हिंदी चैनलों पर शनिवार की शाम, रहस्यों और मूर्खताओं के नाम!

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हिंदी के समाचार चैनलों ने शनिवार की शाम को रहस्यों के नाम कर दिया. शनिवार 16 अप्रैल को शाम 8.30 से 9.30 के बीच आखिर ऐसा क्या हो गया कि तमाम चैनलों ने मिलकर एक घंटे के भीतर ही राम से लेकर अश्वत्थामा और शूर्पणखा आदि तमाम पौराणिक पात्रों को खोज डाला? क्या निश्चित टाइम स्लॉट पर निश्चित किस्म का प्रोग्राम दिखाने को लेकर चैनलों के बीच कोई गुपुचुप समझौता होता है?

ये बात एक हद तक सच है की हिंदी के चैनल टाइम स्लॉट के हिसाब से तकरीबन एक तरह के कार्यक्रम अपने परदे पर चलाते हैं और इसके पीछे मार्केटिंग विभाग की समझदारी काम करती है कि दर्शक किस वक़्त पर क्या देखना पसंद करता है. इसका उदाहरण एक सामान्य दर्शक खेल के कार्यक्रमों के एक ही टाइम स्लॉट के रूप में देख सकता है. यहाँ तक की ”सास बहू और …”’ के नाम से तमाम हिंदी चैनलों पर चलने वाले प्रोग्राम्स का भी एक ही तय वक़्त होता है.

सवाल उठता है कि पौराणिक पात्रों की तलाश से जुडे कार्यक्रमों के लिए शनिवार की देर शाम का ही वक़्त क्यों चुना गया है? आखिर किस सर्वे से यह पता चला है कि एक आम टीवी दर्शक शनिवार की शाम रहस्यों को देखने में बिताना चाहता है?

नीचे गौर करें शनिवार 16 अप्रैल की शाम 8.30 से 9.30 के बीच विभिन्न चैनलों के परदे पर, आपको बात समझ में आ जाएगी.

अश्वत्थामा की खोज

 

राम की खोज

 

रहस्य

 

 शूर्पणखा की खोज

 

अजगर से खेलने वाले बच्चे

 

ध्यान दीजिए की एक ही शाम में इन चैनलों ने मिलकर राम, शूर्पणखा, अश्वत्थामा और अजगर से खेलने वाले बच्चों की खोज कर डाली है. इन प्रोग्राम्स को प्राइम टाइम पर इस तरह पेश किया गया है जैसे कोई खोजी रपट पेश की जा रही हो.

जो विश्लेषक यह कहते नहीं अघाते हैं कि टीवी माध्यम अब भूत-चुड़ैल की कहानियों के दौर से बाहर आ गया है, उनके मुंह पर बीता शनिवार एक तमाचा है. इस बात की पड़ताल की जानी चाहिए कि लम्बे समय तक मिथकीय और पौराणिक मूर्खताओं से दूर रहे ये चैनल अपनी ”घर वापसी” करने को मजबूर क्यों हुए हैं जबकि भारतीय दर्शकों की पसंद में कोई ख़ास बदलाव भी नहीं हुआ है?

क्या यह दो साल पहले हुए सत्ता के बदलाव का सूचक है? केंद्र की सरकार पर जिस दल और जिस संघ परिवार का नियंत्रण है, वह मिथकों और पौराणिक गाथाओं को सत्य और तथ्य की तरह मानकर चलता है. हमारे प्रशान्मंत्री कहते हैं कि गणेश की सर्जरी मेडिकल साइंस का एक प्राचीन नमूना है और कोलकाता का फ्लाईओवर ढहना ईश्वर की मर्ज़ी है. ऐसे में यह पूछा जाना ज़रूरी है कि क्या शनिवार की शाम समाचार चैनलों के भीतर RSS की आत्मा का प्रवेश हो जाता है? क्या यह किसी सोची समझी साज़िश का नतीजा है?

 

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