानते हैं कि वहां कितनी सड़ांध है। सार्वजनिक जानकारी में इस तरह का मामला सिर्फ और सिर्फ केपीएस गिल का था जब उसने एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रुपन देवल बजाज के साथ छेड़खानी की थी। यकीन मानिए, वह कुछ भी नहीं था! उससे कई-कई गुणा दुर्व्यवहार वहां महिलाओं के साथ प्रतिदिन वरिष्ठ अधिकारी अपने कनिष्ठ के साथ करते हैं। मेरी दिली ख्वाहिश है कि वहां से भी आवाज निकलनी चाहिए कि जो लोग पूरे देश को कानून-व्यवस्था और आचार-व्यवहार समझाते रहते हैं वे अपनी महिला सहयोगियों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं? 

वैसे कल इंदिरा जयसिंग ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में लिखे ‘अपने न्यायमूर्ति को जानें’ लेख में न्यायपालिका को लेकर टिप्पणी की है। इस लेख में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण बातों के अलावा यह भी कहा है कि हमें न्यायमूर्तियों को उनकी नियुक्ति से पहले जानने का अधिकार होना चाहिए। इंदिरा जयसिंग के अनुसार, “ क्योंकि वे तय करते हैं कि आप क्या खाएगें, आप क्या बोलेगें और क्या नहीं बोलेगें, आप किसके साथ सहवास कर सकते हैं या फिर आप मंदिर जा सकती हैं या नहीं जा सकती हैं। बात इतने पर खतम नहीं होती है। वे जिंदगी और मौत तय करते हैं, वे अपराधी और निरपराधी तय करते हैं, वे आपकी नजरबंदी और आजादी तय करते हैं या फिर आपको बेल मिलेगा या होगा जेल। कौन आंतकवादी है और कौन नहीं है, ये भी वही तय करते हैं। जिंदगी का कोई भी ऐसा लम्हा नहीं है जो कानून द्वारा निर्धारित नहीं होता है और न्यायधीश उसके सबसे बड़े व्याखाकार हैं।”

आप आवाज उठानेवाली महिलाओं को सलाम! 

बोल कि लब आजाद हैं तेरे!   

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