मैंने क्यों किया अपने प्रपीड़कों को क्षमा!

(हिंदी कविता के मौजूदा परिदृश्य पर कोई बात आज बगै़र देवी प्रसाद मिश्र के मुमकिन नहीं है। गहन संवेदना में डूबी भाषा और शिल्प के अनोखेपन से वे पाठकों को लगातार बेचैन करते आए हैं। साल भर पहले पूर्वी दिल्ली में उन पर इसलिए हमला हुआ क्योंकि उन्होंने एक बस कंडक्टर को खुले में पेशाब करने पर टोका था। इस घटना को याद करते हुए उन्होंने मीडिया विजिल के लिए जो लिखा है वह अपने समय पर एक गहरी टिप्पणी है। इस के अंत में उनकी दो कविताएँ भी हैं और एक वीडियो जिसमें उन्होंने अपने ऊपर हुए हमले के बहाने कुछ गंभीर बातें की हैं- संपादक )


देवी प्रसाद मिश्र


अंग्रेज़ी कवि एलियट ने अप्रैल को एक क्रूर माह बताया लेकिन मेरे लिये तो फरवरी एक क्रूर माह साबित हुई। एक साल पहले फरवरी के आखिरी से हफ्ते में कौशांबी में स्थित अपने स्टूडियो से पैदल घर पटपड़गंज लौटते हुए रात को करीब साढ़े सात डीटीसी बस के कंडक्टर और ड्राइवर  ने मेरे साथ हिंसक मारपीट की । मुड़कर देखता हूँ तो अपने चेहरे का थोड़ा सा खून ज़रूर दिखता है लेकिन लगता नहीं कि मन में अमर्ष है । नहीं है । अलबत्ता बीता साल कविताओं से भरा पूरा लगता है । और कविताओं को पलटता हूँ तो यह नहीं लगता कि इनमें कोई व्यक्तिगत प्रतिशोध की अग्नि हो।  अलबत्ता इनमें राजनीतिक और सामाजिक संरचनाओं पर सवाल उठते दिखते हैं । किस तरह का राज्य बना, किस तरह की शक्ति संरचनाएँ निर्मित हुईं और कैसे तरह तरह की क्रूरताओं का निर्माण हुआ। इस दौर में लिखते पढ़ते हुए यह भी प्रबोध हुआ कि  कविताओं के लिये यंत्रणा कोई अनिवार्यता ज़रूर है। निराला  ने कहा था कि जब कड़ी मारें पड़ीं दिल हिल गया। कविता के लिये दिल का हिलना ज़रूरी है।

मुझे लगता है कि कवि अपने को किसी न किसी यंत्रणा में डालता रहता है। इस अर्थ में इसे बड़बोलापन न समझा जाय कि कवि में बुनियादी तौर पर एक कोहराम मचाने वाली और अपना सुख चैन खोने वाली क्रांतिधर्मिता होती ही है । क्यों रहा जाय सुरक्षित होकर।  और भाषाओं के बारे में मैं नहीं जानता लेकिन हाल के बरसों में हिंदी में बच कर निकल जाने वाले रचनाकार की आधी अधूरी ही स्वीकृति हो पाती है। सुरक्षित जीवन का चयन कविता को अनात्म बनाता है । कवि सुख तंत्र की और बढ़ा नहीं कि कविता निकली हाथ से।

गुज़रे साल को मैं इस बात के लिये भी महत्व का मानता हूँ  कि अपने साथ हुई हिंसा के बावजूद मैंने अपना मानवीय विवेक नहीं खोया। हो  सकता है कि कविता ने इसमें मेरी मदद की हो। बड़ी मनुष्यता को प्रस्तावित करने में मुझसे चूक नहीं हुई। मुझे कविता में प्रयोग और परिवर्तन आकृष्ट करते हैं। तो मैंने मानवीय व्यवहार में भी नैतिक प्रयोगधर्मिता का विकल्प चुना।  मैंने अपने साथ मारपीट करने वालों को  क्षमादान देने का निर्णय लिया जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया । इसके एवज़ में मैंने अपने प्रपीड़कों से कोई भी क्षतिपूर्ति राशि लेने को अस्वीकार कर दिया ।  मैंने माननीय अदालत को बहुत साफ तौर पर बताया कि  यह क्षमादान किसी सौदेबाज़ी या  लेनदेन की संरचना का हिस्सा नहीं है। उसके लिये कोई स्पेस नहीं था।  जैसा कि मुक्तिबोध की एक कविता है कि यह अंत:करण का आयतन था।

 क्षमा किसी लेनदेन का हिस्सा बनती तो उसकी गरिमा नष्ट हो जाती । मेरे  साथ एक डीटीसी कंडक्टर ने इसलिये मारपीट की क्योंकि मैंने उसके फुटपाथ पर आते जाते लोगों की तरफ मुंह करके  पेशाब करने पर ऐतराज़  किया था। और यह हिंसा उसने तब की जब वह अपना पूरा काम धाम निपटा चुका था । मैं मान लेता हूँ कि कंडक्टर को  बहुत तेज़ पेशाब लगी थी तो पेशाब करते हुए कह सकता था कि जो करना है कर लो मैं तो करूँगा पेशाब | विकल्प यह था कि वह मेरी बात को हास परिहास में भी उड़ा सकता था। लेकिन मेरी आपत्ति का जवाब उसने मारपीट से दिया उस समय कि जब वह पेशाब का करोबार निपटा चुका था । । किसी गलत नागरिक व्यवहार पर आपत्ति का जवाब  क्रूरता नहीं हो सकती। बात का जवाब बात हो आक्रमण नहीं । तर्क का प्रत्युत्तर वितर्क हो सकता है हिंसा नहीं।   वाद विवाद और हास परिहास के दरवाज़े बंद करना समाज को संवादविहीन  अंधेरी गलियों में ले जाना होगा। कहना पड़ेगा कि अमर्त्य सेन का बहस करता भारतीय मनुष्य लापता होता जा रहा है।  मेरे लिए यह संभव था कि अकेलापन पड़ जाने की यातना और चोट को सहकर इस मामले को अपने तक सीमित रख कर मैं अपमान का घूंट पीकर रह जाता। लेकिन तब मैं पूरे जीवन आत्मग्लानि में जीता। गांधी कहते हैं कि हिंसा करने से कम बुरा नहीं हैं हिंसा को सहना। लेकिन जिस बात ने धीरे धीरे  मुझे अपने बारे में आश्वस्त किया वह यह थी कि मेरे मन में प्रतिशोध का भाव नहीं था। मैं उखड़ा हुआ ज़रूर था कि हमने कौन सा समाज बना रखा है। घर में चक्कर लगाता रहा। बरामदे में । मेरी देह स्टीफन हॉकिंग की देह की तरह लुंज पुंज हुई जाती थी लेकिन मेरा चलना न रुकता था ।  कुछ भी हो  मेरे मन में ग्लानि नहीं थी– मैंने कोई अपराध तो किया नहीं था। मैं अपराध का शिकार था यह जानते हुए भी कि समकालीन सामूहिक मानस पीड़ित को दयनीय, कारुणिक और कई बार दोषी भी मानने की मनोग्रंथि में दिखता है । बलात्कृत से यह अपेक्षा होती है कि वह संकोचशील और शर्मसार दिखे कि उसका बलात्कार हुआ ।  लेकिन न तो मैं दयनीय महसूस कर रहा था और न ही अकर्मण्य और न निरीह। निराशा ज़रूर गहरी थी समाजतंत्र और राज्यतंत्र को लेकर।  

मैं उस रात की घटना को उसकी नितांत स्वायत्तता में नहीं देखता। मेरा  मानना है कि  एक मामूली सी बात पर मारपीट की जो कार्रवाई प्रपीड़कों ने की वह समकालीन हवा में फैली हिंसा का एक विकेंद्रित विस्फोट भर था । यह राज्य बहुत अकथित तरीके से विभाजन और हिंसा को नाले के गंदे पानी की तरह बाँट रहा है। जो जितनी गहरी और चौड़ी बाल्टी भरना चाहे भर ले। मौजूदा राज्य तो कांग्रेसियों की तरह ज़बानी तौर पर भी यह नहीं कह रहा कि हम सब एक हैं । उसका  तो यह संदेश  है कि हम सब अलग अलग हैं। एक हो नहीं सकते।  जिसे हम इंडियन स्टेट के तौर पर जानते हैं वह वैमनस्य का समान वितरण कर रहा है। बेचारा नागरिक पारस्परिकता नहीं संदेह, आपसदारी नहीं उग्रता और संवाद नहीं आक्रमण को अपना हथियार मान ले रहा है  । तो बर्बरता, भय, उचक्कापन सत्यनारायण की कथा में पंजीरी की तरह बँट रहा है । कंडक्टर और ड्राइवर की हिंसा कमोबेश उसी विद्रूप हिंसा का कोई नतीजा थे जिसे एक अर्धपुलिसिया राज्य बहुत उदारता और चतुराई से वितरित कर रहा है । सड़कीय उचक्कापन किसी प्रबंधित हिंसा का एक अराजक रूप भर है । दिल्ली में जाटलैंड का खापतंत्र , सामंती अकड़, पितृसत्ता की ठसक, हाल में चेतना का सैन्यीकरण और निर्बुद्धिकरण, छद्म राष्ट्र भक्ति, भीड़तंत्रीय हल्लावाद, और सामाजिक दायित्वहीनता मिलकर एक डरावनी नागरिकता का निर्माण किये जा रहे हैं ।  

मैं स्वभाव से दंडात्मक नहीं हूँ । मतलब कि मनुष्य में सुधार हो सकता है मैं इसका कायल रहा । हमेशा ही । तो मनुष्य के अच्छेपन में मेरा भरोसा टूटता सा नहीं दिखता । आत्मनिरीक्षण, पश्चाताप और सुधारणा से हम विरत नहीं हो सकते। ये हमारे बुनियादी साभ्यतिक लक्षण हैं ।  बर्बरता का जवाब बर्बरता नहीं हो सकता । मैंने कंडक्टर और ड्राइवर में पश्चाताप की कौंध देखी।  मेरे लिये इस का महत्व था ।  उनकी आपराधिक हिंसा की पहचान करने के बाद मेरी मुराद केवल यह थी कि उनमें  कोई गहरा मानवीय पछतावा दिखे और बेहतर मनुष्य बनने की इच्छा – मेरे लिये इतना ही काफी था । ड्राइवर और कंडक्टर के हिंसक उचक्केपन की वजह से परिवार ध्वस्त हों – इस बात ने मुझे परेशान कर रखा था ।

बतौर लेखक मुझे कोई यह न बताये कि कंडक्टर मेरा शत्रु  है। हाड़ तोड़ कर मेहनत करके अपनी रोज़ी कमाने वाला मेरा दुश्मन कैसे हो सकता है ।  मेरा शत्रु राजनीतिक वर्ग और करोड़पतियों की दुरभिसंधि है जिसने भारतीय हरीतिमा को तहस नहस कर ग्रीन इंडेक्स में भारत को 166 वें स्थान पर पहुँचा रखा है कुल 170 देशों की लंबी फेहरिस्त में। मेरे वर्ग शत्रु नीरव मोदी और राम रहीम और चिटफंडीय सुब्रत राय हैं।  कंडक्टर और ड्राइवर तो मेहनतकश हैं जो कुछ महत्वपूर्ण कामों में लगे हैं। यही कोई वजह रही होगी कि एक साल में लिखी चीज़ों को देखता हूँ तो लगता नहीं कि मैं ने कोई प्रतिशोधात्मक कविता, कहानी या टिप्पणी लिखी हो। कविता बदला लेना नहीं सिखाती । वह तो मनुष्यता को आविष्कृत करने का बड़ा उपकरण है । वह थकती नहीं इस खोज में। वह परानुभूति का बड़ा काम धाम है।

जिस दिन यह हादसा हुआ उस दिन मैं अपने पहले उपन्यास के  बारे में सोचते हुए आ रहा था । ज़ेहन में एक कविता भी थी। कवियों से यह उम्मीद की जाती है कि वह आगत को देख सकें । लेकिन उस शाम आती हुई विपत्ति को मैं नहीं देख सका। इस तरह से देखें तो यह समय बहुत अनिश्चयों से भरा है । कवि के लिये भी यह बता पाना मुश्किल है कि क्या होने वाला है ।

कविता ने एक बेहतर समाज और मनुष्य बनाने का कारोबार और स्वप्न अभी छोड़ा नहीं है। मैं पुराने वक्तों के महाकाव्यों की बात नहीं कर रहा लेकिन आधुनिक कविता अपनी मूल निर्मिति में ही हिंसा विरोधी है। उसका काम ही है कि वह मनुष्यता के किसी अलक्षित रूप को अनावृत्त करके हमें चकित कर दे।  

मैं इस प्रसंग से जुड़ी एक और परिघटना का जिक्र नहीं करूंगा तो यह वृत्तांत अधूरा रह जायेगा। कवि मंगलेश डबराल ने जब यह सुना कि किसी को एक सार्वजनिक जगह पर पेशाब करने से रोकने पर मेरे साथ मारपीट की गयी तो उन्होंने बहुत सहज लहजे में मुझसे फोन पर कह दिया कि अरे देवी, पूरा लैंडस्केप ही पेशाबघर हो रहा है तो किसी को क्या रोकना। बहुत सहजता और आपसी संवाद के तौर पर कही इस बात का बतंगड़ बनाया गया – हिंदी के अनोखे कवि, महत्वपूर्ण गद्यकार और उत्कृष्ट साहित्यिक संपादक पर शाब्दिक हमले किये गये । यह वाक्य उन्हें किसी ने कहते या लिखते नहीं देखा या सुना या पढ़ा | इसके लिये मेरे एक कथन को आधार माना गया जो मैंने एनडीटीवी पर श्री रवीश कुमार के साथ बात करते हुए उद्धृत कर दिया था | कहना मैं यह चाहता हूँ कि अगर मैं इस वाक्य को उद्धृत कर रहा हूँ तो इस वाक्य की अभिधात्मकता और रूपकत्व के लिये मुझे भी तरह- तरह की गाली गलौज से नवाज़िये | मंगलेश डबराल पर हमला करने वाले कौन थे और उनकी राजनीति और कुंठा क्या है-मैं ठीक ठीक नहीं कह सकता लेकिन मैं इतना ज़रूर जानता हूँ कि एक साहित्यिक संपादक, कवि और विचारक के तौर पर मंगलेश ने हिंदी नाम की भाषा को बहुत अनूठे और अपूर्व तरीके से संवारा।  उन्होंने हिंदी की लगभग चार पीढ़ियों के उत्कृष्ट कवियों की बेहतरीन कविताओं को जनसत्ता में छापा । हम सब साक्षी हैं कि कैसे उन्होंने महावीर प्रसाद द्विवेदी की तरह हिंदी के पूरे पूरे लेखों का पुनर्लेखन किया क्योंकि उन उल्टे सीधे तरीके से लिखे लेखों में कोई बुनियादी कस्बाई कौंध या प्रतिकार की कोई मंशा दिख रही होती थी।  रघुवीर सहाय की परम्परा में मंगलेश एक बड़े सहित्यिक संपादक के तौर पर जाने पहचाने जाते हैं | उनका मखौल  उड़ाकर हम अपने एक बड़े कृतिकार, संवेदनशील सामाजिक चिन्तक पर विहँसने के दुर्भाग्य  और पतनशीलता में फँसते हैं |

यह भूमिविस्तार एक पेशाबघर है या नहीं इसका पता किसी भी शहर में रेलगाड़ी से प्रवेश करते हुए लग जाता है कि किस तरह  लोग रह रहे हैं – बज-बज करती नालियाँ, बोरा लटके संडास, कूड़े के ढेर, ढहते घर, पीले लट्टुओं में रौशन होने की कोशिश करते अधबने घर, बोतल लहराते संडासी, पानी के लिये लाइन में ख़ड़ी स्त्रियाँ, खौराये कुत्ते और उनसे उनसे सटकर भटकते बच्चे। पता नहीं कौन कौन सी बीमारियां फैल रही हैं । हमारे पास चमकता दमकता एक गुड़गांव है लेकिन कितने ही कितने ही सैकड़ों हज़ारों गूगांव हैं। नरेंद्र और नीरव की लूट खसोट वाली कारपोरेटीय चमक के  समानांतर नत्थू और ननकू का अँधेरा है ।  इसका नतीजा यह है कि देश में 1,30,000 बच्चे डायरिया से मर जाते हैं और पूरी दुनिया के एकतिहाई कुपोषित बच्चे भारत में हैं । पाँच साल से कम की उम्र के 48 फीसदी बच्चों की सामान्य ग्रोथ आदर्श मानकों से कहीं कम है जो छोटे कद और मस्तिष्क के अल्प विकास की भयावहताओं में दिखती है। तो एक चमकीली सभ्यता के समानांतर यह एक कूड़ा सभ्यता भी है जिसके संसाधन अडानी, अंबानी, माल्या, नीरव मोदी, सुब्रत राय जैसे करतबी कारपोरेट और खसोटू राजनीतिक वर्ग लोग हड़प गये  | मुंबई की 55 प्रतिशत जनता स्लम में रहती है। तो पूरा भारतीय लैंडस्केप एक बड़ा पेशाबघर ही नहीं एक भयावह बूचड़खाना है जहाँ हर 155 मिनट पर 16 साल तक की किसी बच्ची का बलात्कार हो रहा है और हर 13वें घंटे पर 10 साल से नीचे की बच्चियों का । 2015 में 10 हज़ार बच्चों का बलात्कार हुआ। हर सात मिनट पर स्त्री के प्रति कोई अपराध हो रहा है,   जीविका के लिए यात्रा करते भोले भाले लोगों को लिंच कर दिया जा रहा है।  हिंदू अखबार के  एन. राम की हाल की किताब में दर्ज हुआ है कि  2003 से लेकर 2013 तक जो 26 भ्रष्टाचार के मामले आये उनमें औसतन हर मामले में 26000 करोड़ रुपये का घोटाला हुआ था।   यह वही देश है जहाँ मुकेश अंबानी साल की तनख्वाह के तौर पर कागज पर 14 करोड़ रुपये लेता है और चौंतीस पैंतीस तल वाले स्थापत्य में घर हीनों को देखता बेशर्मी से रहता है । फ्रांसीसी अर्थशास्त्री टॉमस पिकेटी और लुकास चांसेल ने बहुत हाल में अपनी किताब ब्रिटिश राज टु बिलियनॉयर राज में बताया है कि हिंदुस्तान में आज शिखर के एक फीसदी लोगों ने 22 फीसदी लोगों के संसाधन हड़प रखे हैं। वे बताते हैं कि आर्थिक विषमता की इतनी बुरी हालत 1930 के  औपनिवेशिक दशक में थी । लेकिन 2017 के ऑक्सफैम के आंकड़े तो कह रहे हैं कि एक प्रतिशत लोगों ने 70 फीसदी संसाधनों पर कब्जा कर रखा है ।   हमारी राष्ट्रव्यापी गंदगी और गरीबी की वजह संसाधनविहीनता नहीं है बल्कि वह बज बज करती राजनीति और पतनशील पूंजी के बीच दुरभिसंधि का अनिवार्य, सीधा और कार्य कारण वाला परिणाम है । इसी अर्थ में कहा गया होगा कि सारा कुछ ही पेशाबघर हो रहा है तो किसी एक मरदूद को इसके लिये क्या रोकना। मैं कहना यह चाह रहा हूं कि इस समय चलते नकली, कागजी और फौरी स्वच्छता अभियान के दौर में यह मांग बहुत वाजिब है कि बजबजाती राजनीति का मलमूत्र कैसे साफ किया जाय जो इस पूरे विद्रूप निर्माण के केंद्र में है । मेरा कहना है कि हम एक बड़े कवि के वाक्य के अर्थ और उसकी ऐतिहासिक महत्ता पर ध्यान दें | नकली राष्ट्रवाद, उन्मादी देशप्रेम, मक्कार आत्माभिमान हमें आत्मविश्लेषण के बुनियादी उपकरणों से वंचित कर रहा है | मैं खुद सोशल मीडिया में गतिहीन हूँ तो मुझे वहाँ चलते कोहराम का पता कभी-कभी ही हो पता है | इसलिए मुझे अपनी बात कहने में थोड़ा देर भी हुई | लेकिन यह बात पूरी तरह से अस्वीकार्य है कि अंधे राष्ट्रवाद के युग में मंगलेश जी को परिप्रेक्ष्यहीन तरीके से  अपमानित किया जाय | अपमानित तो वे लोग किये जाने चाहिए जिन्होंने देश को एक अंतहीन स्लम या मलिन बस्तियों के महाद्वीप में बदल दिया- समृद्धि के कुछ छोटे छोटे द्वीप बनाकर |

एक हिंसक अनुभव से गुज़रे मुझे एक साल हो गये हैं। लेकिन इस एक साल में चीज़ें ज्यादा बिगड़ी हैं- राज्य और समाज दोनों में वैचारिक और सामाजिक क्षरण ज्यादा दिख रहा है । जान पड़ता है कि  कवियों को अब कुछ ज्यादा ही टोकाटाकी करनी पड़ेगी कविता में, और ज़रूरत पड़ेगी तो सड़क पर भी। ऐसे में पिटने की संभावनाएं भी बढ़ गई हैं। दंगे और हत्या का तंत्र तो पहले से ही काफी पुख्ता है।

देवी प्रसाद मिश्र की  दो कविताएँ

 

तो सोच लो कि आदमी को मारना क्या है

 

(तोड़ फोड़ के लिये मियां गालिब से माफी मांगते हुए)

 

जो न नाक से टपका तो लहू क्या है

इस तिराहे पे क्रूरता की वजह क्या है

 

जो मेरे होंठ से निकले लहू को देख लिया

तो जान लो कि इराक है सीरिया क्या है

 

यों अगर गाय मारने की सज़ा उम्र कैद  

तो सोच लो कि आदमी को मारना क्या है

 

हमने नागरिक बनाया तो क्या बना डाला

हमने बीते हुए सालों में किया क्या है

 

मैं कहूँगा कि मेरे पास एक चोट तो है

जो ये पूछ लो कि कौम के लिये दवा क्या है

 

मेरे सपनों में पूरी रात गाय पगुराती

एक हिंदू की ख्वाहिशों का हुआ क्या है

 

तुझको गर  कत्ल एक करना है   

तो फिर वजह बताने की अदा क्या है

देह

 

देह प्रेम के काम आती है।

                 वह यातना देने और सहने के काम आती है।

 

     पीटने में जला देने में

आत्मा को तबाह करने के लिये कई बार राज्य और धर्म

                  देह को अधीन बनाते हैं

    बाज़ार भी करता है यह काम

वह देह को इतना सजावटी बना देता है कि

                   उसे सामान बना देता है

बहुत दुःख की तुलना में

                  बहुत सुख से खत्म होती है आत्मा  

 

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