BJP की जीत की वजह मोदी का महानायकत्व नहीं, विपक्ष की नीतिगत कमज़ोरियाँ हैं!

भाजपा की जीत का दूसरा पहलू

बिहार में विधानसभा के आम और मध्य प्रदेश वगैरह में हुए कई महत्वपूर्ण उप चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जीत के बाद देश के मुख्यधारा मीडिया में यह ‘निष्कर्ष’ एक बार फिर ‘लोकप्रिय’ हो गया है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की 2019 के लोकसभा चुनाव  के समय की लोकप्रियता एलएसी पर चीन की घुसपैठ, अर्थव्यवस्था में आई खस्ताहाली, कोरोना से निपटने में हुई गड़बड़ियों, बढ़ती बेरोजगारी और अलग-अलग कारणों से किसानों व युवाओं में फैले असंतोष के बावजूद बरकरार है। हालांकि यह स्थिति का पूरा सच नहीं है और देशवासी अब तक कई राज्यों के चुनावों में उसके क्षरण के साक्षी बन चुके हैं।

बिहार के पैमाने पर इसकी पड़ताल करें, जहां भाजपा की जीत को कोरोनाकाल के पहले चुनाव में हासिल होने के कारण कुछ ज्यादा ही अहम बताया जा रहा है, तो याद रखना होगा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में इस राज्य में उसका प्रमुख प्रतिद्वंद्वी राष्ट्रीय जनता दल अपना खाता तक खोलने में विफल रहा था, जबकि उसके महागठबंधन की घटक कांग्रेस को भी सिर्फ एक सीट मिली थी। जब तक ये दोनों दल 2015 के विधानसभा चुनाव में अपनी जीत से नीतीश कुमार के विश्वासघात का गम गलत कर पाते, नरेन्द्र मोदी की आंधी में उड़ गये थे। कोई कुछ भी कहे, बिहार की जमीनी हकीकत गवाह है कि उसके बाद से इस विधानसभा चुनाव तक इनके लिए परिस्थितियां असामान्य ही चली आ रही थीं। चुनाव आयोग ने इस चुनावों के कार्यक्रम का एलान किया तो भी लोकसभा चुनाव में विभिन्न सीटों पर  भाजपा व जदयू की बड़े-बड़े अंतर से हुई जीतों का इतिहास इन्हें डराता आ रहा था।

इतना ही नहीं, कहा जा रहा था कि उनके पास एक भी ऐसा परिपक्व नेता नहीं है जो चुनावी मुकाबले में नीतीश जैसे अनुभवी मुख्यमंत्री के सामने थोड़ी देर को भी अड़ सके। जदयू के बड़बोले महासचिव केसी त्यागी तो न्यूज चैनलों पर प्रायः गर्वपूर्वक उन विधानसभा सीटों की संख्या बताया करते थे, जिन पर  2019 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी या कि भाजपा को बढ़त प्राप्त हुई थी। उसकी बिना पर वे दावा करते थे कि विधानसभा चुनाव में उन्हें वाकओवर मिला हुआ है और फिलहाल कोई चुनौती ही नहीं है। कोरोनाकाल उनके सत्ता व संसाधनविहीन विपक्ष की सक्रियताओं के लिए नई चुनौतियां ले आया तो भी आकलन साफ थे कि यह विपक्ष वर्चुअल प्रचार में भाजपा से कतई प्रतिद्वंद्विता नहीं कर पायेगा।

इतनी अनुकूलताओं के बावजूद प्रधानमंत्री की लोकसभा चुनाव वाली लोकप्रियता बिहार विधानसभा चुनाव में परिलक्षित नहीं ही हो पाई। ‘नौसिखिये’ तेजस्वी यादव के नेतृत्व में विपक्षी महागठबंधन ने उनके खेमे को जनता के विभिन्न मुद्दों पर ऐसा घेरा कि नीतीश सरकार की वापसी के लाले पड़ गये। ठीक है कि अंततः उनका गठबंधन सीटों के खेल में बहुमत का पाला छूने में कामयाब रहा और कहावत है कि लोकतंत्र में ऐसी जीतों के सौ माई-बाप होते हैं, जबकि हार का कोई नहीं। लेकिन इस सबकी आड़ में इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती कि राज्य के सीमांचल में प्रधानमंत्री की पार्टी का चुनावी प्रबन्धन महागठबंधन के प्रबन्धन पर भारी नहीं पड़ता तो नतीजे कुछ और भी हो सकते थे। नहीं हुए तो भी भाजपा को लेकर बिहार की जनता का मन इतना भी साफ नहीं दिखा कि वह उसे विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी बना देती। उसने सबसे बड़ी पार्टी का गौरव उस राष्ट्रीय जनता दल के पास ही रहने दिया, प्रधानमंत्री के अनुसार जिसका नेतृत्व ‘जंगलराज के युवराज’ के पास था और जिसकी जीत की न सिर्फ इस राज्य बल्कि देश को भी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती थी। इस जनता ने उसे नौ प्रतिशत ज्यादा मत दिया तो भाजपा के मतों में छः प्रतिशत की कटौती कर दी। जैसे कि उसे किसी भी कीमत पर राजद के 38 प्रतिशत मतों के पार न जाने देना चाहती हो।

यहां यह भी गौरतलब है कि प्रधानमंत्री ने इस जनता को लम्बा पत्र लिखकर अपने गठबंधन के सुशासन के अलमबरदार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए जीत का वरदान मांगा था। लेकिन जनता ने बेदर्दी से उसकी पार्टी की दुर्गति कर डाली। यह जताने में भी कोई कसर नहीं रखी कि प्रधानमंत्री की ‘लोकप्रियता’ अब भाजपा की जीत की पहले जैसी गारंटी नहीं रह गई है क्योंकि उसके बावजूद हार के अंदेशे बने रहते हैं।

प्रधानमंत्री ने कभी अपने पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह पर रेनकोट पहनकर नहाने का आरोप लगाया था। लेकिन अब उनके समर्थक कहते हैं कि नीतीश की पार्टी की दुर्गति प्रधानमंत्री की रणनीति का हिस्सा थी, जिसके तहत उन्होंने नीतीश सरकार के सारे लाभों में भागीदार रहकर उसकी सारी ऐंसीइनकम्बैंसी चिराग पासवान के जरिये उनके जनतादलयू के ही नाम कर दी और भाजपा की संभावनाओं को उजली किये रखा।

अगर यह सच है तो इन समर्थकों को यह भी साफ करना चाहिए कि भाजपा को उसके सहयोगियों तक में अविश्वसनीय बनाने वाली ऐसी रणनीतियां किसी प्रधानमंत्री को नायकत्व के ज्यादा नजदीक ले जाती हैं या खलनायकत्व के? उनकी और उनके चाणक्यों की रणनीतियों का स्तर इसी तरह गिरता रहा तो बहुत संभव है कि हम जल्दी ही देखें कि उन्होंने बिहार की बहुमत के नाजुक संतुलन पर टिकी नई राजग सरकार को सुरक्षित करने के लिए मध्य प्रदेश जैसा कोई प्रयोग दोहरा दिया। आखिरकार मध्य प्रदेश में उक्त प्रयोग के सफल हो जाने पर प्रधानमंत्री ने अस्थायी मुख्यमंत्री शिवराज को स्थायित्व की बधाई देने में देर नहीं ही की।

यह भी याद नहीं रखा कि पहले के प्रधानमंत्री न उपचुनावों में प्रचार करने जाते थे और न उन्हें इस कदर नोटिस में लेते थे। उस दौर में भी नहीं, जब उपचुनाव मतदाताओं द्वारा सरकारों के खिलाफ गुस्से की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम हुआ करते थे। अब तो उपचुनावों के बारे में आम धारणा सी हो गई है कि जिस राज्य में जिसकी सरकार होगी, वहां के उपचुनावों में उस पार्टी का ही पलड़ा भारी होगा। हालांकि कभी कभी इसके अपवाद भी देखने में आते हैं।

इस आईने में देखें तो जो बिहार समेत विभिन्न राज्यों से चुनावों व उपचुनावों के जो नतीजे  आये हैं, साफ करते हैं कि फिलहाल, देश के मतदाता किसी व्यामोह में नहीं फसे हैं। इसके उलट वे विकल्प की तलाश में छटपटा रहे हैं और उन्हें जहां भी वह दिखाई दे रहा है, उसे बड़ी उम्मीद के साथ देख रहे हैं।

इसके बावजूद भारतीय जनता पार्टी जीतती या प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकलती दिखाई देती है तो उसका कारण प्रधानमंत्री का महानायकत्व नहीं बल्कि भाजपा के नीतिगत विपक्ष की अनुपस्थिति या कमजोरियां हैं। अतीत में नीतिगत विपक्ष की इस अनुपस्थिति या कमजोरी का सबसे ज्यादा लाभ अपने नायकों के करिश्मे पर निर्भर करने वाली कांग्रेस को मिला करता था, जबकि अब उसकी जगह उस भाजपा ने ले ली है, जो कभी अपने कैडर पर अवलम्बित रहा करती थी और अब कांग्रेस की ही तरह महानायकत्व पर निर्भर करने लगी है।

उसके सौभाग्य से अब हम लोकतंत्र के ऐसे लोकलाजविहीन दौर में आ गये हैं, जिसमें कैसे भी हथकंडों से चुनाव जीतना ही महत्वपूर्ण हो गया है। जीत हासिल हो जाये तो कोई नहीं देखता कि उसे हासिल करने के लिए प्रतिद्वंद्वी की कमर के नीचे कैसे और कितने प्रहार किये गये, जबकि पहले नेता और दल चुनावों को अपनी नीतियों के प्रचार के अवसर के रूप में लेते थे और उनके निकट जीत या हार बहुत महत्वपूर्ण नहीं थीं। 1962 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की फूलपुर लोकसभा सीट पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया को महज पचास हजार वोट ही मिले थे, जब उन्होंने कहा था कि उन्होंने पहाड़ से सिर टकराकर उसमें दरार डाल दी है।


कृष्ण प्रताप सिंह लेखक और वरिष्ठ पत्रकार हैं। अयोध्या से निकलने वाले अख़बार जनमोर्चा के संपादक हैं।

First Published on:
Exit mobile version