डॉ.आंबेडकर के ‘कोआपरेटिव खेती’ के विचार पर मोदी के ‘कॉरपोरेट खेती’ का वार!

अंबेडकर ने सामूहिक खेती या को ऑपरेटिव खेती की बात की। आगे चलकर ' राज्य और अल्पसंख्यक ' नामक दस्तावेज में, जिसे उन्होनें संविधान सभा के समक्ष अनुसूचित जाति परिसंघ की ओर से एक ज्ञापन की शक्ल में प्रस्तुत किया था , उन्होंने सामूहिक खेती के स्वरूप को और स्पष्ट किया। यहाँ उन्होंने जमीनों के राष्ट्रीय करण की मांग उठाई।

केंद्र सरकार के तीन कृषि बिलों के खिलाफ पंजाब हरियाणा समेत लगभग पूरे देश के किसान दिल्ली की सीमाओं पर डटे हुए हैं। किसानों ने यह साफ समझ लिया है कि खेती की उपज की खरीद और जमीन पर खेती के लिए कॉर्पोरेट घरानों को छूट मिलने का मतलब है नई किस्म की जमींदारी का आगाज़। कॉर्पोरेट फार्मिंग को बढावा देकर सरकार भविष्य में कृषि के क्षेत्र में किसानो को पूंजीपतियों के सामने निहत्था खड़ा कर देना चाहती है। फिर जो प्रतिस्पर्धा पैदा होगी वह दिए और तूफान की लडाई की तरह होगी।

आज बाबा साहब डा. अंबेडकर का परिनिर्वाण दिवस है। आज के किसान संघर्ष में अंबेडकर की याद आना स्वा भाविक है। भारत में खेती के विकास के लिए उन्होंने को – ऑपरेटिव खेती का मार्ग सुझाया था। लेकिन आज की सरकार ने कॉर्पोरेट खेती लाना चाहती है। डा. अंबेडकर ने 1918 मे ‘स्मॉल होल्डिंग्स इन इंडिया एंड देयर रेमेडीज़’ शीर्षक एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने भारत में छोटी आकार की बिखरी जोतों की समस्या को उठाया था। उनका कहना था कि बिखरी हुई जोतों और पर्याप्त पूंजी व संसाधन के अभाव में कृषि से अपेक्षित लाभकारी मूल्य की प्राप्ति संभव नहीं है। इसलिए भारत में कृषि सेक्टर के विकास के लिए दो मोर्चों पर सुधार की जरूरत है पहली तो यह कि सरकार कृषि कार्य के लिए संसाधान और पूँजी मुहैया कराये और दूसरा यह कि जोतों का आकार बढ़ाया जाय, पर इसके लिए वे चकबंदी – हदबंदी और काश्तकारी विधान को उचित नहीं मानते। वे कहते हैं कि भारत की सामाजिक परिस्थितियां व जमींदार व खेत मजदूर के रूप में विभाजित सामंती उत्पादन संबंध की वजह से चकबंदी इस उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकती। उसके अलावा परिवारों के विभाजन के साथ फिर से भूमि का आकार छोटा होता जाता है।

इसके निदान स्वरूप अंबेडकर ने सामूहिक खेती या को ऑपरेटिव खेती की बात की। आगे चलकर ‘ राज्य और अल्पसंख्यक ‘ नामक दस्तावेज में, जिसे उन्होनें संविधान सभा के समक्ष अनुसूचित जाति परिसंघ की ओर से एक ज्ञापन की शक्ल में प्रस्तुत किया था , उन्होंने सामूहिक खेती के स्वरूप को और स्पष्ट किया। यहाँ उन्होंने जमीनों के राष्ट्रीय करण की मांग उठाई। इस ज्ञापन मे उन्होंने लिखा –

“संयुक्त राज्य भारत अपने संविधान की विधि के भाग के रूप में यह घोषणा करेगा कि-

1. वे उद्योग जो प्रमुख उद्योग हैं अथवा जिन्हें प्रमुख उद्योग घोषित किया जाए, राज्य के स्वामित्व में रहेंगे और राज्य द्वारा चलाए जाएंगे;

2. वे उद्योग के प्रमुख उद्योग नहीं हैं, किन्तु बुनियादी उद्योग हैं, राज्य के स्वामित्वाधीन रहेंगे और राज्य द्वारा या राज्य द्वारा स्थापित निगमों द्वारा चलाए जाएंगे,

3. बीमा राज्य के एकाधिकार में रहेगा और राज्य हर नागरिक को विवश करेगा कि वह अपनी आय के अनुरूप ऐसी जीवन बीमा पॉलिसी ले, जो विधानमण्डल द्वारा विहित की जाए,

4. कृषि राज्य उद्योग होगा; …. कृषि उद्योग को संगठित स्वरूप देने तथा उत्पादन के साधनों पर सामूहिक स्वामित्व उद्देश्य से डॉ. अंबेडकर खंड-4 में ही यह व्यवस्था दी- राज्य अर्जित भूमि को मानक आकार के फार्मों में विभाजित करेगा और उन्हें गांव के निवासियों को पहरेदारों के रूप में (कुटुंबों के समूह से निर्मित) आगे दी गई शर्तों पर खेती करने के लिए देगा:

(क) फार्म पर खेतीबारी सामूहिक फार्म के रूप में की जाएगी;

(ख) फार्म पर खेतीबारी सरकार द्वारा जारी किए गए नियमों और निर्देशों के अनुसार की जाएगी;

(ग) पट्टेदार फार्म पर उचित रूप से उगाही करने योग्य प्रभार अदा करने के बाद फार्म की शेष उपज को आपस में विहित रीति से बांटेंगे;

(घ) भूमि गांव के लोगों की जाति या पंथ के भेदभाव के बिना पट्टे पर दी जाएगी और ऐसी रीति से पट्टे पर दी जाएगी कि कोई जमींदार न रहे, कोई पट्टेदार न रहे और न कोई भूमिहीन मजदूर रहे;

(ङ) राज्य पानी, जोतने-बोने के लिए पशु, उपकरण, खाद, बीज, आदि देकर सामूहिक फार्म की खेती के लिए वित्तीय सहायता देने के लिए बाध्य होगा।”

ये वो प्रस्ताव हैं जो उद्योग व कृषि जैसे उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व के बजाए सार्वजनिक मालिकाने व सामूहिक श्रम के सिद्धांत पर आधारित हैं। निश्चित तौर पर यदि भारतीय राष्ट्र राज्य खुद को इन सिद्धांतों को लागू करने में समर्थ पाता तो यह न सिर्फ भारत बल्कि समूची दुनिया के जनतांत्रिक इतिहास की सर्वाधिक क्रांतिकारी घटना होती, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। डॉ. अंबेडकर इन अवधारणाओं को सिर्फ प्रस्ताव और घोषणा तक ही सीमित करके नहीं देखते। इसके पीछे के ठोस सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक पृष्ठभूमि को भी वे सामने लाते हैं। इस खंड-4 के अंतर्गत ही वे यह उपबंध भी करते हैं कि यह योजना हर हाल में संविधान लागू होने के दस वर्ष के भीतर लागू हो जानी चाहिए। किसी भी स्थिति में संविधान लागू होने की तारीख से दसवें वर्ष के बाद इस योजना को टाला नहीं जा सकता।

यहाँ यह स्पष्ट है कि डा. अंबेडकर जमींदारी व्यवस्था को खत्म कर खेती के सामूहिक उपयोग के जरिये उत्पादकता का सर्वोच्च बिंदु हासिल करने का लक्ष्य लेकर चलते हैं। वे कृषि सेक्टर के विकास के लिए पुराने सामंती उत्पादन संबंध को बदल कर ‘जमीन जोतने वाले को ‘ (land to the tillers) के सिद्धांत को लागू करना चाहते थे। लेकिन अंबेडकर की यह इच्छा पूरी न हो सकी। आज़ादी के बाद बेमन से किये गए आधे अधूरे भूमि सुधार ने जमींदारी प्रथा को येन केन प्रकारेण जारी रखा। असमान भूमि वितरण, सरकारी उपेक्षा और नई आर्थिक नीतियों की मार ने भारतीय कृषि को गहरे संकट में फंसा दिया है।

आज भारत की पचास फीसदी से अधिक आबादी कृषि से जुड़े हुए कार्य व्यापार में लगी है। ऐसी स्थिति में भारतीय कृषि को कॉर्पोरेट के हाथों मे सौंपने का मतलब है भारत को एक नई गुलामी की ओर ले जाना। इस संकट का अगर कोई समाधान है तो वही है जो बाबा साहब अंबेडकर ने सुझाया था। राज्य द्वारा पूंजी व संसाधन उपलब्ध कराना व सामूहिक खेती को बढावा। इसके लिए इमानदार भूमि सुधार इस दिशा में पहला कदम हो सकता है।

 

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