नीरव-मोदी घोटाला सरकारी संरक्षण में हुआ ! काश एक्सप्रेस जैसी एक ख़बर हर अख़बार में होती !!

संजय कुमार सिंह


आज इंडियन एक्सप्रेस की एक्सक्लूसिव खबर। यह खबर किसी और अखबार में होनी नहीं है। इसलिए आज दूसरे अखबारों की कोई चर्चा नहीं। इस खबर के बहाने एक्सक्लूसिव खबरें कैसे होती हैं और अखबारों में आमतौर पर कैसी खबरें छपती हैं उसकी चर्चा। इंडियन एक्सप्रेस ने आज पांच कॉलम में नीरव मोदी घोटाले से जुड़ी एक खबर को लीड बनाया है। शीर्षक है, “नीरव मोदी घोटाला : आईटी रिपोर्ट में आठ महीने पहले गड़बड़ी के संकेत मिल गए थे, साझा नहीं किया गया”। फ्लैग शीर्षक है, “रिपोर्ट में फर्जी खरीद और स्टॉक की कीमत बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने पर प्रकाश डाला गया था। कहने की जरूरत नहीं है कि यह पुरानी खबर है और इस मामले से जुड़े कई लोगों की जानकारी में होगी। पर आज छप रही है तो इसीलिए कि अभी तक किसी ने छापी नहीं।

बोफर्स के जमाने में अरुण शौरी इंडियन एक्सप्रेस के संपादक थे और रोज खबरों के धमाके करते थे। तब अरुण शौरी की कही यह बात हम जैसे युवा पत्रकारों के दिमाग में बैठ गई थी कि आप खबरें छापेंगे तो लोग तमाम दस्तावेजों और सबूतों के साथ खबर दे जाते हैं। उन्होंने कहा था कि लोग अपना नाम नहीं देना चाहें तो सामग्री एक्सप्रेस के रीसेप्शन पर छोड़ जाते हैं और फोन कर बता देते हैं कि फलां फाइल रीसेप्शन पर आपके लिए छोड़ आया हूं। मेरा भी अनुभव यही है कि जनसत्ता में देश भर से खबरें अपने आप आती थीं। खूब छपती थीं। ऐसे में एक्सप्रेस की यह खबर इतने दिनों बाद छप रही है तो मुख्य रूप से इसीलिए कि अब कोई ऐसी खबरें कोई छापता नहीं है।

पत्रकारिता से जुड़े लोग जानते हैं कि झारंखड सांसद घूस कांड हो या जैन डायरी वाला हवाला मामला – लोग फाइलें लेकर पत्रकारों के पास जाते थे। कोई छापता था कोई नहीं। कई जगह घूमने-छपने के बाद ये खबरें चर्चा में आईं। कुल मिलाकर, कहा जा सकता है कि खबरें नहीं छपने की स्थिति पहले भी रही है। पर सरकारी दावों के उलट खबरें खूब छपती थीं। अब ऐसा कम होता है। उदाहरण के लिए, कल यानी इतवार (2 दिसंबर 2018) के अखबारों में एक खबर प्रमुखता से छपी थी, ब्यूनस आयर्स, अर्जेन्टीना में हो रहे जी-20 सम्मेलन में भारत ने आर्थिक अपराधियों के प्रत्यर्पण पर समर्थन मांगा और विजय माल्या जैसे भगोड़ों पर कार्रवाई के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नौ सूत्री एजंडा पेश किया।

इतवार को पढ़ने के लिए यह अच्छी, विस्तृत सरकारी खबर थी। आपने भी पढ़ा होगा। हालांकि, आपको पता होगा कि मेहुल चोकसी के भारत से फरार होने के बाद उसे भारत से आवश्यक क्लियंरेंस मिला और इसके बाद ही उसे एंटीगुआ की नागरिकता मिली है। इसी तरह विजय माल्या यह आरोप लगा चुके हैं वे देश छोड़ने की सूचना वित्त मंत्री अरुण जेटली को दे चुके थे। मतलब आप भागने से रोक न पाओ दूसरे देश आपको प्रत्यर्पण में सहायता दें वह भी तब जब आप भगोड़े को आवश्यक क्लियरेंस देने का कारनामा भी कर चुके हैं। यही नहीं, सत्ता में आने से पहले मुंबई के अपराधी दाउद इब्राहिम को भी भारत वापस लाने की बात थी। दाउद वापस तो नहीं आया। इस दिशा में क्या कार्रवाई हुई मुझे नहीं मालूम लेकिन इस संबंध में 27 दिसंबर 2014 की दैनिक भास्कर की यह खबर जानने लायक है।

“1993 के मुंबई धमाकों के आरोपी भारत के मोस्‍ट वॉन्‍टेड अपराधी दाऊद इब्राहि‍म के पाकिस्तान में होने की ताजा मीडिया रिपोर्ट पर गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कार्रवाई के संकेत दिए हैं। राजनाथ ने कहा कि पाकिस्तान से दाऊद को सौंपने की मांग कई बार की जा चुकी है। लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में जब उनसे पूछा गया कि सरकार दाऊद को कब भारत लाएगी, उन्होंने कहा, ”धैर्य रखिए। वेट एंड वॉच।” वहीं, पीएम मोदी के दाऊद इब्राहिम को लेकर पाकिस्तानी पीएम नवाज शरीफ से बात करने की खबरों को गृह मंत्री ने सिरे से खारिज कर दिया। आप जानते हैं कि 25 साल पहले दाऊद के देश से फरार होने के बाद भारतीय खुफिया एजेंसियां उसके पीछे लगे होने का दावा करती हैं। पर कुछ नहीं हुआ।

अब मामला आर्थिक अपराधियों का है तो उसमें भी कार्रवाई सरकारी रफ्तार से चल रही है और अंतरराष्ट्रीय मंच पर मांग जैसी सकारात्मक खबरें प्रमुखता से छपती हैं पर सरकार कई मामले भूल गई, कइयों की चर्चा नहीं हो रही है तो ज्यादातर अखबार वाले भी विज्ञप्ति छापकर अपना काम पूरा कर रहे हैं। मैं नहीं कह रहा कि सरकारी दावे नहीं छपने चाहिए लेकिन उनपर सवाल नहीं उठाना नालायकी है। जी-20 सम्मेलन में प्रधानमंत्री की अपील सही या सामान्य हो सकती है पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे कैसे लिया गया। क्या प्रतिक्रिया रही यह ज्यादा दिलचस्प होता अखबारों में ऐसी खबरें नहीं के बराबर होती है। खोजी खबरें करने की परंपरा इंडियन एक्सप्रेस ने ही जारी रखी है और आज की खबर ऐसी ही है। आइए, देखें इंडियन एक्सप्रेस की आज की खबर क्या है।

खुशबू नारायण के मुताबिक, नीरव मोदी-पीएनबी घोटाला खुलने से आठ महीने से भी ज्यादा पहले आयकर विभाग की एक जांच में यह पता चल गया था कि उनके यहां फर्जी खरीद, स्टॉक की कीमत बढ़ृचढ़ाकर दिखाने,रिस्तेदारों को संदिग्ध भुगतान, अस्पष्ट कर्ज आदि के कई मामले हैं। भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी और मेहुल चोकसी की यह आयकर जांच रिपोर्ट 10,000 पन्नों में है और एजेंसी ने इसे 8 जून 2017 को अंतिम रूप दे दिया था। लेकिन इसे दूसरी एजेंसियों जैसे सीरियस फ्रॉड इनवेस्टीगेशन ऑफिस (एसएफआईओ), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) के साथ फरवरी 2018 तक साझा नहीं किया गया था। यह घोटाला तभी प्रकाश में आया था।

सूत्रों ने कहा कि आयकर विभाग ने इस सूचना को रीजनल इकनोमिक इंटेलीजेंस कौंसिल (आरईआईसी) से भी साझा नहीं किया। यह कानून लागू करने वाली भिन्न एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने की व्यवस्था है। अखबार ने लिखा है कि मोदी और चोकसी से संबंधित ये रिपोर्ट साझा नहीं की गई क्योंकि उस समय ऐसी रिपोर्ट साझा करने का कोई प्रोटोकोल नहीं था। घोटाला खुलने के बाद जुलाई अगस्त 2018 से टैक्स विभाग से कहा गया है कि वे सभी जांच रिपोर्ट फाइनेंशियल इंटेलीजेंस यूनिट (एफआईयू) से साझा करें। और अब जांच व अन्य उद्देश्य से ऐसी सूचनाएं साझा की जाती है। इस लिहाज से यह तथाकथित अच्छी, पॉजिटिव या सरकारी खबर भी है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।



 

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