सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और नफ़रत की राजनीति को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कारनामों की गूँज अब दुनिया भर में है। ताज़ा मामला कनाडा का है। कनाडा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उसके सरसंघचालक मोहन भागवत को लेकर एक बड़ा विवाद छिड़ गया है। आरएसएस के शताब्दी वर्ष के मौके पर मोहन भागवत अगस्त 2026 के अंत में कनाडा जाने वाले हैं। योजना के मुताबिक वे 31 अगस्त से 1 सितंबर तक टोरंटो में कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। यह उनके कनाडा का पहला दौरा होगा और किसी आरएसएस प्रमुख का 2005 के बाद पहला दौरा। लेकिन इस यात्रा से पहले ही कनाडा के दो सांसदों ने उन्हें देश में आने से रोकने और पूरे आरएसएस संगठन पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर दी है।
प्रतिबंध की माँग करने वाले ये दोनों सांसद कनाडा की न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी (एनडीपी) से हैं—हीथर मैकफर्सन और जेनी क्वान। उन्होंने सार्वजनिक सुरक्षा, आप्रवासन और विदेश मामलों के मंत्रियों को पत्र लिखकर कहा कि मोहन भागवत को कनाडा में प्रवेश न दिया जाए। उनका तर्क है कि भागवत के पास “नफरत भरे भाषणों का इतिहास” है, वे धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा का समर्थन करते हैं, आलोचकों को भारत और कनाडा में डराने की कोशिश करते हैं और आपराधिक या आतंकवादी संगठनों से जुड़े हैं। सांसदों का दावा है कि उनकी उपस्थिति कनाडा में सामाजिक अशांति पैदा कर सकती है। उन्होंने आरएसएस को “फासीवादी अर्धसैनिक संगठन” बताया और कहा कि अब समय आ गया है कि आरएसएस को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए तथा इसे आतंकवादी संस्थाओं की सूची में डाला जाए।
इस माँग के साथ ही कनाडा के 200 से ज्यादा नागरिक समाज संगठनों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और धार्मिक नेताओं ने भी सरकार से अपील की कि भागवत की प्रवेश अयोग्यता की समीक्षा की जाए और उन्हें देश में न आने दिया जाए। ये संगठन मुस्लिम, सिख, दलित और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के हितों की बात करते हैं। वे कहते हैं कि आरएसएस से जुड़े नेटवर्क कनाडा में भी सक्रिय हैं और अल्पसंख्यकों के खिलाफ धमकियां देते हैं।
हालाँकि कनाडा में रह रहे भारतीय मूल के हिंदू संगठनों ने इसका विरोध किया है। उन्होंने कहा कि ऐसी मांगें विभाजन फैलाती हैं और लाखों कनाडाई हिंदुओं पर शक का साया डालती हैं। उनके मुताबिक यह सिर्फ एक सामुदायिक कार्यक्रम है और बिना ठोस सबूत के किसी संगठन या व्यक्ति पर प्रतिबंध लगाना गलत है।
कनाडा सरकार ने फ़िलहाल इस मांग पर कोई आधिकारिक फैसला नहीं लिया है। यह सिर्फ विपक्षी सांसदों और कुछ संगठनों का प्रस्ताव है। लेकिन कनाडा के अलावा अमेरिका में भी आरएसएस पर प्रतिबंध की बात हो रही है। मार्च 2026 में अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (यूएससीआईआरएफ) ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में भारत को “विशेष चिंता का देश” (सीपीसी) घोषित करने की सिफारिश की। साथ ही आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने को कहा था। इन प्रतिबंधों में संपत्ति जब्त करना और अमेरिका में प्रवेश पर रोक शामिल है। आयोग का आरोप है कि आरएसएस धार्मिक स्वतंत्रता के गंभीर उल्लंघन के लिए जिम्मेदार है या उन्हें बर्दाश्त करता है।
हालाँकि यूएससीआईआरएफ एक सलाहकार संस्था है यानी इसकी सिफारिशें बाध्यकारी नहीं होतीं। अमेरिका सरकार ने अब तक इन पर कोई कार्रवाई नहीं की है। उधर, भारत सरकार ने इस रिपोर्ट को पक्षपातपूर्ण और पूर्वाग्रह से भरा बताया है। लेकिन सवाल उठता है कि आरएसएस पर इस तरह के सवाल उठते क्यों हैं।
आरएसएस की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। यह खुद को एक सांस्कृतिक संगठन बताता है जो हिंदू समाज में अनुशासन, एकता और राष्ट्रभक्ति बढ़ाने का काम करता है। इसके लाखों स्वयंसेवक रोज शाखाओं में इकट्ठा होते हैं, व्यायाम करते हैं और सामाजिक सेवा में लगे रहते हैं। यह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का वैचारिक आधार माना जाता है। आलोचक कहते हैं कि आरएसएस अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ नफरत फैलाता है। इतिहास में आरएसएस पर तीन बार प्रतिबंध लगा। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद, 1975 में आपातकाल के दौरान और 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद। हर बार प्रतिबंध कुछ समय बाद हटा दिया गया क्योंकि पर्याप्त सबूत नहीं मिले। आलोचक बाबरी विध्वंस, गुजरात दंगों और अन्य सांप्रदायिक घटनाओं में आरएसएस या इससे जुड़े संगठनों की भूमिका का हवाला देते हैं। वे कहते हैं कि आरएसएस की विचारधारा हिंदू राष्ट्र की अवधारणा पर आधारित है जो अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाती है। ज़ाहिर है, आरएसएस इन आरोपों से इंकार करता है।
ये विवाद कनाडा और अमेरिका में इसलिए तेज हैं क्योंकि वहां भारतीय प्रवासी समुदाय बड़े हैं। सिख, मुस्लिम और हिंदू समुदायों के बीच तनाव कभी–कभी बढ़ जाता है। खासकर कनाडा में खालिस्तानी मुद्दे और भारत–कनाडा संबंधों के उतार–चढ़ाव ने माहौल को और जटिल बना दिया है। कनाडा सरकार अगर भागवत की यात्रा पर कोई फैसला लेती है तो वह कानूनी प्रक्रिया के तहत ही होगा। फिलहाल यह प्रस्ताव विपक्ष और कुछ नागरिक समूहों की ओर से है।
इसमें शक़ नहीं कि अपने गठन के शताब्दी वर्ष में आरएसएस को ऐसे तमाम सवालों से दो–चार होना पड़ रहा है, जिससे वह लगातार मुँह छिपाता रहा है। भारत में होने वाली उसकी आलोचना अब विदेशों में भी चिंता का विषय बनी हुई है। रामचंद्र गुहा जैसे इतिहासकार आरएसएस की विचारधारा को सिर्फ़ चार शब्दों में व्याख्याति करते हैं—मुलमानों को औक़ात में रखो। यह बताता है कि आरएसएस की पूरी विचारधारा अल्पसंख्यकों, ख़ासतौर पर मुस्लिमों से नफ़रत पर आधारित है और दुनिया अब इसे लेकर गंभीर हो रही है।
