कोरोना का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए प्रधानमंत्री द्वारा किये गये देशव्यापी लॉकडाउन के बीच बनारस से पहला मामला आया है जहां एक अख़बार के सपादक और संवाददाता को भुखमरी के चलते एक समुदाय के बच्चों के घास खाने की ख़बर छापने पर प्रशासन से विधिक कार्यवाही का नोटिस मिला है। दिलचस्प है कि इस ख़बर को राष्ट्रीय मीडिया में पहली बार उठाने वाले वेब पोर्टल “दि वायर” ने अपनी स्टोरी में नोटिस का जिक्र ही नहीं किया है।
शासन का भेजा नोटिस कहता है कि “बच्चों के घास खाने का प्रकाशित समाचार एवं तथ्य वास्तविकता के विपरीत है। इस गांव में बच्चे फसल के साथ उगने वाली अखरी दाल और चने की बालियां तोड़कर खाते हैं व ये बच्चे भी अखरी दाल की बालियां खा रहे थे।” नोटिस में लिखा है, “घास खाना लिखकर मुसहर जाति के परिवारों पर लांछन लगाने का कुत्सित प्रयास किया गया है”।
खुद वाराणसी के डीएम कौशल राज शर्मा ने पत्रकारों के पूछने पर बताया कि शुक्रवार तक यदि अखबार ने खंडन नहीं छापा तो उस पर क्रिमिनल कॉन्सपिरेसी और महामारी कानून के तहत मुकदमा किया जाएगा।
इस वीडियो में कौशल राज शर्मा को यह कहते सुना जा सकता है कि उन्होंने अपने बच्चे के साथ अंकरी खाते हुए फोटो डाली थी यह दिखाने के लिए कि इसे खाया जाता है और यह सामान्य बात है।
सबने कहा ‘घास’, डीएम ने कहा ‘दाल’
ध्यान देने वाली बात ये है कि इस ख़बर को समाजवादी पार्टी ने भी अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया था और आज जब नोटिस की खबर आयी, तब कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर के इसकी निंदा की है।
बनारस में मुसहरों की बस्ती में लोग घास खाने को मजबूर! सैनिटाइजर और मास्क दूर की बात, हाथ धोने के लिए साबुन तक नही। सरकार से अपील तत्काल खाद्य पदार्थों के साथ अन्य जरूरी सामान मुसहर बस्तियों तक उपलब्ध कराया जाए। pic.twitter.com/NPMT2clzsC
— Samajwadi Party (@samajwadiparty) March 26, 2020
इससे ज्यादा अहम यह है कि पूर्व विधायक और कांग्रेस के नेता अजय राय ने जिलाधिकारी को गुरुवार को ही एक पत्र लिखा जिसमें यह बात दोहरायी कि कोइरीपुर के बच्चे “असहाय स्थिति में अंकरी घास खाते दिखे”। इसके बावजूद प्रशासन के नोटिस में अंकरी की घास को “दाल” लिखा गया है।
अंकरी- घास या दाल?
अंकरी का बोटैनिकल नाम विसिया हृष्टा (vicia hirsuta) है। इसकी दो प्रजातियां हैं। एक है लाल और दूसरी सफेद। मूलतः यह घास है। इस घास को कोई नहीं खाता। यह घास बीज के साथ मिलकर खेतों में पहुंच जाती है। इसे खाने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने संस्तुति नहीं दी है। आमतौर पर यह घास गेहूं, चना, मसूर, खेसारी, मटर के साथ उगती है। जिस फसल में उगती उसका उत्पादन चालीस फीसदी कम कर देती है।
बीएचयू के कृषि विज्ञान संस्थान के प्रोफेसर रमेश कुमार सिंह के अनुसार अंकरी एक घास है। कृषि वैज्ञानिक इसे खर-पतवार की श्रेणी में रखते हैं। सरकार ने इसे खाने के लिए रिकमेंड नहीं किया है। यह इंसान के खाने योग्य नहीं है। मवेशियों को अधिक खिलाने पर डायरिया की समस्या हो जाती है। उन्होंने बताया कि अंकरी में कैनामिनीन पाया जाता है, जो अमीनो एसिड बनाने वाले प्रोटीन को प्रभावित कर देता है। इसे खाने से लीवर और फेफड़ों में सूजन की समस्या आ जाती है।
अगर ये घास किसी फसल में उग जाती है तो उसे उखाड़ना ही एकमात्र विकल्प है। इस घास को खत्म करने के लिए अलग से कोई दवा नहीं बनी है बीएचयू के कृषि विज्ञान संस्थान के प्रोफेसर पवन कुमार सिंह के अनुसार करइल मिट्टी में अंकरी घास बहुतायत मात्रा में उग जाती है। लोग इसे जानवरों को खिला देते हैं, लेकिन खाता कोई नहीं। इसे पचा पाना हर किसी के लिए आसान नहीं है। उन्होंने कहा इसे खाने से शरीर में सुस्ती आती है और लगातार खाने ये बड़े रोग का कारण बन सकती है।